सार: आईपीओआई में नॉर्वे के शामिल होने से भारत की समुद्री साझेदारी का दायरा हिंद-प्रशांत क्षेत्र से आगे बढ़ जाता है। यह शिपिंग, पर्यावरण-अनुकूल समुद्री प्रथाओं और आर्कटिक अनुसंधान में सहयोग के अवसर पैदा करेगा।
प्रस्तावना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 मई 2026 को नॉर्वे का दौरा किया; चार दशकों से भी ज़्यादा समय में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का यह पहला दौरा था, जो दोनों देशों के संबंधों में एक अहम पड़ाव है। इस दौरे के दौरान, भारत और नॉर्वे अपने संबंधों को 'ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' (हरित रणनीतिक साझेदारी) के स्तर तक बढ़ाने पर सहमत हुए। इस दौरे का एक और अहम नतीजा नॉर्वे का 'इंडो-पैसिफिक ओशन इनिशिएटिव' (IPOI) में शामिल होना था। यह पहल भारत सरकार ने 2019 में 'क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास' (SAGAR) के विज़न के आधार पर शुरू की थी। इससे पहले जनवरी 2026 में स्पेन भी IPOI में शामिल हुआ था। यह भारत के हिंद-प्रशांत समुद्री एजेंडे में शामिल होने को लेकर यूरोपीय देशों की बढ़ती दिलचस्पी को दिखाता है। नॉर्वे का IPOI में शामिल होना पहली बार नहीं है जब उसने भारत के साथ कोई मंच साझा किया है। यह 2022 से अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का सदस्य है और अन्य प्लेटफ़ॉर्म जैसे कि आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन और वैश्विक बायोफ्यूल गठबंधन का भी हिस्सा है, जो द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग के निरंतर विस्तार को दर्शाते हैं। इस तरह, IPOI इस लंबे क्रम में एक और कदम है।[i] नॉर्वे दुनिया के प्रमुख समुद्री देशों में से एक है, जिसके पास शिपिंग, समुद्री तकनीक और समुद्री शासन के क्षेत्रों में उन्नत क्षमताएं हैं। इसलिए, नॉर्वे के हिंद-प्रशांत में शामिल होने से भारत की समुद्री साझेदारी मजबूत हुई है, साथ ही तकनीकी विशेषज्ञता के माध्यम से आईपीओआई में नए आयाम आए हैं।[ii]
इस पृष्ठभूमि में, यह लेख भारत और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए IPOI में नॉर्वे के शामिल होने से जुड़े रणनीतिक अवसरों और प्रभावों का विश्लेषण करता है।
समुद्र के लिए भारत की योजना: सागर से महासागर तक
हाल के वर्षों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति भारत का नज़रिया और मज़बूत हुआ है। इसकी शुरुआत 2015 में SAGAR से हुई, फिर 2019 में IPOI आया और हाल ही में इसका विस्तार 'MAHASAGAR' (Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions) के रूप में हुआ है। IPOI समुद्री क्षेत्र में चुनौतियों को कम करने के लिए एक खुली, समावेशी और बिना संधि वाली वैश्विक पहल है। यह सात स्तंभों पर काम करता है: समुद्री सुरक्षा, समुद्री पर्यावरण, समुद्री संसाधन, क्षमता निर्माण, आपदा जोखिम कम करना, व्यापार कनेक्टिविटी और विज्ञान व तकनीक का हस्तांतरण।[iii]
इसलिए, IPOI में नॉर्वे को शामिल किए जाने को भारत की समुद्री रणनीति के व्यापक विकास के नज़रिए से देखा जाना चाहिए। जहाँ SAGAR की शुरुआत में ध्यान मुख्य रूप से हिंद महासागर पर था, वहीं MAHASAGAR के ज़रिए भारत का विज़न धीरे-धीरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की ओर बढ़ा है। भारत का नज़रिया हमेशा एक जैसा रहा है: पड़ोसियों या फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, स्पेन और अब नॉर्वे जैसे दूर के देशों के साथ खुली और स्वेच्छा से बनी साझेदारियाँ, न कि सख़्त गठबंधन। यह दृष्टिकोण समुद्री अमृत काल विज़न 2047 का पूरक है, जिसका लक्ष्य बंदरगाह अवसंरचना को मजबूत करना, एक वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धी शिपबिल्डिंग उद्योग विकसित करना, और सतत समुद्री विकास को प्रोत्साहित करना है।[iv]
