सार: समकालीन सामरिक परिवेश गठबंधनों, सहयोग और साझेदारियों की प्रकृति में एक परिवर्तनकारी बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। जापान, जो शीत युद्ध के बाद से परंपरागत रूप से अमेरिका पर बहुत अधिक निर्भर रहा है, वाशिंगटन के नेतृत्व वाली द्विपक्षीय संधि गठबंधन संरचना से अलग लघुपक्षवाद के एक ऐसे मॉडल की ओर अपने कदम बढ़ा रहा है जो जापान को अपनी स्थिति के आधार पर और समान विचारधारा वाले देशों के साथ साझेदारी में क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा में योगदान देने का अधिक उत्तरदायित्व लेने की अनुमति देता है। यह लेख आज के खंडित भू– राजनीतिक परिदृश्य में जापान के लघुपक्षवाद (मिनीलैटरलिज़्म) की ओर रुख को आकार देने वाली अंतर्निहित प्रेरणाओं की पड़ताल करता है।
परिचय: लघुपक्षवाद के लिए रणनीतिक अनिवार्यता
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के क्षेत्र में गठबंधन, सहयोग और साझेदारी की व्यवस्था अक्सर संप्रभु देशों की विदेश नीति के नज़रिए में उनके राष्ट्रीय हितों के अनुरूप आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा आश्वासन या गारंटी प्राप्त करने के साधन होते हैं। हालाँकि, ये साझेदारियां वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा परिवेश के जटिल चरणों के प्रति भी संवेदनशील होती हैं। जब सदस्य देशों की संख्या अधिक हो तो बड़े समूहों की कार्यप्रणाली एवं कार्यक्षमता पर उन हितों का अत्यधिक बोझ पड़ जाता है जो व्यक्तिगत रूप से संप्रभु सदस्यों की रणनीतिक स्वायत्तता के अनुरूप उनके मानक उद्देश्यों से भिन्न होते हैं।
अकादमिक क्षेत्र में कहा जाता है कि “लघुपक्षवाद (minilateralism)” शब्द का आविष्कार माइल्स काहलर ने 1992 में किया था।[i] भुविंदर सिंह और सारा टेओ जैसे विद्वानों ने इसे तीन (3) से नौ (9) देशों की भागीदारी वाली व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया है जो विशिष्ट, लचीली और कार्यात्मक प्रकृति की होती है।[ii] वर्तमान अंतरराष्ट्रीय प्रणाली की पृष्ठभूमि, जहाँ नियम– आधारित व्यवस्था अस्थिर है और पश्चिम के प्रभुत्व वाले बड़े समूह सहयोग तंत्र या बड़े पैमाने पर बहुपक्षवाद अप्रभावी हो रहे हैं, को देखते हुए विश्व में वैकल्पिक छोटे समूहों का पुनरुत्थान हो रहा है जिन्हें लघुपक्षवाद (मिनीलेटरलिज़्म) कहा जाता है।
लघुपक्ष समूह कोई नई घटना नहीं है लेकिन केई कोगा जैसे विद्वानों ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि कैसे 2010 के दशक के उत्तरार्ध से, विशेष रूप से हिंद– प्रशांत क्षेत्र में, “रणनीतिक लघुपक्षवाद” फिर से उभरा है जो चीन के उदय और अधिक प्रभावी क्षेत्रीय सुरक्षा तंत्रों की आवश्यकता जैसे कारकों से प्रेरित है।[iii] हिंद– प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के नेतृत्व वाले लघुपक्ष इसका एक उदाहरण हैं। वास्तव में, हिंद– प्रशांत क्षेत्रीय सुरक्षा रूपरेखा के आगमन के साथ लघुपक्षवाद का एक सहजीवी विकास हुआ। क्वाड का पहला संस्करण, जो 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी के कारण अस्तित्व में आया था, 21वीं सदी में एशिया में व्यापक स्तर पर परिवर्तित कूटनीति के प्रथम उदाहरणों में से एक था।[iv]
समय के साथ, विशेष रूप से हिंद– प्रशांत क्षेत्र में लघुपक्ष या छोटे– समूह सहयोग का महत्वपूर्ण विकास हुआ है जिसमें आमतौर पर तीन या चार देश होते हैं जो द्विपक्षीयता और व्यापक बहुपक्षवाद के बीच स्थित विशिष्ट व्यावहारिक उद्देश्यों के इर्द– गिर्द संरचित होते हैं। इनमें से कुछ उल्लेखनीय हैं– 2015 में जापान– भारत– ऑस्ट्रेलिया और जापान– भारत– अमेरिका; 2017 में पुनर्जीवित क्वाड; 2021 में एयूकेयूएस (AUKUS); 2022 में भारत– ऑस्ट्रेलिया– फ्रांस और भारत– ऑस्ट्रेलिया– इंडोनेशिया; 2023 में जापान– कोरिया गणराज्य– अमेरिका संस्थागत हुए; और 2024 में स्क्वाड (SQUAD/ अमेरिका– जापान– ऑस्ट्रेलिया– फिलीपींस), जापान– फिलीपींस– अमेरिका और अमेरिका– जापान– ऑस्ट्रेलिया। इसके अलावा 2007-2008 में शुरू हुई जापान– कोरिया गणराज्य– चीन त्रिपक्षीय वार्ता को भी न भूलें,[v] जिसे 2019 के बाद चार साल के अंतराल पर मई 2024 में फिर से शुरू किया गया था।