20 जुलाई 2026 को इस्तांबुल मुख्य सार्वजनिक अभियोजक कार्यालय ने इज़मित की मेयर फ़ात्मा कपलान हुर्रियत और 31 अन्य लोगों के खिलाफ़ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया। उन पर आपराधिक संगठन बनाने, रिश्वत लेने और बोली में धांधली करने के आरोप थे। वर्ष 2024 के स्थानीय चुनावों में रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (CHP) द्वारा सत्ताधारी जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी (AKP) को हराकर महत्वपूर्ण जगह बनाने के बाद से विपक्ष द्वारा चलाई जा रही नगरपालिकाओं में गिरफ्तारियों का यह सिलसिला जारी है और यह उसी कड़ी में एक और घटना है।[i]
ये घटनाक्रम सीधे तौर पर राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन के तहत कार्यकारी राष्ट्रपति–शासन के विस्तार से जुड़े हैं, जो 2010 के संवैधानिक सुधार और 2018 में संसदीय लोकतंत्र से राष्ट्रपति– शासन प्रणाली में बदलाव के बाद हुआ।
यह शोधपत्र इस बात पर फोकस करता है कि कैसे राष्ट्रपति एर्दोगन ने विपक्षी नेताओं को नियंत्रित करने और दबाने के लिए न्यायपालिका पर कार्यकारी प्रभाव का इस्तेमाल किया है। वर्ष 2010 के जनमत संग्रह, 2016 की तख़्तापलट की नाकाम कोशिश और 2018 की संक्रांति को देखते हुए, यह शोधपत्र यह तर्क प्रस्तुत करता है कि तुर्किए लोकतांत्रिक ढांचे से तानाशाही व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, जिसमें न्यायपालिका सत्ताधारी पार्टी के राजनीतिक हथियार के रूप में काम करती है।
संसदीय लोकतंत्र से कार्यकारी राष्ट्रपति–शासन प्रणाली में परिवर्तन
तुर्किए गणराज्य के शुरुआती सालों में, वहाँ की न्यायपालिका ने धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन सरकारी अंगों के बीच शक्तियों का बंटवारा न होने के कारण न्यायपालिका सरकार पर निर्भर थी। वर्ष 1960 में हुए सैन्य तख़्तापलट के बाद 1961 का संविधान तैयार किया गया था। इसमें ज्यादा नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकार दिए गए, शक्तियों के बंटवारे को पक्का किया गया और स्वायत्त संस्थाओं को शक्तियां सौंपी गई। नतीजतन, न्यायपालिका और सेना ऐसा दो संस्थाओं के तौर पर उभरीं जो देश में बहुसंख्यकवाद को संतुलित करने में सक्षम थीं।[ii]
हालाँकि, समय के साथ न्यायपालिका ने सेना के फैसलों को चुनौती देने के लिए अपनी आज़ादी की कमी पर चिंता जताई। इससे लोगों के व्यक्तिगत और राजनीतिक अधिकारों पर पाबंदियां लगीं। इसके बाद, 2002 में AKP अच्छी गवर्नेंस और विकास का वादा करके सत्ता में आई, जिसे नागरिकों ने न्यायपालिका और सेना को चुनौती देने के एक मौके के तौर पर देखा।
AKP लगातार दूसरी बात सत्ता में बनी रही, लेकिन न्यायपालिका पर उसका नियंत्रण नहीं था। इसी वजह से 12 सितंबर 2010 को संवैधानिक जनमत संग्रह हुआ, जिसने संवैधानिक न्यायालय और न्यायाधीशों व अभियोजकों की उच्च परिषद (HSYK) दोनों के गठन और चयन की प्रक्रियाओं में बदलाव किया। इसके चले संवैधानिक अदालत के सदस्यों की संख्या 11 से 17 और HSYK के सदस्यों की संख्या 7 से बढ़कर 22 हो गई। जहाँ AKP का तर्क था कि इससे न्यायपालिका की जवाबदेही बढ़ेगी, वहीं विपक्ष ने इसे अदालतों पर सत्ताधारी पार्टी का प्रभाव बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा।
