सारांश: इस शोधपत्र में यह तर्क दिया गया है कि चीन ने सार्वजनिक रूप से किसी भी प्रकार की भागीदारी से इनकार करते हुए भी ईरान को रक्षा संबंधी प्रौद्योगिकी और सामग्री व्यवस्थित रूप से उपलब्ध कराई है। ईरान को चीन की मदद अमेरिका के लिए सबसे महत्वपूर्ण लेकिन औपचारिक रूप से सबसे कम स्वीकार की गई चुनौतियों में से एक है।
परिचय
चीन और ईरान के बीच सैन्य संबंध 1980 के दशक की शुरुआत में ईरान– इराक युद्ध के समय से हैं। उस समय ईरान को हथियारों की आवश्यकता थी। इस समय चीन अपनी सरकारी रक्षा कंपनियों के विकास में लगा था। चीन ने 1982 और 1987 के बीच ईरान को मिसाइलें, फाइटर जेट, टैंक और बख़्तरबंद गाड़ियों की आपूर्ति की थी।[i] दोनों देशों ने मार्च 2021 में 25 वर्ष के लिए व्यापक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।[ii] इस समझौते के तहत, चीन ने ईरान से लगातार और भारी छूट पर तेल की आपूर्ति के बदले ईरान की मूलभूत सुविधाओं, ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र में भारी निवेश किया। चीन ईरान को अपनी ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण स्तंभ मानता है।
चीन, ईरान के लिए सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक सहारा बन गया था, विशेष रूप से उस समय जब विश्व के ज्यादातर देशों ने प्रतिबंध लगाकर ईरान से दूरी बना ली थी। वर्ष 2025 तक, चीन प्रतिदिन लगभग 14 लाख बैरल ईरानी तेल का आयात कर रहा था जो उसके कुल कच्चे तेल के आयात का लगभग 13 प्रतिशत था।[iii] अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बुरी तरह अलग–थलग पड़ने के बीच ईरान को आर्थिक और राजनीतिक अस्तित्व के लिए भी चीन की आवश्यकता है।[iv] यह निर्भरता दोतरफा है। ईरान को हथियार देकर चीन अपने निवेश की सुरक्षा कर रहा है। चीन के लिए ईरान सस्ते और लगातार मिलने वाले ऊर्जा का स्रोत है और यहाँ तक कि इज़रायल और अमेरिका के हमलों को रोकने की ईरान की क्षमता भी सीधे तौर पर चीन के आर्थिक हितों को पूरा करती है।[v]
रक्षा क्षेत्र में चीन की मदद
बीते कुछ वर्षों में, चीन ने बड़े पैमाने पर हथियारों की सीधी बिक्री से हटकर अधिक अस्पष्ट दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकियों का रुख किया है। यह अस्पष्ट नज़रिया, जिसमें घटकों पर नागरिक लेबल लगे होते हैं लेकिन वे सैन्य उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं, केवल चीन को ही लाभ नहीं पहुँचाता। इससे ईरान की उस व्यापक रणनीति में भी मदद मिल सकती है जिसके तहत वह अमेरिका के साथ रणनीतिक रूप से मुकाबला करना चाहता है। चीन सीधे तौर पर ईरान को टैंक, लड़ाकू विमान या मिसाइलें नहीं देता है क्योंकि ऐसा करने पर यह बात आसानी से पता चल जाएगी और इसका पता लगाया जा सकेगा। इसकी बजाय, चीन ने हमेशा दोहरे प्रयोग वाली तकनीक के निर्यात का ही विकल्प अपनाया है।
दोहरे प्रयोग वाली चीजें वे उत्पाद या सामग्री हैं जिनका सामान्य नागरिकों के लिए तो उचित इस्तेमाल होता ही है लेकिन उनका इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण सोडियम परक्लोरेट है। यह एक सफ़ेद क्रिस्टलीय यौगिक होता है जिसका प्रयोग सामान्य नागर कार्यों में किया जाता है और इसे चीन के निर्यात कानूनों के तहत नियंत्रित पदार्थ की श्रेणी में नहीं रखा गया है। बीजिंग ने अपने व्यापार को सामान्य व्यावसायिक गतिविधि बताया है। चीन के बंदरगाहों पर ईरान के जहाजों में मिसाइल का ईंधन बनाने में इस्तेमाल होने वाला केमिकल लोड करते हुए देखा गया और यह भी पाया गया कि ईरान के हथियारों को चीन के उपग्रह तकनीक द्वारा निर्देशित किया जा रहा था।[vi]