[vi] अपनी अनौपचारिक प्रकृति के कारण जो उन्हें अधिक चुस्त और अनुकूलनीय बनाती है, वर्तमान क्षेत्रीय गतिशीलता की वजह से और अधिक लघु– पक्षीय समूहों के बनने एवं आयोजन जारी रहने की उम्मीद है। हालाँकि, इन व्यवस्थाओं का लंबे समय तक चल पाना वर्तमान परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
जापान के रणनीतिक संचालक
लघुपक्षवाद में शामिल होने के लिए जापान की वजहों के वर्तमान रणनीतिक संचालकों के बारे में बात करने से पहले, गठबंधन/साझेदारी युग्मों में टोक्यो के नज़रिए के ऐतिहासिक और संरचनात्मक संदर्भ का पता लगाना आवश्यक है। द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार और उसके बाद अमेरिका द्वारा हिरोशिमा (6 अगस्त) और नागासाकी (9 अगस्त) पर किए गए परमाणु बम से हमले के कारण, जापान के सम्राट हिरोहितो ने 15 अगस्त 1945 को इसकी पुष्टि की और आखिरकार जुलाई 1945 में जारी मित्र राष्ट्रों की पोट्सडैम घोषणा को स्वीकार कर लिया गया[vii] जिसमें जापान के बिना शर्त आत्मसमर्पण, निरस्त्रीकरण, विसैन्यीकरण, लोकतंत्रीकरण और अंततः अंतरराष्ट्रीय समुदाय में वापसी की बात कही गई थी।[viii] जापान की युद्धकालीन अतिक्रमणकारी नीति वैश्विक राजनीति में एक बार– बार दोहराई जाने वाली प्रवृत्ति को दर्शाती है, जब कोई देश बहुत अधिक शक्तिशाली हो जाता है तो वह अपनी ही शक्ति से बर्बाद हो जाने के जोखिम पर होता है या फिर वह अपनी स्थिति को पुनः संतुलित करने हेतु पतन का आभास देता है।
इसके बाद, जनरल डगलस मैकआर्थर के नेतृत्व में मित्र देशों की सर्वोच्च सेना (जीएचक्यू/एससीएपी) के मुख्यालय ने जापान पर कब्ज़ा कर लिया और कब्ज़े के दौरान सरकारी अधिकारी निलंबित कर दिए एवं टोक्यो के प्रशासनिक अधिकारों को सीमित कर दिया।[ix] इसके बाद जनरल डगलस मैकआर्थर ने जापान के युद्ध– के बाद के संविधान के प्रारूपण का काम संभाला और इस प्रारूप का मुख्य तत्व अनुच्छेद 9 था, जो जापान को सैन्यवाद के पुनरुत्थान को रोकने के लिए कोई सशस्त्र बल या अन्य युद्ध क्षमता नहीं बनाए रखने को बाध्य करता था।
हालाँकि, शीत युद्ध की शुरुआत और 1950 में कोरियाई युद्ध छिड़ने के साथ ही अमेरिका की रणनीतिक स्थिति बदल गई। वर्ष 1951 की सैन फ्रांसिस्को शांति संधि के माध्यम से मित्र राष्ट्रों ने जापान की संप्रभुता को बहाल किया और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 में उल्लिखित व्यक्तिगत या सामूहिक आत्मरक्षा के अंतर्निहित अधिकार को प्रोत्साहित किया। इसके कारण ही 8 सितंबर 1951 को सैन फ्रांसिस्को शांति संधि के दिन ही, पहली अमेरिका– जापान सुरक्षा संधि पर हस्ताक्षर किए गए।[x] आगे चल कर 19 जनवरी 1960 को इस संधि में संशोधन किया गया ताकि जापान की अधिक समानता की जरूरत एवं अमेरिकी समर्थन की गारंटी को समायोजित किया जा सके, जबकि शीत युद्ध के तनाव के बीच अमेरिका ने जापान में अपने अड्डे बनाए रखे थे। [xi]
इस प्रकार, 1960 की अमेरिका– जापान सुरक्षा संधि के निर्देशित ढांचे के तहत जापान की युद्धोत्तर सुरक्षा सफर का लंबा दौर शुरू हुआ। हालाँकि इस व्यवस्था ने जापान की सुरक्षा का आधार प्रदान किया लेकिन समय के साथ वाशिंगटन की रणनीतिक प्राथमिकताओं पर अत्यधिक निर्भर एक द्विपक्षीय गठबंधन की अंतर्निहित सीमाएं सामने आईं। जैसे– जैसे शीत युद्ध समाप्त हुआ और 21वीं सदी की शुरुआत के साथ हिंद– प्रशांत क्षेत्र में नई चुनौतियां उभरीं, गठबंधन मॉडल जो पहले पदानुक्रमित प्रकृति का था, अधिक नेटवर्कवाले और साझेदारी–उन्मुख मॉडलों के लिए जगह बनाने लगा। इस पृष्ठभूमि में, 21वीं सदी में जापान द्वारा लघुपक्षवाद को अपनाने को अमेरिकी गठबंधन प्रणाली की अप्रत्याशितता के विरुद्ध सुरक्षा की रणनीति के रूप में भी देखा जा सकता है।