2026 संयुक्त वक्तव्य: साझा दृष्टिकोण
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान जारी भारत-नॉर्वे संयुक्त बयान, व्यापक रणनीतिक तालमेल को समुद्री सहयोग के ठोस क्षेत्रों में बदलता है। दोनों देशों के नेताओं ने 2019 ओशन डायलॉग के दौरान स्थापित ढांचे पर आधारित ब्लू इकोनॉमी में सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। उन्होंने 'समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन' (UNCLOS) के महत्व और जहाजों की निर्बाध आवाजाही व नौवहन की स्वतंत्रता के प्रति सम्मान को मान्यता दी। इसमें इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि दोनों देश इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइज़ेशन में साथ मिलकर काम करते रहने पर सहमत हुए हैं। इसमें 'ग्रीन वॉयेज 2050' क्लीन शिपिंग प्रोजेक्ट और सस्टेनेबल ओशन मैनेजमेंट (समुद्र का टिकाऊ प्रबंधन) व प्लास्टिक प्रदूषण के क्षेत्र में सहयोग भी शामिल है। नॉर्वे ने नॉर-शिपिंग 2027 (एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मेला और नेटवर्किंग कार्यक्रम) के संबंध में भारत के फैसले का स्वागत किया, जहां दोनों नेताओं ने शिपिंग, मछली पकड़ने और समुद्री खाद्य क्षेत्र पर सहयोग के महत्व को पहचाना। यह बयान नॉर्वे के स्वालबार्ड में भारत के हिमाद्री रिसर्च स्टेशन के आधार पर, ध्रुवीय अनुसंधान में सहयोग को और मजबूत करता है। आर्कटिक एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ ध्रुवीय बर्फ पिघलने से नए शिपिंग मार्ग खुलेंगे।
साझा अवसरों और चुनौतियों के बीच भारत-नॉर्वे संबंध
नॉर्वे का IPOI में शामिल होने का फैसला उसके रणनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं के व्यापक पुनर्मूल्यांकन को दर्शाता है। एक ऐसा देश जो समुद्र पर बहुत निर्भर है, नॉर्वे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की उपेक्षा करने का जोखिम नहीं ले सकता। इस पहल से नॉर्वे को तेज़ी से बढ़ते हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साथ अपने संबंध मज़बूत करने; समुद्री व्यापार, ग्रीन शिपिंग, ऑफशोर एनर्जी, टिकाऊ मछली पालन और महासागर प्रशासन में सहयोग बढ़ाने; और ब्लू इकोनॉमी में अपनी विशेषज्ञता को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी। एक प्रमुख समुद्री और व्यापारिक देश होने के नाते, नॉर्वे की हिंद-प्रशांत क्षेत्र में खुले, सुरक्षित और नियमों पर आधारित समुद्री मार्गों को बनाए रखने में भी गहरी दिलचस्पी है, जिनसे होकर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। नॉर्वे के शिपिंग उद्योग और निर्यात-केंद्रित अर्थव्यवस्था के लिए समुद्री रास्तों पर आवाजाही की आज़ादी और स्थिरता बनाए रखना ज़रूरी है, इसलिए समुद्री सुरक्षा उसकी गतिविधियों का एक मुख्य आधार है।[v]
नॉर्वे का समुद्री नज़रिया उसकी भौगोलिक स्थिति और आर्थिक ढांचे से गहराई से जुड़ा हुआ है। उसके पास दुनिया के सबसे बड़े समुद्री शिपिंग बेड़ों में से एक है, साथ ही बड़े पैमाने पर ऑफशोर तेल और प्राकृतिक गैस उद्योग, और समुद्री रिसर्च व टिकाऊ मछली पालन प्रबंधन में विशेषज्ञता भी है। पहले, नॉर्वे का रणनीतिक ध्यान ज्यादातर आर्कटिक या हाई नॉर्थ और नाटो की उत्तरी सीमा पर केंद्रित था। नॉर्वे के आईपीओआई में शामिल होने का वर्तमान विकास एशिया की ओर इसके बाहरी रुझान को इंगित करता है। यह चीन की आर्कटिक में बढ़ती रुचि, बढ़ती अमेरिकी-चीन प्रतिद्वंद्विता और कमजोर होती अटलांटिक संबंधों से उत्पन्न जोखिमों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है।