सारांश: फरवरी 2026 में जंगलों, वन्यजीव संरक्षण, जैव–विविधता की सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन पर भारत और नेपाल के बीच हुआ समझौता दोनों देशों के बीच पर्यावरण के क्षेत्र में आपसी सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अपनी तरह का यह पहला व्यापक समझौता है जो दोनों देशों के बीच सीमा–पार जैव–विविधता सहयोग के लिए संस्थागत ढांचा तैयार करता है।
परिचय
भारत और नेपाल के बीच 1,751 किलोमीटर लंबी खुली अंतरराष्ट्रीय सीमा है जो हिमालय की तलहटी और तराई क्षेत्र तक फैली हुई है। इस वजह से, इस सीमा में दोनों देशों के बीच सीमा–पार जैव–विविधता और आपस में जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र शामिल हैं। इसलिए, वन्यजीवों और जैव–विविधता का अस्तित्व अनुकूल मौसम और दोनों देशों के बीच सीमा–पार आवाजाही की स्वतंत्रता पर निर्भर करता है। हालाँकि भारत और नेपाल ने सीमा सुरक्षा, पनबिजली और प्रवास जैसे मुद्दों पर बड़े पैमाने पर सहयोग किया है, लेकिन वन्यजीव और जैव–विविधता संरक्षण के मामले में संस्थागत सहयोग अपेक्षाकृत सीमित रहा है।
भारत और नेपाल, दोनों के लिए ही जैव– विविधता का संरक्षण बहुत आवश्यक है क्योंकि इस इलाके में कई ऐसी प्रजातियां पाई जाती हैं जिन पर विलुप्त होने का संकट मंडरा रहा है। जैसे– एक सींग वाले गैंडे, बंगाल टाइगर, एशियाई हाथी, गंगा नदी डॉल्फिन (गंगेय डॉल्फिन) और हिम तेंदुए। कोई भी देश अकेले यह काम नहीं कर सकता क्योंकि पारिस्थितिकी तंत्र सीमा से परे होते हैं इसलिए जैव–विविधता के संरक्षण हेतु मिलकर प्रयास करने के लिए संस्थागत ढांचे की आवश्यकता है।
इस सिलसिले में 25 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु पर्यावरण मंत्रालय और नेपाल सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के बीच एक समझौता ज्ञापन(MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।[i] यह दोनों देशों के बीच अपनी तरह की पहली पहल है, जो सीमा–पार पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए मिलकर काम करने की बढ़ती ज़रूरतों को दर्शाती है।
इस समझौते का उद्देश्य "भू–दृश्य स्तर पर जैव–विवधता संरक्षण की रणनीतियां बनाने में सहयोग करना जिसमें हाथी, गंगेय डॉल्फिन, गैंडा, हिम तेंदुआ, बाघ और गिद्ध जैसी विशेष प्रजातियों पर ज़ोर दिया जाएगा।"[ii] इसमें वन और संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन को मज़बूत करने, वन्यजीव गलियारों को बहाल करने और जैव विविधता संरक्षण के संकटों से निपटने, वन और वन्यजीव अपराध से मुकाबला करने, स्मार्ट हरित अवसंरचनाओं को बढ़ावा देने और तकनीकी विशेषज्ञता एवं सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के आदान–प्रदान को सुविधाजनक बनाने का भी प्रावधान है।[iii]
भारत– नेपाल सीमा पर सीमा–पार जैव–विविधता
भारत– नेपाल सीमा दक्षिण एशिया के सबसे बड़े और पर्यावरण की नज़र से महत्वपूर्ण सीमा–पार पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक है, जो कई अनोखी और लुप्तप्राय प्रजातियों का घर है। हालाँकि दोनों देशों ने अलग–अलग स्तर पर संरक्षण के प्रयास किए हैं लेकिन संस्थागत द्विपक्षीय सहयोग कुछ विशेष अपवादों को छोड़कर सीमित ही रहा है।
एशियाई हाथी
एथियाई हाथी ज़मीन पर रहने वाले सबसे महत्वपूर्ण पशुओं में से एक हैं और यह भारत एवं नेपाल समेत 13 एशियाई देशों में पाए जाते हैं। एशियाई हाथियों को अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची में लुप्तप्राय प्रजाति के रूप में शामिल किया गया है क्योंकि उनके रहने के स्थानों के खत्म होने, गलियारों में बाधाएं, इंसान और हाथी के बीच संघर्ष और अवैध शिकार जैसे संकटों की वजह से उनकी वैश्विक आबादी कम हो रही है।[iv]
भारत में लगभग 30,000 हाथी रहते हैं[v] जबकि नेपाल में रहने वाले हाथियों की अनुमानित संख्या 230 है। इनमें से लगभग 150 जंगली हाथियों[vi] की पहचान की गई है जो पहाचन किए गए 12 गलियारों के माध्यम से नियमित रूप से नेपाल और भारत के बीच आते– जाते रहते हैं। (तालिका 1) हाथियों की यह आवाजाही दोनों देशों के बीच पारिस्थितिक निर्भरता और तराई चाप भूदृश्य (तराई आर्क लैंडस्केप) के व्यापक दायरे में समन्वित भूदृश्य शासन के महत्व को रेखांकित करती हैं।[vii]
भारत– नेपाल सीमा पर इंसानों और हाथियों के बीच टकराव आजीविका से जुड़ी सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बनकर उभरा है। रहने की जगहों और मार्गों के समाप्त होने और इंसानी बस्तियों के बढ़ने के कारण ये हाथी दोनों देशों में लोगों के साथ टकराव की स्थिति में आ जाते हैं। नेपाल और भारत के बीच जंगली हाथियों की सबसे अधिक आवाजाही झापा, बर्दिया और शुल्काफांटा में होती है।[viii] 10-30 हाथियों वाले झुंड नियमित रूप से नेपाल और भारत के बीच आते– जाते हैं।[ix]
हाथियों की इस आवाजाही से अक्सर फसलें और घर बर्बाद हो जाते हैं और इंसानों एवं मवेशियों की जान भी जाती है। हालांकि, संरक्षण एजेंसियों ने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर बिजली के बाड़े, पूर्व सूचना प्रणाली, वॉच टावर और जागरूकता कार्यक्रम जैसे उपाय किए हैं ताकि इंसानों और हाथी के बीच होने वाले टकराव को कम किया जा सके।[x] संरक्षण के कार्यों में स्थानीय समुदायों की अधिक भागीदारी की आवश्यकता है क्योंकि कई निवासी अब भी हाथियों को अपनी आजीविका के लिए खतरा मानते हैं।