हिंद– प्रशांत क्षेत्र में, लघुपक्षवाद गठबंधन संरचनाओं और बोझिल बहुपक्षीय संस्थाओं, दोनों में कथित कमियों को दूर करते हैं और लचीलापन, चपलता एवं केंद्रित सहयोग प्रदान करते हैं। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, ऐसे कई लघुपक्ष समूहों में जापान की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि शायद टोक्यो पहले से ही विकसित हो रही क्षेत्रीय व्यवस्थाओं की संचालक शक्ति है। नीचे दी गई तालिका 1 में 21वीं सदी में जापान की कम– से– कम 11 लघुपक्षवाद पहलों में उपस्थिति दर्ज की गई है।
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क्र. सं. |
देश |
वर्ष |
लघुपक्षवाद प्रारूप |
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1. |
जापान– कोरिया गणराज्य– चीन |
2007-2008 |
त्रिपक्षीय |
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2. |
जापान– ऑस्ट्रेलिया– भारत |
2015 |
त्रिपक्षीय |
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3. |
जापान– अमेरिका– भारत |
2015 |
त्रिपक्षीय |
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4. |
जापान– ऑस्ट्रेलिया– अमेरिका– भारत |
2017 |
क्वाड |
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5. |
जापान– भारत– इटली |
2021 |
त्रिपक्षीय |
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6. |
जापान– ऑस्ट्रेलिया–भारत– यूएई– स्पेन– श्रीलंका– इंडोनेशिया |
2022 |
मैंग्रोव एलायंस |
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7. |
जापान– इटली– यूके |
2022 |
वैश्विक लड़ाकू वायु कार्यक्रम (GCAP) |
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8. |
जापान– अमेरिका– कोरिया गणराज्य |
2023 |
त्रिपक्षीय |
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9. |
जापान– अमेरिका– फिलिपींस |
2024 |
त्रिपक्षीय |
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10. |
जापान– ऑस्ट्रेलिया– अमेरिका |
2024 |
त्रिपक्षीय |
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11. |
जापान– ऑस्ट्रेलिया– अमेरिका– फिलिपींस |
2024 |
एसक्वाड |
तालिका 1.1: जापान की लघुपक्षवाद पहल
उपर्युक्त लघुपक्षों (मिनीलैटरल्स) के अलावा, क्षेत्रीय सहयोग के कई अन्य मंच भी होंगे जिनमें जापान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होगा। हिंद– प्रशांत लघुपक्ष के कई लघुपक्ष समूहों में जापान की बार– बार मौजूदगी को देखते हुए यह माना जा सकता है कि टोक्यो ने अपनी रणनीतिक स्थिति को सावधानीपूर्वक परखा है। ऊपर वर्णित ज्ञात मिनीलैटरल व्यवस्थाओं की सूची, जापान के लघुपक्ष समूहों में शामिल होने के छह मुख्य कारणों पर प्रकाश डालती हैः
1. अमेरिकी गठबंधन का कमज़ोर होना: युद्धोत्तर काल में बहुत समय तक एक “आर्थिक शक्ति” रहे जापान को अब अपनी शर्तों पर सुरक्षा के मोर्चे पर आगे बढ़ने की मजबूरी महसूस हो रही है। राजनीतिक और सुरक्षा मोर्चे पर वर्षों तक कम सक्रिए रहने के बाद, 2014 से रक्षा निर्यात में ढील, 2016 में स्वतंत्र एवं खुले हिंद– प्रशांत (एफओआईपी) नज़रिए को अपनाना, 2022 में राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का उन्नयन और 2023 में समान विचारधारा वाले देशों के लिए आधिकारिक सुरक्षा सहायता (ओएसए) को अपनाना, अमेरिकी प्रतिबद्धता की अनिश्चितता के बीच वैश्विक व्यवस्था के पुनर्गठन हेतु स्वयं को तैयार कर रहा है।