न्यायिक मामलों के लिए हुए पहले चुनावों में न्यायाधीशों और अभियोजकों का सर्वोच्च बोर्ड की सभी सीटें सत्ताधारी सरकार का समर्थन करने वाले उम्मीदवारों ने जीतीं। यह जीत फ़ेतुल्लाह गुलेन समूह का समर्थन हासिल करके मिली, जिसमें गुलेन समर्थकों को सरकार में ऊँचे पद दिए गए। यह तुर्किए के तत्कालीन प्रधानमंत्री एर्दोगन का न्यायपालिका पर अपना नियंत्रण बढ़ाने के लिए किया गया एक सुनियोजित कदम था, जिसके तहत 2011 में उच्च अपीलीय न्यायालय से सेवानिवृत्त हो रहे सदस्यों की जगह लेने के लिए 160 नए जजों की नियुक्ति की गई।ii
वर्ष 2010 के संशोधन के बाद AKP ने अपना बहुमत वाला शासन चलाना शुरू किया, जिसके कारण आखिरकार 27 मार्च 2013 को गेज़ी पार्क विरोध–प्रदर्शन हुआ। सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बहुत अधिक बल का प्रयोग किया, जिससे नागरिकों में भारी नाराज़गी फैल गई। इसके साथ ही, गुलेन– समर्थक जजों वाली न्यायपालिका ने भ्रष्टाचार के एक मामले में एर्दोगन के बेटे और उनके कैबिनेट मंत्रियों के खिलाफ फैसला सुनाया। इसके जवाब में एर्दोगन ने जांच में शामिल जजों और पुलिस अधिकारियों को हटा दिया और गुलेन समर्थकों के संस्थानों को बड़े पैमाने पर बंद करने का आदेश दिया।
उन्होंने गुलेन समर्थकों के खिलाफ़ मामला खड़ा किया और 2014 और 2015 के चुनाव जीतकर तुर्किए के राष्ट्रपति बने। इसके कुछ ही समय बाद, 2016 में उन्हें तख्तापलट की नाकाम कोशिश का सामना करना पड़ा, एर्दोगन का दावा था कि इसे गुलेन समर्थकों ने ही आयोजित किया था। इसके बाद देश में आपातकाल लागू कर दिया गया जो जो वर्ष तक चला और गुलेन समर्थकों से जुड़े बड़ी संख्या में पत्रकारों, जजों और नागरिकों को गिरफ्तार किया गया।[iii]
एर्दोगन ने इस स्थिति का फायदा उठाकर कार्यकारी शाखा में सारी शक्ति केंद्रित कर ली और यह नैरेटिव फैलाया कि देश में स्थिरता बनाए रखने के लिए राष्ट्रपति के पद में ही सारी शक्ति होनी चाहिए। उन्होंने 16 अप्रैल 2017 को संसद में 2018 का संवैधानिक जनमत संग्रह पेश किया, जिससे तुर्किए संसदीय लोकतंत्र से बदलकर राष्ट्रपति–प्रधान कार्यकारी प्रणाली वाला देश बन गया। इससे राष्ट्रपति को जजों और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति, बर्खास्तगी और पदोन्नति करने की शक्तियां मिल गईं, जिससे एक पक्षपाती न्यायपालिका का रास्ता खुल गया।[iv]
विपक्ष की राजनीति के न्यायिकरण की मुख्य घटनाएं:
राष्ट्रपति प्रणाली (राष्ट्रपति–प्रधान शासन प्रणाली) में बदलाव ने एर्दोगन को न्यायपालिका पर बहुत अधिक नियंत्रण दे दिया, जिसका इस्तेमाल वे विपक्ष के नेताओं को नियंत्रित करने के लिए कर रहे हैं। यह बात पिछले कुछ सालों में हुई घटनाओं के सिलसिले से स्पष्ट जाहिर होती है। वर्ष 2014 में कोबानी विरोध– प्रदर्शन के दौरान देश की एकता को नुकसान पहुँचाने और उसमें शामिल होने के आरोप में कुर्द नेता डेमिरतास (जो कुर्द–समर्थक पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी(HDP) के पूर्व नेता थे) की गिरफ्तारी एक ऐसी ही घटना है जिसमें सरकार ने न्यायपालिका का इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर किया।
डेमिरतास पर कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी से संबंध रखने और आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप था लेकिन मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए यूरोपीय सम्मेलन (ECHR) ने डेमिरतास की हिरासत की कड़ी आलोचना की और 2018, 2020 और 2025 में तीन बार उनकी रिहाई की मांग की। लेकिन सरकार उन्हें रिहा करने को तैयार नहीं थी। उसका कहना था कि उन्हें जिस मुदकमे से पहले की हिरासत में रखा गया था, वह किसी दूसरे मामले से जुड़ा था और जारी मामले के लिए उन्हें 42 वर्ष और जेल में रहना होगा।[v]