सोडियम परक्लोरेट की सैन्य अहमियत इस बात में है कि एक सामान्य रसायनिक प्रक्रिया के माध्यम से यह किसी दूसरी वस्तु में बदल जाता है। प्रसंस्करण के बाद यह अमोनियम परक्लोरेट बन जाता है जो एक ऑक्सीडाइज़र है और ईरान की ख़ैबर शेकन और हज़ कासिम बैलिस्टिक मिसाइलों के सॉलिड फ्यूअल प्रोपेलेंट को ऊर्जा प्रदान करता है।[vii] इस रसायन की आपूर्ति लगातार और बड़ी मात्रा में होती रही है। जनवरी– फरवरी 2025 के दौरान, ईरान के दो जहाजों ने लगभग 1000 टन सोडियम परक्लोरेट ईरान के मुख्य व्यावसायिक बंदरगाह, बंदर अब्बास पहुँचाया।[viii] सीएनएन (CNN) की रिपोर्टों के अनुसार अकेले इसी खेप से लगभग 200-260 बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए प्रोपेलेंट बनाया जा सकता था।
जब तेहरान इज़रायल के साथ 12- दिन के युद्ध (13-14 जून 2025) में बुरी तरह से बर्बाद हुए अपने मिसाइल स्टॉक को फिर से भरने की जल्दी में था तब चीन ने सितंबर– अक्टूबर 2025 के बीच 2000 टन अतिरिक्त माल ईरान पहुँचाया था।[ix] अप्रैल 2026 की शुरुआत तक, ईरान से जुड़े कम–से–कम पांच और जहाज़ जुहाई के गाओलान बंदरगाह से रवाना हो चुके थे। जानकारों का अनुमान था कि इस कुल कार्गो से लगभग 785 अतिरिक्त बैलिस्टिक मिसाइलें बनाई जा सकती थीं।[x]
हालाँकि, अमेरिका ने चीन पर ईरान को मिसाइल से जुड़ी तकनीक और सामान हस्तांतरित करने का आरोप लगाया है लेकिन सोडिमय परक्लोरेट ऐसा पदार्थ नहीं है जिसे मिसाइल टेक्नोलॉजी नियंत्रण व्यवस्था नियंत्रित करता हो और संयुक्त राष्ट्र भी ईरान को इसके निर्यात पर रोक नहीं लगाता है।[xi] इसलिए चीन का कहना है कि अमेरिका वास्तव में एक सामान्य व्यावसायिक व्यापार से जुड़े सुरक्षा जोखिमों को बढ़ा–चढ़ाकर बता रहा है।
वर्ष 2021 की रणनीतिक साझेदारी के तहत बीजिंग ने ईरान की सेना को बेईदू नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (BeiDou Navigation Satellite System) का एक्सेस भी दिया, जो जीपीएस का चीनी विकल्प है। यह सुविधा बीजिंग के सबसे करीबी रणनीतिक सहयोगियों के लिए ही आरक्षित है। 23 जून 2025 को ईरान ने पूरे देश में जीपीएस बंद कर दिया और पूरी तरह से तीन के बेईदू सैटेलाइट सिस्टम का प्रयोग करने लगा। लड़ाई में इसके बड़े परिणाम देखने को मिले, 2026 के युद्ध के दौरान ईरान की मिलाइल और ड्रोन हमलों की सटीकता बढ़ गई।[xii]
चीन की कंपनियां खुलेआम ऐसे इंजन, बैटरी, फ़ाइबर ऑप्टिकल केबल और माइक्रोचिप बेच रही हैं जिनका प्रयोग आम तौर पर सैन्य ड्रोन में होता है। अमेरिका की पाबंदियों के बावजूद चीन इन्हें ईरान भेज रहा है। भुगतान हांकांग की शेल कंपनियों के माध्यम से से किया जाता है। ड्रोन के ये पुर्जे पहले चीन की कंपनी से हांगकांग की शेल कंपनी जाते हैं और फिर वहाँ से ईरान भेजे जाते हैं। अमेरिकी वित्त विभाग ने इस शेल कंपनी का पता लगातर उसे बंद कर दिया, लेकिन उसकी जगह दूसरी कंपनी आ गई और कुछ ही महीनों में नेटवर्क का एक बिल्कुल नया सेट काम करने लग गया।[xiii]
चीन की नीति और कार्यप्रणाली में अंतर
चीन का विदेश मंत्रालय लगातार यह कहता रहा है कि वह युद्धग्रस्त देशों को हथियार नहीं बेचता, एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करता है और घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत अपने निर्यात नियंत्रण दायित्वों का पालन करता है। यह रवैया सालों से नहीं बदला है लेकिन जो बदला है वह है व्यापार का स्वरूप। यह बदलाव संभावित इनकार से उस स्थिति की ओर है जिसे जानकार अब असंभावित इनकार कहते हैं।[xiv]