अमेरिकी गठबंधन के कमज़ोर होने से जापान को अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप अधिक सुरक्षा उत्तरदायित्वों को उठाने के लिए विवश होना पड़ेगा लेकिन दो मोर्चों पर इसके जोखिम हैं। क्षेत्रीय स्तर पर, जापान की अधिक सक्रिए सुरक्षा नीति चीन, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के साथ संबंधों को अधिक जटिल बना सकती है जिससे पहले से ही अस्थिर यथास्थिति और अधिक अस्थिर हो सकती है। घरेलू स्तर पर, इस प्रकार के रुख को बनाए रखने के लिए रक्षा खर्च में वृद्धि के साथ– साथ शांतिवादी मानदंडों में संशोधन हेतु राजनीतिक एवं सार्वजनिक प्रतिरोध से निपटना भी आवश्यक होगा। हालाँकि आर्थिक रूप से जापान अपनी सुरक्षा उत्तरदायित्वों को बढ़ाने में सक्षम हो सकता है लेकिन अचानक सक्रिए रुख अपनाने से घरेलू तनाव बढ़ सकता है।
2. चीन को संतुलित करना: जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति 2022 ने दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में चीन की गतिविधियों को लेकर गंभीर चिंताएँ व्यक्त की हैं। इस रणनीति दस्तावेज़ में समुद्री एवं हवाई क्षेत्रों में यथास्थिति को एक तरफा बदलने के चीन के तीव्र प्यासों पर प्रकाश डाला गया है। इसलिए जापान स्वयं को क्वाड, अमेरिका– जापान– ऑस्ट्रेलिया, जापान– ऑस्ट्रेलिया– भारत, स्क्वाड, जापान– अमेरिका– फिलीपींस और जीसीएपी जैसे लघुपक्षीय व्यवस्थाओं में शामिल कर रहा है ताकि प्रतिरोध को मजबूत करने वाला प्रतिपक्ष तैयार किया जा सके।
चीन को संतुलित करने एवं अधिक सुरक्षोन्मुख नज़रिया अपनाने के प्रयासों में, तीव्र सैन्यीकरण का जोखिम भी रहेगा। दक्षिण– पूर्व एशियाई देश, जो अमेरिका– चीन प्रतिद्वंद्विता से बचना चाहते हैं, आर्थिक साझेदारियों के अलावा जापान के साथ सुरक्षा साझेदारियाँ भी चुन सकते हैं। हालाँकि इससे जापान को दक्षिण– पूर्व एशियाई देशों के पक्ष में मध्यस्थता करने का एक आधार मिल सकता है लेकिन जरूरत पड़ने पर सुरक्षित जापान का अर्थ हिंद– प्रशांत क्षेत्र का तेज़ी से सैन्यीकरण भी होगा। अपने क्षेत्र में मध्यस्थ के रूप में जापान के लिए घरेलू आधार भी तैयार करना होगा।
3. स्थिरता का जाल बिछाने के लिए सुरक्षा साझेदारियों में विविधता लानाः परकंपरागत रूप से, युद्धोत्तर काल में, जापान अपनी सुरक्षा हेतु अमेरिकी गठबंधन पर बहुत अधिक निर्भर रहा है, जिससे अति– निर्भरता की चिंताएं पैदा होती हैं। इस समस्या के समाधान के लिए, टोक्यो ऑस्ट्रेलिया, भारत, फ्रांस, ब्रिटेन और यहाँ तक कि कोरिया गणराज्य (ROK) के माध्यम से सुरक्षा साझेदारियों में विविधता लाने पर विचार कर रहा है। इन वैकल्पिक साझेदारियों ने जापान को उन्नत तकनीकी क्षमताओं में अपनी विशेषज्ञता को रेखांकित करते हुए व्यापक सैन्य सहयोग प्राप्त करने का अवसर भी दिया है। जापान जैसे प्रभावशाली देशों द्वारा मिनीलैटरल्स के माध्यम से साझेदारी के नेटवर्क से क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्थिरता को बढ़ावा मिल सकता है, भले ही इसका ध्यान सुरक्षा हेतु गैर– परंपरागत चुनौतियों एवं क्षमता निर्माण समेत संबंधित सहयोग जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित हो।
सुरक्षा साझेदारियों में विविधता लाने का अर्थ कई अतिव्यापी साझेदारियों का प्रबंधन करना भी है, जिससे समन्वय जटिल हो जाता है। अलग– अलग मानक और अंतर– संचालन संबंधी कमियाँ होंगी जिससे प्रभावशीलता कम होने की गुंजाइश बनती है। इसके अलावा, प्रौद्योगिकी– साझाकरण वार्ता प्रगति में बाधा बन सकती है क्योंकि साझेदार नियंत्रण एवं बौद्धिक संपदा अधिकारों पर बहस करते हैं।
4. बहुध्रुवीय संदर्भ में मानकों को बेहतर बनानाः अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के समझ चुनौतियों और एक अधिक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की ओर संक्रमण के बीच जापान को यह सुनिश्चिक करना होगा कि सहयोग को बढ़ावा देने की उसकी वकालत क्षेत्रीय नज़रिए को हाशिए पर न डाल दे। अमेरिका– चीन प्रतिस्पर्धा और यूक्रेन युद्ध के मद्देनज़र विश्व भर में तेज़ी बढ़ रहे संरक्षणवादी रुझानों के बीच यह दृष्टिकोण बेहद जरूरी है। एक ओर, जापान आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी/OECD) के