भारत और नेपाल, दोनों ने ही हाथियों के संरक्षण के लिए एकतरफ़ा कदम उठाए हैं। भारत के "प्रोजेक्ट एलिफ़ेंट"[xi] आगे चल कर हाथी संरक्षण योजना के लिए राष्ट्रीय रूपरेखा से मज़बूत बनाया गया जिसमें आवासों को आपस में जोड़ना, इंसान और हाथी के बीच टकराव को दूर करना और गलियारे को बहाल करना शामिल था। प्रोजेक्ट एलिफ़ेंट के सहयोग से भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट (WTI) ने 2005 में "आवागमन का अधिकारः भारत के हाथी गलियारे " की शुरुआत की।
आवागमन का अधिकार ने चार क्षेत्रीय इलाकों में फैले हाथियों के गलियारे के बारे में विस्तृत जानकारी दी।[xii] इसी तरह, नेपाल ने एलिफ़ेंट एक्शन प्लान (2025-2035) अपनाया है। इसमें भी लगभग वही उद्देश्य हैं, लेकिन इसमें विशेष रूप से इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि भारत के साथ हाथियों की आबादी और उनके आवागमन के मार्गों के तालमेल एवं प्रबंधन के बिना नेपाल में हाथियों का संरक्षण संभव नहीं है।[xiii]
तालिका 1. भारत और नेपाल को जोड़ने वाले प्रमुख सीमा– पार गलियारे, नदी प्रणालियां और भूदृश्य और उनमें पाई जाने वाली प्रमुख प्रजातियां
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क्र. सं, |
गलियारे/ भूदृश्य |
भारत |
नेपाल |
प्रजातियां |
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1. |
शुक्लाफांटा– लग्गा बग्गा– पीलीभीत वन– दुधवा गलियारा |
पीलीभीत बाघ अभ्यारण्य; दुधवा बाघ अभ्यारण्य |
शुक्लाफांटा राष्ट्रीय उद्यान |
गैंडा, बाघ, हाथी |
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2. |
बर्दिया– कटर्नियाघाट– दुधवा– बसंत वन गलियारा |
कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य; दुधवा भू–दृश्य; बसंदा वन |
बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान |
गैंडा, बाघ, हाथी |
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3. |
खाता गलियारा |
कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य |
बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान |
गैंडा, बाघ, हाथी |
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4. |
करनाली गलियारा |
कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य |
बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान |
गैंडा, बाघ, हाथी |
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5. |
कामदि गलियारा |
सुहेलवा वन्यजीव अभ्यारण्य |
बांके राष्ट्रीय उद्यान |
बाघ, हाथी |
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6. |
लालझाड़ी गलियारा |
दुधवा बाघ अभ्यारण्य |
शुल्काफांटा राष्ट्रीय उद्यान |
गैंडा, बाघ, हाथी |
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7. |
बसंत गलियारा |
दुधवा बाघ अभ्यारण्य |
बसंत वन/ बर्दिया भू–दृश्य |
गैंडा, बाघ, हाथी |
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8. |
सोमेश्वर वन गलियारा |
वाल्मीकि बाघ अभ्यारण्य |
चितवन राष्ट्रीय उद्यान |
बाघ, हाथी |
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9. |
थोरी गलियारा |
वाल्मीकि बाघ अभ्यारण्य |
परसा राष्ट्रीय उद्यान |
हाथी |
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10. |
छेदिया गलियारा |
कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य |
बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान |
हाथी |
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11. |
ब्रह्मदेव गलियारा |
नंधौर वन्यजीव अभ्यारण्य |
शुक्लाफांटा राष्ट्रीय उद्यान |
हाथी, बाघ |
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12. |
महानंदा– कोलाबारी गलियारा |
महानंदा वन्यजीव अभ्यारण्य |
झापा वन |
हाथी |
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13. |
करनाली– घाघरा नदी प्रणाली |
घाघरा नदी घाटी |
करनाली नदी घाटी |
गंगेय डॉल्फिन |
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14. |
कोशी– कोसी नदी प्रणाली |
कोसी नदी घाटी |
कोशी नदी घाटी |
गंगेय डॉल्फिन |
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15. |
नारायणी– गंडक नदी प्रणाली |
गंडक नदी घाटी |
नारायणी नदी घाटी |
गंगेय डॉल्फिन |
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16. |
कंचनजंगा– खांगचेंद़जोंगा भूदृश्य |
खांगचेंदज़ोगा राष्ट्रीय उद्यान |
कंजनजंगा संरक्षण क्षेत्र |
हिम तेंदुआ |
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17. |
पश्चिमी नेपाल– उत्तर भारतीय गिद्ध फ्लाइवे |
पिथौड़ागढ़, चंपावत, लोहाघाट, पीलीभीत, लखिमपुर खीरी समेत उत्तराखंड और दुधवा राष्ट्रीय उद्यान, उत्तर प्रदेश |
शुक्लाफांटा |
गिद्ध की प्रजातियां |
स्रोतः लेखक ने विभिन्न उपलब्ध स्रोतों के आधार पर संकलित किया है।
एक सींग वाले गैंडे