चीन अभी भी इससे इनकार कर रहा है लेकिन सबूत कुछ और ही बताते हैं। चीन का संभाव्य अस्वीकार्यता (plausible deniability) का तरीका उसकी बड़ी भू–राजनीतिक और रणनीतिक महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। इसका उद्देश्य पश्चिमी एशियाई क्षेत्रीय राजनीति में बिना किसी खुले विरोध के अपना प्रभाव बढ़ाना है। बीजिंग तटस्थ दिखते हुए भी चुपचाप अपने रणनीतिक सहयोगियों का समर्थन करना चाहता है। इसका लक्ष्य पश्चिमी नेतृत्व को चुनौती देना, अमेरिका के रणनीतिक फोकस को अस्थिर करना औऱ अपने हितों की रक्षा करना है। बीजिंग किसी भी सैन्य शक्ति के साथ खुलकर जुड़ने के जोखिमों और बोझ से बचते हुए यह सब हासिल करना चाहता है।[xv]
इससे अमेरिका के लिए सुरक्षा संबंधी संरचनात्मक संकट पैदा होता है। जैसा कि रॉबर्ट जर्विस ने 1978 में अपने महत्वपूर्ण कार्य– कोऑपरेशन अंडर द सिक्योरिटी डिलेमा– में कहा था, सुरक्षा का संकट तब सबसे गंभीर होता है जब देश आक्रामक और रक्षात्मक रुख के बीच स्पष्ट रूप से फर्क नहीं कर पाते।[xvi] अमेरिका के लिए इस संकट का जवाब देना मुश्किल हो रहा है। वाशिंगटन चीन के साथ सीधे टकराव से बच रहा है क्योंकि इससे क्षेत्रीय विवाद के परमाणु हथियार वाले दो देशों के बीच बहुत बड़े संकट में बदलने का खतरा है। अमेरिका ने उन कंपनियों और नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाए हैं जो आपूर्ति श्रृंखला में बाधा डालते हैं लेकिन तुरंत ही नए बिचौलिए सामने आ जाते हैं और सिस्टम फिर से खड़ा हो जाता है।[xvii]
निष्कर्ष
ईरान के सैन्य कार्यक्रम के लिए चीन का समर्थन संरचनात्मक भी है और सोची– समझी रणनीति भी। चीन अंतरराष्ट्रीय रूपरेखा में मौजूद कानूनी कमियों का फायदा उठाता है और अपना मकसद पूरा करते हुए इनकार करने का रवैया अपनाए रखता है। दोहरे इस्तेमाल वाले रसायनों का सैन्य और आम जनता, दोनों के लिए प्रयोग होता है और सैटेलाइट एक्सेस सहयोग समझौतों के माध्यम से उपलब्ध कराया जाता है। साथ ही भुगतान शेल कंपनियों के माध्यम से किए जाते हैं।
चीन से ईरान को हथियारों की आपूर्ति का ऐसा कोई भी सरकारी दस्तावेज नहीं है जिसके आधार पर बीजिंग के खिलाफ कई देसों की तरफ से कोई कार्रवाई की जा सके। चीन ने ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल की सटीकता, ड्रोन क्षमताओं और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात को रोकने की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद की है। चीन ने ऐसा तरीका अपनाया है जिससे वह ईरान की सैन्य क्षमता को समर्थन दे सकता है, पश्चिमी एशियाई क्षेत्र में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है और किसी भी प्रकार की औपचारिक जवाबदेही से बच सकता है।
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*नंदिनी संजय, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण:
[i] David Pierson, "How China's Weapons Transfers to Iran Have Evolved Over Decades," New York Times, April 16, 2026, citing Stockholm International Peace Research Institute. https://english.aawsat.com/features/5262919-how-china%E2%80%99s-weapons-transfers-iran-have-evolved-over-decades
[ii] US-China Economic and Security Review Commission, China-Iran Fact Sheet, March 2026. https://www.uscc.gov/research/china-iran-fact-sheet-short-primer-relationship
[iii] Pakizah Parveen, "Yuanization of Iran-China Oil Trade," Centre for Strategic and Contemporary Research, Month Day, Year of publication, https://cscr.pk/explore/themes/trade-economics/yuanization-of-iran-china-oil-trade/.