जी7 (G7)- संचालित ढांचे में शामिल है, जिसे ब्लू डॉट नेटवर्क के नाम से जाना जाता है। वैकल्पिक रूप से, जापान जलवायु परिवर्तन हेतु मैंग्रोव गठबंधन में भी शामिल है जो संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया द्वारा सीओपी27 (COP27) में भारत एवं दूसरे देशों के साथ मिलकर शुरू किया गया एक अंतर– सरकारी गठबंधन है। परिणामतः जापान के सामने एक अंतर्निहित दुविधा है कि वह पश्चिमी रूपरेखा से वास्तविक रूप से कैसे बचे, साथ ही ग्लोबल साउथ के साथ क्षेत्रीय रूप से समावेशी सहकारी तंत्र को कैसे बढ़ावा दे।
यद्यपि सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों का आदान– प्रदान उपयोगी साबित हो सकता है लेकिन ओईसीडी/जी7 (OECD/G7) मानकों और उनके प्रचार पर अत्यधिक ज़ोर देने से स्थानीय आवश्यकताओं, क्षमताओं और मानदंडों के साथ टकराव का खतरा है। विकसित देशों के अनुभवों एवं विकास पथों पर आधारित विकसित देश का मानक एजेंडा हमेशा ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों की जरूरतों के अनुकूल नहीं हो सकता। इसके लिए वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर अधिक समावेशी और सहभागी मानक– निर्धारण/ मानदंड– निर्धारण संगठनों की जरूरत है। इस संदर्भ में जापान अग्रणी भूमिका निभा सकता है। जैसे, आईएसओ जैसे मानकों पर बातचीत करने वाले बहुपक्षीय मंचों में भाग लेने वाले निम्न– स्तरीय विकासशील देशों के अधिकारियों की क्षमता निर्माण के माध्यम से।
5. मुद्दा आधारित गठबंधन निर्माणः सुरक्षा, जलवायु, बुनियादी ढांचे और आपूर्ति श्रृंखलाओं जैसे क्षेत्रों के आधार पर अलग– अलग लघुपक्ष समूहों में शामिल होने में जापान की लचीलापन आसानी से देखा जा सकता है। यह रणनीति प्रभाव को बढ़ाने, जोखिमों से बचाव करने, क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा एवं स्थिरता को बढ़ाने एवं नियम– आधारित हिंद– प्रशांत व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए साझेदारी के जाल के माध्यम से समान विचारधारा वाली मुद्दा– आधारित नेटवर्क कूटनीति को दर्शाती है।
मिनीलैटरल्स की बहुलता इस अटकल को भी जन्म दे सकती है कि जापान हिंद– प्रशांत क्षेत्र में टोक्यो– केंद्रित व्यवस्था बनाने की मंशा रखता है ताकि वह पीछे हटते अमेरिका से मुकाबला कर सके। इसलिए, साझेदारों के बीच इस बात को लेकर संशय हो सकता है कि क्या ये गठबंधन समान दर्जा प्रदान करते हैं या इसके बजाय जापान के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने, विशेषरूप से पूर्वोत्तर एशिया में अपना प्रभुत्व बनाए रखने और चीन को रोकने के साधन के रूप में काम करते हैं।
6. घरेलू राजनीतिक कारक: जापान ने युद्धोत्तर इतिहास के एक बडे हिस्से में, स्वतंत्र सैन्य प्रक्षेपणों को सीमित करने वाली संवैधानिक बाध्यताओं के कारण, शांतिवादी नज़रिया अपनाया है। ऐसी स्थिति में, मिनीलैटरल को एक वृद्धिशील सक्रिए सुरक्षा नज़रिए के लिए वैधता कवर प्रदान करने के लिए भी कहा जाता है जबकि घरेलू दर्शकों एवं क्षेत्रीय पड़ोसियों को टोक्यो के एकतरफा की बजाय सामूहिक रूप से काम करने की मंशा के बारे में आश्वस्त करता है।
हालाँकि, दीर्घकाल में, घरेलू वैधता के आवरण के रूप में मिनीलैटर पर निर्भर रहना जापान में घरेलू जनता के बीच विरोध उत्पन्न कर सकता है, यदि उन्हें पता चले कि सरकार पारदर्शिता के बिना शांतिवादी प्रतिबंधों को दरकिनार कर रही है। क्षेत्रीय पड़ोसियों के बीच, टोक्यो की सामूहिक सुरक्षा की मंशा को एक मुखर और व्यापक सुरक्षा भूमिका को सामान्य बनाने की क्रमिक कोशिश के रूप में भी गलत समझा जा सकता है। इस प्रकार, जापान के लिए मिनीलैटरल अल्पकालिक रूप से एक सक्षमकर्ता लेकिन दीर्घकालिक जोखिम बन सकते हैं।
जापान बनाम अमेरिका लघुपक्षवाद की वजह
युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में, जापान की प्रमुख रणनीतिक दिशाएँ अमेरिकी गठबंधन संधि द्वारा निर्धारित की गईं। 21वीं सदी की ओर बढ़ते हुए, अमेरिकी द्विपक्षीय गठबंधन के साथ– साथ जापानी गतिविधियों ने एक उभरती हुई रणनीतिक दिशा को उजागर करना शुरू कर दिया जो लघुपक्षवाद के प्रति अमेरिकी नज़रिए की तुलना में बिल्कुल अलग थी। इसे ध्यान में रखते हुए, विशेष रूप से युद्धोत्तर काल में, लघुपक्षवाद को अपनाने या इसमें संलग्न होने के लिए अमेरिका और जापान की प्रेरणाओं का तुलनात्मक विश्लेषण आवश्यक है।
चीन कारक
अमेरिकी लघुपक्षवाद बीते कुछ वर्षों में चीन को रोकने के लिए तैयार की गई उसकी विशिष्ट रणनीतियों में से एक के रूप में विकसित हो रहा है। यह रणनीति कई अतिव्यापी रूपरेखाओं के माध्यम से बनाई गई है। अमेरिकी लघुपक्षवाद की आलोचना करने वाले पर्यवेक्षकों का आरोप है कि वाशिंगटन आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा क्षेत्रों में गठबंधन करता है जिसका मूल उद्देश्य “चीन के रणनीतिक संसाधनों को पूरी तरह समाप्त कर देना” है, जिससे बीजिंग को एक साथ कई लघुपक्षीय व्यवस्थाओं में शामिल होने के लिए विवश होना[xii]
जापान, अपनी संशोधित राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति 2022 में चीन की आक्रामकता को लेकर चिंतित है, लेकिन जोखिम– विरोधी नज़रिया अपनाते हुए लचीलापन बनाए रखता है और सीधे टकराव के बिना चीन के दबाव को रोकने की कोशिश करता है। टोक्यो सहभागिता एवं बचाव की एक साथ रणनीति के माध्यम से संतुलन बनाए रखने का प्रयास कर रहा है। इसका उदाहरण चीन के साथ क्षेत्रीय संस्थाओं में जापान की भागीदारी है जैसे कि आसियान+3 (ASEAN+3), पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS), एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक/APEC), और जापान– चीन– दक्षिण कोरिया त्रिपक्षीय व्यवस्था। यह कहा जा सकता है कि टोक्यो का नजरिया दोहरा है, जहाँ वह अमेरिका के साथ सैन्य गठबंधन को मजबूत बना रहा है वहीं वह चीन के साथ आर्थिक कूटनीतिक संबंध भी अपना रहा है।[xiii]
चीन के साथ जापान की दोहरी रणनीति बीजिंग को एक नियम– आधारित क्षेत्रीय प्रक्रिया में एकीकृत करने के प्रयासों का संकेत देती है जबकि टोक्यो की स्वतंत्र और खुला हिंद– प्रशांत (एफओआईपी/FOIP) भी चीन के प्रभावों, विशेष रूप से बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई/BRI) का मुकाबला करने के लिए एक क्षेत्र व्यापी रणनीति को रेखांकित करती है।[xiv] इसके अलावा जापान ने उन देशों के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ किया है जो चीन के आलोचक हैं, जैसे कि फिलीपींस, और उन देशों के साथ भी जो चीन के अधिक करीब माने जाते हैं, जैसे कि कंबोडिया।[xv]
क्षेत्रीय उत्तरदायित्व
जापान की शासन– नीति रणनीतिक स्वायत्तता और गठबंधन पर निर्भरता के बीच संतुलन बनाने की इच्छा को दर्शाती है। हालाँकि, टोक्यो स्वयं को एक सक्रिए क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है जो क्षेत्रीय व्यवस्था को आकार देने में सक्षम हो। एफओआईपी विज़न, जिसे टोक्यो ने अमेरिका से दो साल पहले 2016 में पेश किया था,[xvi] एक ऐसे अवसर का प्रतिनिधित्व करता है जहां जापान ने क्षेत्रीय शासन हेतु केवल अनुयायी की नहीं बल्कि एजेंडा–निर्धारक की भूमिका निभाई। वर्ष 2023 में अपनाई गई आधिकारिक सुरक्षा सहायता (ओएसए) क्षेत्र में अपनी सुरक्षा उत्तरदायित्वों को बढ़ाने के लिए टोक्यो के प्रयासों का एक अतिरिक्त आयाम है।
दूसरी ओर, हिंद– प्रशांत क्षेत्र में एक अतिरिक्त– क्षेत्रीय शक्ति के रूप में अमेरिका, मुख्यतः एयूकेयूएस (AUKUS), क्वाड (Quad) और जापान– कोरिया गणराज्य– अमेरिका त्रिपक्षीय समझौतों के माध्यम से, इस क्षेत्र में संस्थागत रूप से अंतर्निहित बना हुआ है। हालाँकि, अमेरिका के ये गठबंधन वाशिंगटन की को चयनात्मक और लेन– देन संबंधी भागीदारी भी दर्शाते हैं। फिलहाल, गठबंधन संधियों या लघुपक्षीय रूपरेखाओं के अनुसार क्षेत्रीय उत्तरदायित्व निभाने में अमेरिका की प्रतिबद्धता संदिग्ध बनी हुई है। ट्रम्प प्रशासन द्वारा वैश्विक टैरिफ लागू करने के दूसरे चरण ने भी गठबंधन की विश्वसनीयता पर अटकलों को हवा दी है जबकि वाशिंगटन ने लागत वितरण पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित करने के संकेत दिए हैं।