एशिया में एक सींग वाले गैंडे (ग्रेटर वन– हॉर्न्ड राइनो) ही एकमात्र ऐसी बड़ी स्तनधारी प्रजाति है जिसे 2008 में IUCN की लाल सूची में लुप्तप्राय श्रेणी से हटाकर 'असुरक्षित' श्रेणी में रखा गया था।[xiv] यह भारत और नेपाल की सफल संरक्षण प्रयासों को दर्शाता है, भले ही ये कोशिशें बहुत हद तक एक–दूसरे से स्वतंत्र रही हों। तराई आर्क लैंडस्केप (TAL) दक्षिणी नेपाल के संरक्षित इलाकों जैसे चितवन, परसा और बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान को भारत के वाल्मीकि बाघ अभ्यारण्य और दुधवा राष्ट्रीय उद्यान से जोड़ता है जिससे गैंडों की आवाजाही के लिए साझा पारिस्थितिक भूदृश्य बनता है।[xv]
20वीं सदी की शुरुआत में गैंडों की आबादी खत्म होने की कगार पर थी और इनकी संख्या 200 से भी कम रह गई थी।[xvi] वर्ष 2025 तक भारत और नेपाल में एक सींग वाले गैंडों (राइनोसिरोस यूनिकॉर्निस/Rhinoceros unicornis) की कुल आबादी बढ़कर 4,000 हो गई थी।[xvii]
ऊपर तालिका 1 में गैंडों के प्रमुख गलियारों का उल्लेख किया गया है। चितवन राष्ट्रीय उद्यान और वाल्मीकि बाघ अभ्यारण्य के बीच गैंडों के आने–जाने की खबरें भी मिली हैं।[xviii] ऐसी रिपोर्टें इस बात पर ज़ोर देती हैं कि गैंडों के संरक्षण को केवल राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित रखने की बजाय उनके आवासों के बीच संपर्क बनाए रखना ज़रूरी है।
गैंडों के संरक्षण की सफलता का श्रेय दोनों देशों द्वारा उठाए गए स्वतंत्र कदमों को दिया जा सकता है। नेपाल में गैंडों को नेपाल के राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजन्तु संरक्षण अधिनियम, 1973 के तहत सुरक्षा दी गई है जो शिकार, अवैध शिकार और उनके रहने की जगह को नष्ट करने जैसी गतिविधियों को नियंत्रति करता है। वन और मृदा संरक्षण विभाग (DoFSC), राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव संरक्षण विभाग (DNPWC) एवं राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण ट्रस्ट (NTNC) और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ नेपाल (WWF Nepal) जैसे संगठन एवं स्थानीय समुदाय भी प्रत्येक 4 से 5 वर्षों में गैंडों की आबादी की गणना करते हैं।
नेपाल ने भी एक सींग वाले गैंडे के लिए अपनी पंच वर्षीय संरक्षण कार्य योजना (2017-2021) लागू किया जिसमें शानदार सफलता मिली और अब 2024-2034 की योजना पर काम जारी है।[xix] इस बीच, 2005 में भारत सरकार ने डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू इंडिया और इंटरनेशनल राइनो फाउंडेशन के साथ मिलकर इंडियन राइनो विज़न (IRV) 2020 प्रोग्राम को अपनाया।[xx] भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा उठाया गया एक और सकारात्मक कदम 2019 में गैंडों के लिए राष्ट्रीय संरक्षण रणनीति को अपनाना था।[xxi]
नेपाल और भारत में गैंडों के संरक्षण की सफलता में स्थानीय समुदायों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पोबितोरा वन्यजीव अभ्यारण्य में की गई पहलों से पता चलता है कि जब स्थानीय लोग संरक्षण कार्यों में सक्रिए रूप से भाग लेते हैं तो वह अधिक कारगर साबित होता है।[xxii]
आवास का बंटवारा, विस्तार करती मूलभूत सुविधाएं, अवैध शिकार और जलवायु परिवर्तन जैसे नए संकट अभी भी गैंडों के संरक्षण के लिए चुनौती बने हुए हैं। गैंडों को मारने के लिए स्थानीय लोगों द्वारा इलेक्ट्रिक ट्रैप के प्रयोग की खबरें चिंताजनक हैं और इनसे निपटने के लिए अधिक जागरूकता एवं प्रभावी तरीके से नियमों को लागू करने की आवश्यकता है।[xxiii]
बंगाल टाइगर
वर्ष 2026 के भारत–नेपाल समझौते के तहत शामिल प्रजातियों में बंगाल टाइगर सबसे महत्वपूर्ण है। इनके बड़े इलाके सीमाओं के पार फैले होते हैं इसलिए इनके संरक्षण के लिए सीमा–पार का सहयोग ज़रूरी है। इसलिए, बाघों की आबादी को बनाए रखने के लिए उनके आवास का आपस में जुड़ा होना बहुत ज़रूरी है क्योंकि उन्हें विस्तार करने और अलग– अलग आबादी के बीच आनुवंशिक आदान–प्रदान के लिए जंगलों से जुड़ाव की आवश्यकता पड़ती है।[xxiv] अखिल भारतीय बाघ अनुमान के अनुसार भारत में बाघों की संख्या 2006 की अनुमानित 1411 से बढ़कर दोगुनी हो कर 3,682 हो गई है[xxv] जबकि नेपाल 2022 में बाधों की संख्या को दोगुना करके 355 तक पहुँचने के वैश्विक TX2 लक्ष्य को पूरा करने वाला पहला देश बन गया है।[xxvi] TAL बाघ संरक्षण के सबसे प्रमुख क्षेत्रों में से एक के रूप में उभरा है। बाघों के प्रमुख गलियारे उपर तालिका 1 में दिए गए हैं।
भारत और नेपाल के बाघों के संरक्षण के लिए अलग– अलग और मिलकर कई पहल की हैं। भारत की पहलों में 1973 में शुरू किया गया प्रमुख संरक्षण कार्यक्रम “प्रोजेक्ट टाइगर” शामिल है जिसने सख्त सुरक्षा उपायों और विशेष अभ्यारणों के माध्यम से बाघों की आबादी को फिर से बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और 2023 में इसके 50 वर्ष पूरे हो गए हैं।[xxvii] इसने अखिल भारतीय बाघ अनुमान 2022 भी आयोजित किया था जिसके पांचवें चरण में यह बताया गया कि विश्व की 70% से अधिक बाघों की आबादी भारत में है।[xxviii]