एक और मामला ओसमान कवाला का है, जिन पर गेज़ी पार्क विरोध प्रदर्शनों और 2016 में तख़्तापलट की कोशिश के ज़रिए सरकार को गिराने की कोशिश करने का आरोप था। इस्तांबुल की 13वीं हैवी पीनल कोर्ट ने उन्हें लगभग साढ़े चार वर्ष जेल में बिताने के बाद उम्रकैद की सज़ा सुनाई।[vi] मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए यूरोपीय सम्मेलन (ECHR) ने मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए सरकार की आलोचना की और उनकी तत्काल रिहाई की मांग की।
लेकिन तुर्किए ने यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय के फैसलों का उल्लंघन किया और आगे के विरोध– प्रदर्शनों को दबाने के लिए लोगों को जेल में डालने की अपनी रणनीति जारी रखी।[vii]
19 मार्च 2025 को तुर्किए सरकार ने इस्तांबुल के मेयर एक्रेम इमामोग्लू को गिरफ़्तार कर लिया। वे अगले राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्रपति एर्दोगन के मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं और उन पर एक आपराधिक संगठन चलाने और उसमें शामिल होने तथा भ्रष्टाचार से जुड़ी अन्य गतिविधियों का आरोप है। इससे ठीक एक दिन पहले, 18 मार्च को इस्तांबुल यूनिवर्सिटी ने 30 साल पहले उत्तरी साइप्रस की प्राइवेट यूनिवर्सिटी से उनके ट्रांसफर में गड़बड़ियों का हवाला देते हुए उनकी डिग्री रद्द कर दी।
इस तरह, इस फैसले के कारण वह 2028 के चुनावों के लिए अयोग्य हो गए, क्योंकि तुर्किए का संविधान केवल डिग्री वाले उम्मीदवारों को ही चुनाव लड़ने की इजाज़त देता है। इसे एर्दोगन की ओर से अपने विरोधियों पर कार्रवाई करने की एक चाल के तौर पर देखा गया।[viii] एक अलग फ़ैसले में, तुर्की की एक अदालत ने रिपब्लिकन पीपल्स पार्टी (CHP) के 2023 के चुनावों के बाद बनी लीडरशिप को रद्द कर दिया। कोर्ट ने CHP के अहम नेता माने जाने वाले ओज़गुर ओज़ेल को उनके पद से हटा दिया और केमल किलिचदारोग्लू को फिर से बहाल कर दिया, जो 2023 के चुनाव में एर्दोगन से हार गए थे। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने गिरफ्तारियों के इस सिलसिले को सत्ताधारी पार्टी द्वारा विपक्षी दलों के खिलाफ़ न्यायिक व्यवस्था का हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का तरीका बताया है।[ix]
ऊपर बताई गई घटनाएं अलग–थलग नहीं हैं, वे एक स्पष्ट पैटर्न और न्यायिक संस्थाओं का प्रयोग करके विपक्ष को दबाने के उद्देश्य को दिखाती हैं। वर्ष 2016 में तख़्तापलट की कोशिश के बाद, राष्ट्रपति एर्दोगन ने अपनी शक्तियों का प्रयोग कर जजों और दूसरे अधिकारियों को हटाया, न्यायपालिका को हथियार बनाकर विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार करवाया और यहाँ तक कि पार्टी के अंदर हुए चुनावों को भी रद्द कर दिया, इन सबके पीछे संभावित आतंकी कनेक्शन और भ्रष्टाचार का हवाला दिया गया। इस सब बातों से यह साफ़– साफ़ पता चलता है कि जजों की नियुक्ति में 2010 में हुए बदलाव और 2018 में राष्ट्रपति–प्रधान व्यवस्था को अपनाने से एर्दोगन को बिना किसी रोक–टोक के न्यायपालिका को प्रभावित करने का मौक मिल गया है।
निष्कर्ष