[vi] IPOI में नॉर्वे की भागीदारी उसे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री नियमों और कानूनों को तय करने में सीधे तौर पर असर डालने का मौका देती है। इससे उसकी निर्भरता कम होती है और वह केवल एक ऑब्ज़र्वर (पर्यवेक्षक) की भूमिका से आगे बढ़कर, उन चर्चाओं में ज़्यादा सक्रिय भागीदार बन पाता है जिन पर अब तक मुख्य रूप से चीन और अमेरिका का प्रभाव रहा है। इसके अलावा, IPOI नॉर्वे को पारंपरिक यूरो-अटलांटिक दायरे से आगे बढ़कर अपनी विदेश नीति के सहयोग का विस्तार करने का मौका देता है। इससे वह बढ़ते भू-राजनीतिक और आर्थिक महत्व वाले क्षेत्र में समुद्री नियम बनाने और समुद्र के टिकाऊ प्रबंधन को बढ़ावा देने में ज़्यादा सक्रिय भूमिका निभा सकता है।
सोच में आए इस बदलाव से भारत की अपनी रणनीतिक गणना को सीधे तौर पर फ़ायदा होता है। नॉर्वे के IPOI में शामिल होने से भारत के लिए इसकी रणनीतिक अहमियत बढ़ जाती है। इससे IPOI बड़ा और मज़बूत बनता है, क्योंकि यह सिर्फ़ एक क्षेत्रीय समूह नहीं है। नॉर्वे समुद्र में क्लीन एनर्जी, ग्रीन शिपिंग और ओशन मैनेजमेंट के क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता लेकर आया है, जो 'मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047' के तहत भारत के लक्ष्यों के अनुरूप हैं। भारत और नॉर्वे की हरित रणनीतिक साझेदारी में कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (सीसीयूएस), कम उत्सर्जन वाले शिपिंग बुनियादी ढांचे और स्वच्छ ऊर्जा पहल के लिए वित्त पोषण पर संयुक्त सहयोग शामिल है। भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जलवायु आधारित गठबंधनों को CCUS, हरे हाइड्रोजन, ऑफशोर विंड और जहाज पुनर्चक्रण में वास्तविक औद्योगिक क्षमता के माध्यम से लागू किया जाए। भारत CCUS को अपनी अन्य पहलों जैसे पंचामृत लक्ष्य, राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना में शामिल कर सकता है।[vii]
सहयोग और तकनीक हस्तांतरण के अलावा, यह साझेदारी प्रशिक्षण और ज्ञान-साझाकरण में महत्वपूर्ण संस्थागत और क्षमता-विकास लाभ भी प्रदान करती है, जो अवैध मछली पकड़ने, महासागरीय प्रदूषण और असुरक्षित जहाज़ जैसी आम समस्याओं को हल करने में मदद कर सकते हैं। इसके अलावा, भारत आर्कटिक में रूस समेत कई देशों के साथ साझेदारी करके अपनी मौजूदगी को बड़ा और ज़्यादा संतुलित बना रहा है, ताकि पोलर रिसर्च में उसकी भागीदारी और बढ़ सके। इस कोशिश के तहत, 'इंडिया-EFTA ट्रेड एंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप' (जिसके चार सदस्य देशों में नॉर्वे भी शामिल है) से भारत में और ज़्यादा यूरोपीय निवेश आने और भारत में रहने वाले नागरिकों के लिए और नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है।[viii]
इस बढ़ती नज़दीकी के बावजूद, कुछ रणनीतिक मतभेद अभी भी बने हुए हैं, खासकर आर्कटिक और रूस के साथ संबंधों को लेकर। दोनों देशों के रूस के साथ संबंध अलग-अलग स्तर के हैं। भारत रूस के साथ अपने संबंधों को 'विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी' कहता है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है और उसने आर्कटिक शिपिंग लिंक को बढ़ाने के लिए समझौते किए हैं, जिनमें नॉर्दर्न सी रूट, चेन्नई-व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट का आपसी आदान-प्रदान (RELOS) शामिल हैं। इससे भारत को रूस के आर्कटिक बंदरगाहों, जैसे कि मुरमान्स्क, तक कुछ हद तक पहुँच मिलती है।[ix] दूसरी ओर, नॉर्वे ने यूक्रेन संघर्ष के बाद रूस के प्रति अपनी नीति में बुनियादी बदलाव किया है। नॉर्वे ने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं और ज़्यादातर रूसी जहाज़ों के अपने बंदरगाहों का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी है। हालांकि दोनों देश आर्कटिक में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं, फिर भी भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए उभरते अवसरों का लाभ उठाना चाहिए।[x]