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) विज्ञान–आधारित निगरानी, आवास प्रबंधन और अवैध शिकार रोकने की रणनीतियों को लागू करने की दिशा में काम करती है। नेपाल ने भी अवैध शिकार रोकने के कारगर उपाय किए, प्राकृतिक आवास को बहाल किया, खिकार बनने वाले जानवरों की आबादी बढ़ाई, राष्ट्रीय उद्यानों का विस्तार किया और भारत के साथ मिलकर वन्यजीव गलियारे बनाए, जिससे वहाँ बाघों की आबादी लगभग तीन गुना हो गई।[xxix]
यह काम सरकार और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (WWF) जैसे सहयोगियों के साथ मिलकर किया गया। साथ ही बाघ वाले इलाकों में रहने वाले समुदायों ने भी संरक्षण कार्यों में सक्रिए रूप से हिस्सा लिया जैसे कि समुदाय– आधारित अवैध शिकार–रोघी यूनिट बनाना। जंगल को फिर भी हरा– भरा करने के प्रयासों से खाटा वन संरक्षण क्षेत्र जैसे इलाकों को बदलने में मदद मिली है, जिससे यह 115 हेक्टेयर से बढ़कर 3800 हेक्टेयर का वन्यजीव गलियारा बन गया है।
आईयूसीएन सेव आवर स्पीशीज़ (IUCN Save Our Species–SOS) जैसे संगठनों ने "एकीकृत बाघ आवास संरक्षण कार्यक्रम" (ITHCP) जैसी पहल शुरू की हैं। यह कार्यक्रम तराई आर्क लैंडस्केप के भारत और नेपाल की सीमा पर मौजूद 5 संरक्षित इलाकों और उनसे जुड़े समुदायों के बीच काम करता है।[xxx] लंदन जूलॉजिकल सोसायटी और आईसीआईएमओडी ( ICIMOD) के अध्ययन के अनुसार, शिकार–रोधी सहयोग, बाघों पर संयुक्त अनुसंधान, गलियारों को फिर से दुरुस्त करना, कैमरा ट्रैप से निगरानी, स्मार्ट (SMART) पेट्रोलिंग और त्वरित प्रतिक्रिया नेटवर्क जैसी संयुक्त संरक्षण पहलों ने आवासों के बीच कनेक्टिविटी बनाए रखने में मदद की है।[xxxi]
गंगेय डॉल्फिन
वर्ष 2026 के समझौता ज्ञापन में उल्लिखित प्रजातियों में गंगेय डॉल्फिन (Gangetic Dolphins) विशेष रूप से मायने रखते हैं क्योंकि ये ज़मीन के अलावा सीमाओं के पार पारिस्थितिक सहयोग की आवश्यकता दर्शाती हैं। गंगेय डॉल्फिन वास्तव में नेत्रहीन होती हैं और केवल साफ़ पानी में ही रहती हैं जिससे उन पर संकट अधिक होता है। गंगेय डॉल्फिन को 2009 में भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया था[xxxii] और आईयूसीएन (IUCN) की लाल सूची में इसे "लुप्तप्राय" की श्रेणी में रखा गया था।[xxxiii]
अध्ययनों से पता चलता है कि गंगेय डॉल्फिन मुख्य रूप से तीन सीमा– पार नदियों– करनाली– घाघरा, नारायणी– गंडक और कोशी– कोसी के किनारे पाई जाती हैं।[xxxiv] डॉल्फिन नियमित रूप से कैलाली जिले की मोहना, पथरिया, कांद्रा और कांडा नदियों में प्रवास करती हैं क्योंकि मानसून के दौरान ये नदियाँ उनके भोजन और प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थिति बनाती हैं। इसलिए उनके संरक्षण के लिए नेपाल और भारत के बीच सहयोग आवश्यक है।
देशव्यापी सर्वेक्षण में भारत में अनुमानित 6,327 नदी डॉल्फिन दर्ज की गई थी[xxxv] जबकि 2016 में नेपाल में हुई पहली एकीकृत डॉल्फिन गणना में पूरे देश में कुल 52 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं।[xxxvi]
पारिस्थितिक जुड़ाव के साथ–साथ साझा संकट भी आते हैं। गंगेय डॉल्फिन को भी कई प्रकार के संकटों का सामना करना पड़ता है जैसे डॉल्फिन के तेल के लिए उनका शिकार, बांध और बैराज जैसी विकास परियोजनाओं की वजह से उनके आवास का बंट जाना, गलती से मारे जाना, प्रदूषण और गंगा घाटी में मीठे पानी वेला आवासों का समाप्त हो जाना।[xxxvii] इसकी वजह से उनकी संख्या कम हो रही है।
दोनों देशों ने अपने– अपने यहाँ संरक्षण के लिए उल्लेखनीय पहल की है। भारत ने 2020 में "प्रोजेक्ट डॉल्फिन" शुरू किया था जिसका उद्देश्य समुद्री और नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन और उनसे जुड़े दूसरे समुद्री स्तनधारी जीवों का संरक्षण करना था। इसके लिए उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा, वैज्ञानिक शोध और समुदाय में जागरूकता बढ़ाने जैसे उपाय किए जा रहे हैं। साथ ही भारतीय वन्यजीव संस्थान की अगुवाई में चल रहे प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत भारत ने 2024 में गंगा नदी की डॉल्फिन की पहली बार सैटेलाइट टैगिंग भी की।[xxxviii]
नेपाल में डॉल्फिन संरक्षण केंद्र (बर्दिया) और जैव–विविधता संरक्षण केंद्र जैसे संगठन स्थानीय मछुआरा समुदायों के साथ मिलकर गंगा नदी की डॉल्फिन और उनके प्राकृति आवास को बचाने, डॉल्फिन की गतिविधियों पर नज़र रखने, मछली पकड़ने के नुकसानदेह तरीकों को कम करने, जागरूकता बढ़ाने और भारत एवं नेपाल के बीच डॉल्फिन संरक्षण के लिए आपसी सहयोग को मज़बूत करने का काम करते हैं। इसने नेपाल– भारत के बीच संयुक्त समझौता ज्ञापन (एमओयू) के लिए संवाद को सरल बनाया, जिससे सीमा–पार प्राकृतिक आवास के संरक्षण के लिए भारतीय हितधारकों के साथ सहयोग बेहतर हुआ।[xxxix] संरक्षण नेतृत्व कार्यक्रम भारत और नेपाल के बीच सहयोग स्थापित करने में सफल रहा जिसके परिणामस्वरूप 2013 में करनाली नदी में पहली बार डॉल्फिन का संयुक्त सर्वेक्षण किया गया।[xl]
वर्ष 1994 से गंगेय डॉल्फिन की आबादी में 50% की कमी आई है[xli] और अध्ययन से लगातार यह पता चलता है कि उनके बचे रहने के लिए सीमाओं के पार कारगर सहयोग की ज़रूरत है।
हिम तेंदुआ