तुर्किए के संसदीय लोकतंत्र से कार्यकारी राष्ट्रपति प्रणाली में बदलने से न केवल राष्ट्रपति एर्दोगन के हाथों में सारी शक्ति आ गई है बल्कि न्यायपालिका का प्रयोग भी उसी शक्ति को बनाए रखने के लिए किया जाने लगा है। कई जनमत संग्रहों और पुनर्गठन के माध्यम से तुर्किए की न्यायपालिका की आज़ादी पूरी तरह से खत्म कर दी गई है। एर्दोगन ने देश में अपने खिलाफ़ बोलने वाले या चुनाव जीतने वाले नेताओं को गिरफ्तार करके न्यायपालिका का प्रयोग अपनी पसंद का विपक्ष तैयार करने के लिए किया है। इससे इस संस्था की वास्तविक शक्ति के पलटे जा सकने की क्षमता पर सवाल उठे हैं।
सर आइवर जेनिंग की कही बात बहुत मशहूर है कि "संसद में विपक्ष के बिना, लोकतांत्रिक सरकार निश्चित रूप से तानाशाही या राजशाही सरकार में बदल जाएगी"। एर्दोगन की अपनाई गई नीतियां तानाशाही की ओर स्पष्ट झुकाव दिखाती हैं, जिसमें राष्ट्रपति देश और उसके रणनीतिक संस्थानों को चलाते हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए, जिसमें न्यायपालिका में सभी नियुक्तियाँ राष्ट्रपति द्वारा की जा रही हैं, संविधान में किए गए संरचनात्मक परिवर्तनों की तुलना में यह सवाल कम महत्वपूर्ण हो गया है कि आगे सत्ता किसके हाथ में होगी।
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*गौरी देवा वी एस, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण:
[i] CHP mayor, husband detained as crackdown on opposition municipalities expands. (2026, July 20). Turkish Minute. https://www.turkishminute.com/2026/07/20/chp-mayor-husband-detained-as-crackdown-on-opposition-municipalities-expands/
[ii] Esen, B. (2024). Judicial transformation in a competitive authoritarian regime: Evidence from the Turkish case. Law & Policy, 47(1). https://doi.org/10.1111/lapo.12250
[iii] Sullivan, Amelia (2018) "Unconditional Surrender: The Rise of President Erdogan and the end of Kemalist Turkey," History in the Making: Vol. 11, Article 5.
[iv] Bâli, A. (2025, October 21). Turkey’s constitutional coup - MERIP. Middle East Research and Information Project. https://www.merip.org/2018/12/turkeys-constitutional-coup/
[v] Stockholm Centre for Freedom. (2025, November 6). ECtHR upholds ruling requiring Turkey to free prominent Kurdish politician. Stockholm Center for Freedom. https://stockholmcf.org/ecthr-upholds-ruling-requiring-turkey-to-free-prominent-kurdish-politician-selahattin-demirtas/
[vi] Turkey: Baseless charges over landmark 2013 protests. (2024, May 19). Human Rights Watch. https://www.hrw.org/news/2019/03/25/turkey-baseless-charges-over-landmark-2013-protests
[vii] Amnesty International UK. (2026, January 13). Turkey: Aggravated life sentence for Osman Kavala a “devastating blow” for human rights. https://www.amnesty.org.uk/latest/turkey-aggravated-life-sentence-osman-kavala-devastating-blow-human-rights/
[viii] Cevik.S. (2025, March 29). The arrest of Ekrem Imamoglu: a critical turning point in Turkey’s politics. Arab Center Washington DC. https://arabcenterdc.org/resource/the-arrest-of-ekrem-imamoglu-a-critical-turning-point-in-turkeys-politics/
[ix] Michaelson, R. (2026, May 22). Turkish court ruling removes head of main opposition party. The Guardian. https://www.theguardian.com/world/2026/may/21/turkey-court-removes-head-chp-party-ozgur-ozel-erdogan