उपसंहार
नॉर्वे की इंडो-पैसिफिक ओशन इनिशिएटिव में भागीदारी सिर्फ भारत की समुद्री रणनीति में एक और सहयोगी को शामिल करने से ज्यादा है। यह एक व्यापक समुद्री संरचना के क्रमिक निर्माण को दर्शाता है जो हिंद महासागर को आर्कटिक के साथ जोड़ता है। यह दो सच्ची समुद्र-केन्द्रित देशों को दिखाता है, भारत, जो SAGAR और MAHASAGAR के तहत समुद्री महत्वाकांक्षा रखता है, और नॉर्वे, जिसकी मजबूत आर्कटिक और महासागरीय परंपराएँ हैं, एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। भारतीय पक्ष को इस अवसर का फायदा उठाना चाहिए और नॉर्वे की पर्यावरण-अनुकूल तकनीक का अन्वेषण करना चाहिए। उचित सतत राजनीतिक प्रतिबद्धता, संस्थागत समन्वय और परियोजना-आधारित सहयोग के साथ, नॉर्वे−आईपीओआई साझेदारी भारत की विकसित होती हिंद-प्रशांत रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकती है।
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*निधि यादव, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण:
[i] News on Air, All India Radio, Government of India. “India welcomes Spain joining Indo-Pacific Oceans Initiative.” January 21, 2026. https://www.newsonair.gov.in/india-welcomes-spain-joining-indo-pacific-oceans-initiative
[ii] Indian Council of World Affairs / Ministry of External Affairs, Government of India. “Indo-Pacific Oceans Initiative (IPOI).” /pdfs/IndoPacificOceansInitiative.pdf
[iii] Ministry of External Affairs, Government of India. “India-Norway Joint Statement.” May 18, 2026. https://www.mea.gov.in/press-releases?dtl/41184
[iv] Ministry of Ports, Shipping and Waterways, Government of India. “Maritime Amrit Kaal Vision 2047.” shipmin.gov.in. https://shipmin.gov.in/en/content/maritime-amrit-kaal-vision-2047
[v] Royal Norwegian Embassy in India, “Enhancing Maritime Security: A Case for International Cooperation,” accessed June 24, 2026, https://www.norway.no/en/india/norway-india/news-and-events/newsnde/enhancing-maritime-security-a-case-for-international-cooperation/
[vi] Government of Norway. “Norway and India to strengthen cooperation.” regjeringen.no, May 19, 2026. https://www.regjeringen.no/en/whats-new/norway-and-india-to-strengthen-cooperation/id3160149/
[vii] Tribune India. “India, Norway seal 12 agreements to deepen green strategic partnership during PM Modi's visit.” May 18, 2026. https://www.tribuneindia.com/news/world/india-norway-seal-12-agreements-to-deepen-green-strategic-partnership-during-pm-modis-visit/
[viii] Press Information Bureau, Government of India. “Honourable Union Minister Shri Kiren Rijiju launches India’s maiden winter scientific Arctic expedition.” December 18, 2023. https://www.pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1987724
[ix] Press Information Bureau, Government of India. “Text of Union Minister Shri Sarbananda Sonowal speech at INDIA-RUSSIA WORKSHOP: Operationalisation of Chennai-Vladivostok Eastern Maritime Corridor.” 2023. https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1999073
[x] Government of Norway. “New sanctions against Russia incorporated into Norwegian law.” regjeringen.no, April 29, 2022. https://www.regjeringen.no/en/whats-new/new-sanctions-against-russia-incorporated-into-norwegian-law/id2910809