अमेरिका के पीछे हटने के संकेत
ट्रम्प 2.0 के शासन में “अमेरिका को फिर से महान बनाएं” का एजेंडा संसाधनों की कमी से जूझ रहे अमेरिका की पिछड़ती स्थिति को पुष्ट करता है जबकि उसकी सेना पर दबाव बहुत अधिक बढ़ रहा है, इसकी वजह से अंतर्मुखी या संरक्षणवादी नीति अपनाने के लिए घरेलू दबाव बढ़ रहा है। थोड़ी अवधि के लिए, वाशिंगटन को एक वैश्विक सैन्य शक्ति बने रहने की उम्मीद है और उसका लक्ष्य एक संचालक की भूमिका से मार्गदर्शक की भूमिका में परिवर्तन कर वर्तमान चुनौतियों का समाधान करना है। इसका अर्थ है कि वाशिंगटन अपने गठबंधन सहयोगियों को सार्वजनिक वस्तुओं की आपूर्ति के बोझ का अधिक– से– अधिक हिस्सा उठाने के लिए प्रेरित कर रहा है ताकि अमेरिकी प्रतिबद्धता बनी रहे।
जापान की रक्षा निर्माण की दिशा, अपनी विस्तारित सुरक्षा भूमिकाओं को सुव्यवस्थित करना, एक पीढ़ीगत बदलाव को दर्शाता है जो बदलती अमेरिकी प्राथमिकतां के अनुकूल ढलने और वाशिंगटन की अनिश्चितताओं से स्वयं को सुरक्षित करने की दिशा में एक कदम है। फिलहाल, जापान अमेरिका के रणनीतिक विकल्पों की परवाह किए बिना अपनी भूमिका का विस्तार जारी रखना चाहता है। टोक्यो स्वयं को दो संभावनाओं– क्षेत्र में अमेरिका की बढ़ती भागीदारी या फिर हिंद– प्रशांत क्षेत्र से वाशिंगटन की रणनीतिक वापसी, में से किसी एक के लिए तैयार कर रहा है। दरअसल, जापान का लघुपक्षवाद (मिनीलैटरलिज़्म) में संलग्न होना सहयोग के माध्यम से वैधता और विश्वास हासिल करने के साथ– साथ वैश्विक व्यवस्था के मूलभूत पुनर्गठन के बीच स्थिरता को बनाए रखने के लिए निरंतर प्रतिबद्धता हेतु आधार प्रदान करना है।
वर्तमान में, अमेरिका का पीछे हटना एक मूलभूत अपेक्षा भर है जबकि क्षेत्र की सुरक्षा में जापान की भूमिका बढ़ने की उम्मीद है। लंबी अवधि में, यदि अमेरिका अलगाववादी नीतिगत दृष्टिकोण या चयनात्मक और लेन–देन वाली भूमिका अपनाता रहता है तो जापान के हिंद– प्रशांत क्षेत्र में कई लघुपक्ष समूहों, जो मुद्दों से प्रेरित और वाशिंगटन के प्रभावों से स्वतंत्र हैं, के अधिक सक्रिए रूप से उभरने की उम्मीद है।
मानदंड निर्यात और पश्चिमी आधिपत्यवादी आदर्शों से बचना
क्षेत्र के सामूहिक हित में काम करते समय, ऐसे मानदंड लागू करने से बचना जरूरी है जो हितधारकों के हितों के विपरीत हों। उभरते हुए लघुपक्षवाद के दौर में, इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि व्यवस्थाएं पश्चिम– केंद्रित मानदंडों का वाहक न बन जाएँ। जापान, जो कि जी7 (G7) और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) का सदस्य है, को, इस बात के प्रति सचेत रहने की आवश्यकता है कि हिंद– प्रशांत क्षेत्र में लघुपक्ष (मिनीलैटरल) के लिए उनका महत्वपूर्ण प्रयास जी7 द्वारा निर्धारित मानदंडों का प्रसार न करे बल्कि एक उत्तरदायी, क्षेत्रीय रूप से अनुकूल शासन प्रदान करे जो हिंद– प्रशांत क्षेत्र में व्यवहार का एक एशियाई तरीका हो, जो रणनीतिक स्वायत्तता के साथ– साथ सदस्य देशों की क्षेत्रीय संप्रभुता एवं अखंडता का सम्मान करता हो।