हिम तेंदुआ (पैंथेरा उनसिया/ Panthera uncia) हिमालय की प्रमुख प्रजातियों में से एक है, जो भारत और नेपाल की सीमा से सटे पहाड़ों में पाया जाता है। नेपाल का कंचनजंगा संरक्षण क्षेत्र भारत के कंजनजंगा राष्ट्रीय उद्यान के साथ अपनी सीमा साझा करता है जो भारत– नेपाल हिम तेंदुआ के लिए सीमा–पार का मुख्य इलाका बनाता है।[xlii]
भारत और नेपाल दोनों ही देशों ने 2013 के बिश्केक घोषणापत्र के माध्यम से 'वैश्विक हिम तेंदुआ और पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण कार्यक्रम' (GSLEP) पर हस्ताक्षर किए थे[xliii] और स्वीकार किया था कि संवेदनशील अल्पाइन पारिस्थितिकी तंत्र और पहाड़ी समुदायों की आजीविका के संरक्षण हेतु हिम तेंदुआ का संरक्षण भी आवश्यक है।
नेपाल में, हिम तेंदुए हिमालयी इलाकों में रहते हैं जहाँ उन्हें आवास के समाप्त होने, मवेशियों के नुकसान के बाद मारे जाने और शिकार योग्य आबादी के कम होने जैसे संकटों का सामना करना पड़ता है। संरक्षित इलाकों के प्रबंधन को बेहतर बनाने के बावजूद, पहाड़ी पारिस्थिती तंत्र में इंसानी गतिविधियों के बढ़ने से हिम तेंदुओं के अस्तित्व पर संकट बना हुआ है, इसलिए समुदाय की ठोस भागीदारी और सीमा–पार सहयोग आवश्यक है।[xliv]
संरक्षण के प्रयासों के सामने इंसान और जंगली जानवरों के बीच टकराव सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। हिम तेंदुओं की वजह से पालतू जानवरों के नुकसान और मुआवज़े की अपर्याप्त योजनाओं की वजह से अक्सर स्थानीय लोग बदले की भावना से उन्हें मार डालते हैं।[xlv]
इसलिए, दोनों देशों में हिम तेंदुए के संरक्षण में समुदाय–आधारित संरक्षण एक महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने वाला कारक है। हिम तेंदुआ संरक्षण संस्थान हिम तेंदुओं पर शोध को बढ़ावा देते हैं, समुदाय आधारित शिकार–रोधी दल अवैध शिकार को रोकते हैं और उपयोगकर्ता समूह सतत वन प्रबंधन को बढ़ावा देते हैं।[xlvi] हिमालय क्षेत्र में भारत की UNDP पहल इको– टूरिज़्म को बढ़ावा देती हैं, जलवायु के प्रति लचीले आय के स्रोत बनाती हैं और स्थानीय सामुदायिक संस्थाओं को बेहतर बनाती हैं। ये प्रयास हिम तेंदुए के संरक्षण में समुदायों की बढ़ती महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हैं।[xlvii]
नेपाल में हिम तेंदुआ को राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1973 के तहत संरक्षित स्तनधारी जीव के तौर पर सूचीबद्ध किया गया है।[xlviii] भारत सरकार का भारत में हिम तेंदुए की जनसंख्या का आकलन (SPAI) देश का पहला राष्ट्रव्यापी वैज्ञानिक जनसंख्या सर्वेक्षण था जिसमें भारत में 718 हिम तेंदुओं के होने की बात कही गई थी।[xlix] इसने हिमालयी राज्यों में समन्वित वैज्ञानिक अनुसंधान की आवश्यकता को दर्शाया और निगरानी हेतु मानकीकृत संरचना स्थापित किया। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (W W F) इंडिया, भारतीय हिमालय क्षेत्र में हिम तेंदुओं के प्राकृतिक आवास को बनाए रखने और उनके साथ होने वाले टकराव व अवैध शिकार को कम करने के लिए राज्य सरकारों एवं स्थानीय समुदायों के साथ भी काम करता है।[l]
गिद्ध
गिद्ध भी भारत और नेपाल के बीच साझा की जाने वाली सीमा–पार जैव–विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। भारत में पाई जाने वाली और मूल रूप से एशिया की चार गिद्ध प्रजातियों की आबाद में 1990 के दशक से भारी गिरावट देखी गई है। अब IUCN ने इन्हें 'गंभीर रूप से लुप्तप्राय /Critically Endangered’ की श्रेणी में रखा है क्योंकि इनके विश्व से पूरी तरह समाप्त हो जाने का खतरा है।[li]
हाल ही में गिद्धों की जीपीएस– टैगिंग से पता चला है कि वे सीमाओं के आर–पार आते– जाते रहते हैं। नेपाल पक्षी संरक्षण संघ के संरक्षणवादियों ने भारत और नेपाल के बीच सफ़ेद पीठ वाले गिद्ध (White rumped Vultures) की नियमित आवाजाही दर्ज की। ये गिद्ध पश्चिमी नेपाल और इससे सटे उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों के बीच बार–बार आते–जाते हैं। ये पिथौरागढ़, चंपावत, लोहाघाट, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी और दुधवा राष्ट्रीय उद्यान से होते हुए हिमाचल प्रदेश के पोंग डैम तक का 520 किमी का सफ़र तय करते हैं।[lii] यह भारत और नेपाल के बीच पारिस्थितिक संबंधों को दर्शाता है और समन्वित संरक्षण प्रयासों की आवश्यकता पर ज़ोर देता है।
जिप्स प्रजाति के गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट का मुख्य कारण जानवरों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली स्टेरॉयड रहित सूजनरोधी दवा (NSAID) डिक्लोफेनाक को माना गया है।[liii] नेपाल और भारत, दोनों ने 2006 में पशुओं के इलाज में डिक्लोफेनाक के प्रयोग पर रोक लगा दी थी। नेपाल ने गिद्ध संरक्षण कार्य योजनाओं के पहले और दूसरे चरण को सफलतापूर्वक लागू किया है और तीसरा चरण (2023-2027) अभी जारी है। इसने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर 2009 में गिद्ध सुरक्षित क्षेत्रों की पहल भी की थी।[liv]