[iv] US-China Economic and Security Review Commission, China-Iran Fact Sheet: A Short Primer on the Relationship, March 2026. https://www.uscc.gov/research/china-iran-fact-sheet-short-primer-relationshi
[v] Kharon Research, "Behind Iran's War Chest, an Oil Lifeline from China," March 2026.
https://www.kharon.com/brief/iran-war-oil-china-trade-shadow-fleet-sanctions
[vi] Danya Saperstein, "Iranian Ships Leave Chinese Port with Suspected Missile Fuel During War — Report," Jerusalem Post, March 9, 2026. https://www.jpost.com/middle-east/iran-news/article-88929
[vii] Daniel Allen, Katherine Michaelson, and Marco Volpitta, "What Is Iran Doing With 1,000 Tons of Sodium Perchlorate from China?" The Diplomat, February 2025, https://thediplomat.com/2025/02/what-is-iran-doing-with-1000-tons-of-sodium-perchlorate-from-china
[viii] Foundation for Defense of Democracies, "Ship Carrying Chemical for Missile Development Docks in Iran," February 25, 2025. https://www.fdd.org/analysis/policy_briefs/2025/02/25/ship-carrying-chemical-for-missile-development-docks-in-iran/
[ix] Natasha Bertrand, Katie Bo Lillis, and Tim Lister, "Western Intelligence Says Iran is Rearming Despite UN Sanctions, with China's Help," CNN, October 29, 2025. https://www.cnn.com/2025/10/29/middleeast/iran-rebuilding-ballistic-weapons-program-int
[x] US-China Economic and Security Review Commission, China-Iran Fact Sheet: A Short Primer on the Relationship, March 2026. https://www.uscc.gov/research/china-iran-fact-sheet-short-primer-relationship
[xi] Danya Saperstein, "Iranian Ships Leave Chinese Port with Suspected Missile Fuel During War — Report," The Jerusalem Post, March 9, 2026. https://www.jpost.com/middle-east/iran-news/article-88929
[xii] "Iran Abandons US GPS for China's BeiDou, Redrawing the Strategic Map of Middle East Electronic Warfare," Defence Security Asia, February 2026. https://defencesecurityasia.com/en/iran-abandons-us-gps-china-beidou-middle-east-security
[xiii] "China Keeps Supplying Drone Parts to Iran and Russia Despite US Sanctions," Iran International, citing Wall Street Journal, May 6, 2026. https://www.iranintl.com/en/20260506181
[xiv] Linggong Kong, "Beijing's Plausible Deniability on Arms Supply is Quickly Becoming Implausible — and Could Soon Extend to Iran," The Conversation, July 22, 2025. https://theconversation.com/beijings-plausible-deniability-on-arms-supply-is-quickly-becoming-implausible-and-could-soon-extend-to-iran-26114
[xv] Atul Kumar, “China's Arms Transfer to Iran”, ORF, Sep 24, 2024. https://www.orfonline.org/research/china-s-arms-transfer-to-ira
[xvi] Robert Jervis, "Cooperation Under the Security Dilemma," World Politics 30, no. 2 (January 1978): 167–214. https://doi.org/10.2307/2009958
[xvii] "U.S. Sanctions on Iran," Congressional Research Service, updated April 2026. https://www.congress.gov/crs-product/IF12452