मिनीलैटरलिज़्म (लघुपक्षवाद) को लचीली और क्षेत्रीय रूप से सूचित साझेदारियों के माध्यम से मानदंड–निर्धारण की स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए। नौकरशाही बाधाओं और मानक वर्चस्व से इतर, अंतरराष्ट्रीय सहयोग के एक नए संगठनात्मक सिद्धांत के रूप में लघुपक्षवाद को अपनाना, ग्लोबल साउथ के प्रति जापान की कूटनीति के लिए भी शुभ संकेत होगा। जबकि कई लघुपक्षीय समूह पश्चिम के नेतृत्व में या अतिरिक्त– क्षेत्रीय देशों द्वारा संचालित रहे हैं, जापान को, हिंद– प्रशांत क्षेत्र में एक क्षेत्रीय हितधारक के रूप में, अपनी एजेंसी को बनाए रखने हेतु, कठोर मानदंडों के प्रचार– प्रसार के बजाय लचीले, मुद्दा– आधारित सहयोग को प्राथमिकता देनी चाहिए। समावेशी मिनीलैटरल व्यवस्था को बढ़ावा देने में जापान की बाद की कार्रवाई विविधता, समावेशिता और खुलेपन के सम्मान से संबंधित स्वतंत्र एवं खुले हिंद– प्रशांत (एफओआईपी/ FOIP) के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को भी रेखांकित करेगी। [xvii]
पाश्चात्य प्रभुत्व वाले गठबंधनों के विकल्प के रूप में लघुपक्षवाद (मिनीलैटरलिज़्म)
बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही जटिल अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के बीच जापान एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। पश्चिमी नेतृत्व वाले गुटों के साथ टोक्यो के पारंपरिक संबंधों के कारण, यह देश वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का लाभ उठाने के लिए स्वयं को अनुकूलित और एकीकृत करने की अच्छी स्थिति में है, साथ ही ग्लोबल साउथ के साथ आपसी समझ एवं सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भी इसे उचित रूप से मान्यता प्राप्त है। जापान को ऐसे मंचों के निर्माण पर ध्यान देना चाहिए जो मिनीलैटरल (लघुपक्षवाद) कार्यप्रणाली को पश्चिमी गठबंधन वाली संरचनाओं की प्रतिकृति के रूप में नहीं बल्कि क्षेत्र की सामूहिक रणनीतिक आवश्यकताओं के अनुरूप लक्षित, सहकारी उपक्रमों के रूप में प्रदर्शित करें।
लघुपक्षवाद की दिशा में अपने प्रयासों के क्रम में, जापान को चीन के भू– आर्थिक और भू– रणनीतिक उद्देश्यों का मुकाबला करने के लिए आर्थिक, सुरक्षा और मानक व्यवस्था–निर्माण नज़रिए को मजबूत करने की आवश्यकता को पहचानने पर ध्यान देना चाहिए। हिंद– प्रशांत क्षेत्र में सहयोग सहयोग व्यवस्था के लिए अधिक क्षेत्रीय नज़रिया अपनाने की मांग की गई है, और जापान के पास साझेदारी, शांति एवं प्रगति को महत्व देने वाले परिणाम देने की क्षमता है।[xviii] जापान की दूरदर्शिता और प्रतिबद्धता न केवल पश्चिमी प्रभुत्व वाली व्यवस्था के लिए एक सार्थक और रचनात्मक विकल्प प्रदान कर सकती है बल्कि यथास्थिति को एकतरफ़ा बदलने के चीन के प्रयासों को भी संतुलित कर सकती है। तनावग्रस्त गठबंधन जापान को अपने क्षेत्र में नए युग की मजबूत साझेदारियों के जरिए अपनी स्वाभाविक पहचान, एशियाई क्षेत्रीय पहचान, जो कहीं– न– कहीं, विशेषरूप से अपने समाज में, क्षीण हो गई है, को, स्थापित करने का अवसर भी प्रदान करेगा।
निष्कर्ष
21वीं सदी से जापान द्वारा मिनिलैटरलिज़्म (लघुपक्षवाद) को अपनाना रणनीतिक पुनर्संतुलन का संकेत है, जो कुछ लोगों द्वारा “गठबंधन की थकान” कहे जाने वाले खंडित भू– राजनीतिक परिवेश में क्षेत्रीय उत्तरदायित्व की तलाश और हितधारकों की क्षेत्रीय संप्रभुता एवं अखंडता का पालन करते हुए एक क्षेत्रीय एशियाई पहचान की पुष्टि से प्रेरित है। ये लचीले, अनौपचारिक मंच राष्ट्रीय एजेंसी को बनाए रखते हुए क्षेत्रीय शासन एवं सुरक्षा को सह– डिज़ाइन करने का एक तरीका प्रदान करते हैं।
एक स्वतंत्र, मुक्त और लचीली हिंद– प्रशांत व्यवस्था को सफलतापूर्वक आकार देने के लिए जापान को लघुपक्षवाद (मिनिलैटरलिज़्म) के माध्यम से सुरक्षा और भू– आर्थिक संबंध के बीच संतुलन बनाना होगा। यदि टोक्यो पाश्चात्य मानदंडों के साथ तालमेल बिठाने की बजाय न्यायसंगत नियम– निर्माण को प्राथमिकता दे पाता है तो यह सभी राज्यों की रणनीतिक स्वायत्तता को संरक्षित और बढ़ाने में क्षेत्रीय हितधारक के रूप में जापान की भूमिका को और मज़बूत करेगा।
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*डॉ. तुनचिनमंग लैंगेल, शोध अध्येता, भारतीय वैश्विक परिषद (आईसीडब्ल्यूए)
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
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