भारत ने भी 2006 में जानवरों के इलाज में डिक्लोफेनाक के प्रयोग पर भी रोक लगा दी थी। इसने (2020-2025) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के माध्यम से अपने संरक्षण संरचना को मज़बूत बनाया है। इस योजना का उद्देश्य NSAIDs के प्रयोग को रोकना, गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र बनाना और प्रजनन केंद्रों की संख्या बढ़ाना है।[lv] हरियाणा सरकार और बॉम्बे प्राकृतिक इतिहास समिति (BNHS) की संयुक्त परियोजना जटायु संरक्षण और प्रजनन केंद्र, गिद्ध की सबसे संकटग्रस्त तीन प्रजातियों के संरक्षण का काम करती है।[lvi]
नेपाल के उलट भारत में डिक्लोफेनाक पर रोक लगने के बाद भी गिद्धों की आबादी में वैसा सुधार नहीं देखी गई है क्योंकि इस दवा का गैर–कानूनी प्रयोग अभी भी जारी है।[lvii] गिद्ध समाज में सफाई करने वालों (स्कैवेंजर्स) के रूप में महत्वपूर्ण पारिस्थितिक भूमिका निभाते हैं।[lviii]
भारत–नेपाल सीमा के आर– पार गिद्धों की आवाजाही को देखते हुए उनके संरक्षण के लिए मिलकर प्रयास करना ज़रूरी है। भारत और नेपाल में गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र बनाकर गिद्ध सरंक्षण के लिए मिली जुली रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से 2011 में दिल्ली और काठमांडू में सेविंग एशियाज़ वल्चर्स फ्रॉम एक्सटिंक्शन नाम का अंतरराष्ट्रीय संगठन शुरू किया गया था।[lix] नेपाल के संरक्षण संगठन अब भारत के उत्तर प्रदेश तक फैले गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र में टैग किए गए पक्षियों की निगरानी, बचाव अभियान चलाने[lx] और जागरूकता बढ़ाने के लिए बीएनएचएस जैसे भारतीय संस्थानों के साथ मिलकर काम करते हैं।[lxi]
विश्लेषण
इन प्रजातियों के संरक्षण के अनुभव इस बात को उजागर करते हैं कि सीमा पार जैव– विविधता प्रबंधन के लिए एकतरफा राष्ट्रीय प्रयास अक्सर अपर्याप्त होते हैं। बाघ और गैंडे का संरक्षण सीमावर्ती जैव विविधता संरक्षण क्षेत्र (TAL) में समन्वित भू–स्तरीय प्रबंधन के लाभों को दर्शाता है, जबकि हाथियों का संरक्षण खंडित गलियारों और मानव–वन्यजीव संघर्ष के कारण चुनौतियों का सामना कर रहा है।
इसी तरह आपस में जुड़ी नदियों में गंगेय डॉल्फिन की आवाजाही और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार जीपीएस से ट्रैक किए जाने वाले गिद्ध भी दो देशों के बीच पारिस्थितिक जुड़ाव को दिखाते हैं। वहीं दूसरी ओर, हिम तेंदुए संवेदनशील पहाड़ी प्रदेशों में जैव–विविधता के संरक्षण में समुदायों को शामिल करने के महत्व को उजागर करते हैं।
इन अनुभवों से कुछ आम बातें सामने आती हैं। पहली बात, प्रजातियों के लंबे समय तक जीवित रहने के लिए गलियारे, नदियों और साझा भूदृश्य के माध्यम से पारिस्थितिक कनेक्टिविटी बहुत ज़रूरी है। दूसरी बात, बफ़र–जोन प्रबंधन, टकराव को सुलझाने और जागरूकता कार्यक्रमों जैसे तरीकों से समुदाय की भागीदारी प्रजातियों के संरक्षण में बड़ी भूमिका निभा सकती है। तीसरी बात, संयुक्त निगरानी, आबादी के सर्वेक्षण, जानकारी के आदान– प्रदान और जीपीएस ट्रैकिंग के माध्यम से वैज्ञानिक तालमेल, वन्यजीवों के क्षेत्र में प्रभावी सहयोग के नए आधार बन गए हैं।
निष्कर्ष
वन, वन्यजीव संरक्षण, जैव–विविधता की सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन पर 2026 का भारत– नेपाल समझौता केवल पर्यावरण संबंधी द्विपक्षीय समझौता नहीं है। यह भारत– नेपाल संबंधों में जैव–विविधता संरक्षण को रणनीतिक आधार के रूप में संस्थागत रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहला कदम है। इस अध्ययन के नतीजे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि एशियाई हाथी, एक सींग वाले गैंडे, बंगाल टाइगर, गंगेय डॉल्फिन, हिम तेंदुए और गिद्ध जैसी साझा प्रजातियों का संरक्षण, दोनों देशों को जोड़ने वाले सीमा–पास आवासों की सुरक्षा से जुड़ा है।
इसलिए, समझौते को लागू करने के लिए समुदाय के स्तर पर लोगों की भागीदारी भी आवश्यक हो जाती है। समय के साथ, इस समझौते में प्रजातियों के संरक्षण से आगे बढ़कर, साझा इलाकों में सीमा– पार इको– टूरिज़्म, टिकाऊ आजीविका और जलवायु के प्रति मज़बूती को बढ़ावा देने की क्षमता है। इससे लंबे समय तक संरक्षण के नतीजों के साथ– साथ सीमावर्ती समुदायों का भी कल्याण होगा। इस समझौते को कारगर तरीके से लागू करने से यह सीमा–पार संरक्षण हेतु व्यापक मॉडल के रूप में उभरेगा जो दक्षिण एशिया में पर्यावरण कूटनीति और सहयोग का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करेगा।
*****
*शालिनी सरकार, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण:
[i] Press Information Bureau, Government of India, Ministry of Environment, Forest and Climate Change, “India and Nepal Sign MoU to Strengthen Cooperation in Forests, Wildlife, Environment, Biodiversity Conservation and Climate Change,” February 25, 2026, https://www.pib.gov.in/PressReleseDetailm.aspx?PRID=2232834.
[ii] Ibid.
[iii] Ibid.
[iv] Government of Nepal, Elephant Conservation Action Plan for Nepal (2025–2035) (Kathmandu: Department of National Parks and Wildlife Conservation, Ministry of Forests and Environment, 2025), https://www.ntnc.org.np/sites/default/files/doc_publication/2025-05/Elephant_Action%20Plan_Nepal_2025_2035_.pdf.
[v]Project Elephant, Ministry of Environment, Forest and Climate Change, Government of India, and Wildlife Institute of India, Framework for Preparation of Elephant Conservation Plan (ECP) for the Elephant Reserves (New Delhi and Dehradun: Ministry of Environment, Forest and Climate Change and Wildlife Institute of India, 2024), https://moef.gov.in/uploads/pdf/framework_preparation_elephant_conservation_plan.pdf.
[vi] Government of Nepal, Elephant Conservation Action Plan for Nepal (2025–2035), 11, 30.
[vii]Project Elephant, Ministry of Environment, Forest and Climate Change, Government of India, Elephant Corridors of India, 2023 (New Delhi: Ministry of Environment, Forest and Climate Change, 2023), https://moef.gov.in/uploads/2023/11/PE-Elephant-Corridor-of-India-2023.pdf.
[viii] Government of Nepal, Elephant Conservation Action Plan for Nepal.
[ix] Ibid.
[x] Zoe Osborne, “The Elephants Who Destroy Livelihoods and Lives in Nepal on Their Desperate Search of Food,” ABC News (Australia), December 31, 2023, https://www.abc.net.au/news/2023-12-31/elephants-who-destroy-livelihoods-and-lives-in-nepal/102565772.
[xi] Project Elephant and Wildlife Institute of India, Framework for Preparation of Elephant Conservation Plan (ECP) for the Elephant Reserves.
[xii]ibid.
[xiii] Government of Nepal, Elephant Conservation Action Plan for Nepal
[xiv] Amit Sharma, “Protect the Indian Rhino, Secure Our Grasslands,” WWF India, accessed July 7, 2026, https://www.wwfindia.org/wwf-india-updates/feature_stories/protect_the_indian_rhino_secure_our_grasslands/
[xv] Bibhab Kumar Talukdar and Satya Priya Sinha, “Challenges and Opportunities of Transboundary Rhino Conservation in India and Nepal,” Pachyderm 54 (July–December 2013): 45–51, https://www.researchgate.net/publication/281153681_Challenges_and_opportunities_of_transboundary_rhino_conservation_in_India_and_Nepal.
[xvi] Sharma, “Protect the Indian Rhino, Secure Our Grasslands.”
[xvii] World Wildlife Fund, “Greater One-Horned Rhino,” World Wildlife Fund, accessed July 7, 2026, https://www.worldwildlife.org/species/rhino/greater-one-horned-rhino.
[xviii] Talukdar and Sinha, “Challenges and Opportunities of Transboundary Rhino Conservation in India and Nepal.”
[xix] Government of Nepal, Department of National Parks and Wildlife Conservation, Ministry of Forests and Environment, The Greater One-horned Rhinoceros (Rhinoceros unicornis) Conservation Action Plan for Nepal (2024–2034) (Kathmandu: Department of National Parks and Wildlife Conservation, 2024), https://giwmscdntwo.gov.np/media/pdf_upload/Rhino%20Conservation%20Action%20Plan%20(2024-2034)_qg57czv.pdf.
[xx] Press Information Bureau, Government of India, Ministry of Environment, Forest and Climate Change, India's Wildlife Conservation Milestones (New Delhi: Press Information Bureau, March 3, 2025), https://static.pib.gov.inhttps://www.icwa.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2025/mar/doc202533511501.pdf
[xxi] Ibid.
[xxii] International Union for Conservation of Nature Species Survival Commission Species Conservation Action, “Strengthening Rhino Conservation through Community Stewardship in Pobitora, India,” IUCN SOS, accessed July 7, 2026, https://www.iucnsos.org/projects/strengthening-rhino-conservation-through-community-stewardship-in-pobitora-india/
[xxiii] Ramesh Kumar Paudel, “Electric Traps Emerge as Growing Threat to Rhino Conservation in Nepal,” The Kathmandu Post, May 17, 2026, https://kathmandupost.com/province-no-3/2026/05/17/electric-traps-emerge-as-growing-threat-to-rhino-conservation-in-nepal.
[xxiv] National Tiger Conservation Authority and Wildlife Institute of India, Connecting Tiger Populations for Long-Term Conservation (New Delhi: National Tiger Conservation Authority, Ministry of Environment, Forest and Climate Change, Government of India, 2014), https://ntca.gov.in/assets/uploads/Reports/corridor/connecting_tiger_populations.pdf
[xxv] Press Information Bureau, Government of India, Ministry of Environment, Forest and Climate Change, “Parliament Question: Increase in Tiger Population,” November 25, 2024, https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2076921®=48&lang=2
[xxvi] World Wildlife Fund, “Nepal Nearly Triples Its Wild Tiger Population,” World Wildlife Fund, July 29, 2022, https://www.worldwildlife.org/news/stories/nepal-nearly-triples-its-wild-tiger-population.
[xxvii] Press Information Bureau, India's Wildlife Conservation Milestones.
[xxviii] Ibid.
[xxix] Manoj Paudel, Dipendra Baduwal, and Ramesh Kumar Paudel, “Tigers Thrive, Conflicts Decline in Nepal,” The Kathmandu Post, July 29, 2025, https://kathmandupost.com/national/2025/07/29/tigers-thrive-conflicts-decline-in-nepal
[xxx]International Union for Conservation of Nature Species Survival Commission Species Conservation Action, “Supporting Trans-boundary Tiger Recovery in India and Nepal – Phase III,” IUCN SOS, accessed July 8, 2026, https://www.iucnsos.org/projects/supporting-trans-boundary-tiger-recovery-in-india-and-nepal-phase-iii/
[xxxi] Zoological Society of London, “Transboundary Tigers and Elephants in India and Nepal,” ZSL, accessed July 8, 2026, https://www.zsl.org/what-we-do/projects/transboundary-tigers-and-elephants-india-and-nepal.
[xxxii] Ravindra K. Sinha and Kurunthachalam Kannan, “Ganges River Dolphin: An Overview of Biology, Ecology, and Conservation Status in India,” Ambio 43, no. 8 (2014): 1029–1046, https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC4235892/
[xxxiii] Ibid.
[xxxiv] Gopal Khanal and Nachiket Kelkar, Understanding the Effects of Trans-boundary Barrage Operations on the Nepal–India Border for Ganges River Dolphin Habitat and Population Dynamics: Final Report Submitted to the IWC Small Cetacean Fund (2021–23 Grant Round) (International Whaling Commission, December 2023), https://iwc.int/public/documents/D0n8R/Khanal-and-Kelkar_IWC-Nepal-India-FINAL-project-report-%28002%29.pdf
[xxxv] Press Information Bureau, Government of India, Ministry of Environment, Forest and Climate Change, “Second Rangewide Estimation of Riverine and Estuarine Dolphins in India Starts from Bijnor,” January 17, 2025, https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2215575®=3&lang=1
[xxxvi] Chandan Kumar Mandal, “Migratory Dolphins Return to Nepali Waters Earlier than Usual,” The Kathmandu Post, June 18, 2020, https://kathmandupost.com/climate-environment/2020/06/18/migratory-dolphins-return-to-nepali-waters-earlier-than-usual.
[xxxvii] Wildlife Institute of India, “Gangetic Dolphin,” National Mission for Clean Ganga – Priority Species, last updated February 22, 2024, https://v1.wii.gov.in/nmcg/priority-species/mammals/ganges-river-dolphin.
[xxxviii] Press Information Bureau, India's Wildlife Conservation Milestones.
[xxxix] Biodiversity Conservation Center, Nepal, “Conservation of the Endangered Ganges River Dolphin (Platanista gangetica) in Koshi Tappu, Nepal,” BCCN, accessed July 8, 2026, https://www.bccn.org.np/projects/detail.php?id=13.
[xl] Gopal Khanal, Dipendra Nath, Ram Autar Chaudhary, and Bhoj Raj Dhungana, Ecology and Conservation of Ganges River Dolphin (Platanista gangetica gangetica) in the Karnali River, Nepal: Final Technical Report (Conservation Leadership Programme, September 21, 2015), https://www.conservationleadershipprogramme.org/wp-content/uploads/2024/12/03119513_Nepal_FinalReport_Ecology-and-Conservation-of-Ganges-River-Dolphin-in-Karnali_21Sept15.pdf.
[xli] Ibid.
[xlii] Bibek Bhandari, “Snow Leopards Frequently Cross Nepal, India, China Borders, Study Finds,” Focusing on Wildlife, June 12, 2025, https://focusingonwildlife.com/news/snow-leopards-frequently-cross-nepal-india-china-borders-study-finds/.
[xliii] Global Snow Leopard and Ecosystem Protection Program, The Bishkek Declaration on the Conservation of the Snow Leopard, adopted October 23, 2013, https://globalsnowleopard.org/bishkek-declaration/
[xliv] Manoj Paudel, “Snow Leopards in Nepal: Rare Predators of High Himalayas,” The Kathmandu Post, October 23, 2025, https://kathmandupost.com/national/2025/10/23/snow-leopards-in-nepal-rare-predators-of-high-himalayas.
[xlv] World Wildlife Fund, “Where Do Snow Leopards Live? And 9 Other Snow Leopard Facts,” World Wildlife Fund, accessed July 9, 2026, https://www.worldwildlife.org/resources/facts/where-do-snow-leopards-live-and-nine-other-snow-leopard-facts/.
[xlvi] Sheren Shrestha, “Saving the Ghosts of the Mountains,” The Kathmandu Post, October 24, 2017, https://kathmandupost.com/opinion/2017/10/24/saving-the-ghosts-of-the-mountains.
[xlvii] United Nations Development Programme, Securing Livelihoods in the Himalayas, accessed July 9, 2026, https://www.undp.org/india/projects/securing-livelihoods-himalayas .
[xlviii] Pratistha Shrestha, Dipesh Kumar Sharma, Prakash Shah, and others, “Tracking the Ghosts of the Himalayas: Snow Leopard Conservation Insights from Satellite Collar Data,” Ecology and Evolution 15, no. 1 (2025): e70802, https://onlinelibrary.wiley.com/doi/full/10.1002/ece3.70802 .
[xlix] Wildlife Institute of India, Status of Snow Leopard in India (Dehradun: Wildlife Institute of India, Ministry of Environment, Forest and Climate Change, Government of India, 2024), https://v1.wii.gov.in/status\_snow\_leopard\_2024 .
[l] WWF India, “Save the Snow Leopard – Protect Our Lifeline,” WWF India, accessed July 8, 2026, https://www.wwfindia.org/about_wwf/priority_species/save_the_snow_leopard/.
[li] SAVE (Saving Asia’s Vultures from Extinction), Saving India’s Vultures from Extinction: Summary & Policy Statement (2025), https://save-vultures.org/wp-content/uploads/2025/09/Vulture-policy-brief-India-2025.pdf.
[lii] Bhawani Bhatta, “Conservationists Track Vultures with GPS Device,” The Kathmandu Post, October 7, 2025, https://kathmandupost.com/sudurpaschim-province/2025/10/07/conservationists-track-vultures-with-gps-device.
[liii] SAVE, Saving India's Vultures from Extinction.
[liv] Government of Nepal, Ministry of Forests and Environment, Department of National Parks and Wildlife Conservation, and Department of Forests and Soil Conservation, Vulture Conservation Action Plan (2023–2027) (Kathmandu: Government of Nepal, 2023), https://save-vultures.org/wp-content/uploads/2023/08/Vulture-Conservation-Action-Plan-2023-2027_Final-15-August-2023.pdf.
[lv] Ministry of Environment, Forest and Climate Change, Government of India, Action Plan for Vulture Conservation in India (2020–2025) (New Delhi: Ministry of Environment, Forest and Climate Change, 2020), https://save-vultures.org/wp-content/uploads/2020/11/20-11-India-National-Vulture-Action-Plan-2020-25.pdf.
[lvi] Haryana Forest Department, “Vulture Conservation and Breeding Centre, Pinjore,” accessed July 8, 2026, https://haryanaforest.gov.in/vulture-conservation-and-breeding-centre-pinjore/.
[lvii] SAVE, Saving India's Vultures from Extinction.
[lviii] Ibid.
[lix] Khanal et al., Ecology and Conservation of Ganges River Dolphin in the Karnali River, Nepal.
[lx] Bhatta, “Conservationists Track Vultures with GPS Device.”
[lxi] Vulture Conservation Foundation, “First Release of Critically Endangered Captive-bred Vultures in Nepal,” 4 Vultures, November 30, 2017, https://4vultures.org/blog/first-release-of-critically-endangered-captive-bred-vultures-in-nepal/.