सारांश: राष्ट्रपति ट्रम्प की हाल की मध्य–पूर्व यात्रा इस क्षेत्र के प्रति संयुक्त राज्य अमेरिका के दृष्टिकोण में उनके द्वारा लाए जा रहे सूक्ष्म बदलावों को बताती है।
पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से, मध्य– पूर्व के प्रति संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति साझेदारियों के एक ऐसे नेटवर्क पर आधारित रही है जिसने उसे इस क्षेत्र के साथ जुड़ने, यहाँ अपने ठिकानों पर अपने सैनिकों को तैनात करने, अपने वैश्विक सहयोगियों और साझेदारों को ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने और इज़रायल की सुरक्षा की गारंटी देने में समर्थ बनाया है। वर्षों से अपने सहयोगियों के साथ मिलकर काम करते हुए, इसने क्षेत्र में तनाव को कम करने में काफी हद तक सफलता हासिल की है जैसे कैंप डेविड समझौता और हाल के वर्षों में अब्राह्म समझौता। फिर भी, वैश्विक विश्व व्यवस्था में परिवर्तन हो रहा है और जिन वर्तमान प्रणालियों के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका संचालित होता था उनका पुनर्मूल्यांकन और पुनर्विचार की जरूरत है।
संयुक्त राज्य अमेरिका के संबंधों के दो मूलभूत स्तंभ बदल गए हैं। पहला, क्षेत्र के लिए सोवियत संकट समाप्त हो गया है और आज, क्षेत्र के देश रूस के साथ बहुआयामी संबंध साझा करते हैं। दूसरा, संयुक्त राज्य अमेरिका अब विश्व का सबसे बड़ा तेल उत्पादक है जो न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है बल्कि अपने ऊर्जा निर्यात के लिए बाज़ारों की भी सक्रिए रूप से तलाश कर रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रति क्षेत्रीय नज़रिया भी बदल रहा है। फिलिस्तीन– इज़रायल शांति के मुद्दे पर, संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा प्रायोजित पिछली शांति वार्ता लगभग एक दशक पूर्व विफल हो गई थी और मध्यपूर्व में चल रहे युद्धों में इज़रायल को दिए गए उसके बिना शर्त समर्थन ने भविष्य में शांति वार्ता की मेज़बानी या प्रायोजन के लिए उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल किया है।
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, और कतर जैसी क्षेत्रीय शक्तियां भी अपनी विदेश नीति के रास्ते तय कर रही हैं। वे क्षेत्रीय कूटनीति और निवेश में अधिक सहयोग की संभावनाएं तलाश रहे हैं, साथ ही चीन और रूस के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बना रहे हैं हालांकि ये घटनाक्रम वाशिंगटन के मूल हितों से मेल नहीं खाते।
मध्य– पूर्व में लंबे समय से चले आ रहे विवादों में उलझने से अमेरिका के भीतर थकान बढ़ती जा रही है। अमेरिकी शक्ति और सैन्य क्षमता के अति– विस्तार की सीमाओं का एहसास हो रहा है। राष्ट्रपति ट्रम्प अपने पहले कार्यकाल से ही गठबंधन के सदस्यों के बीच समान दायित्व साझा करनेक अपनी मांग पर अड़े रहे हैं और विदेश नीति में ‘पहले अमेरिका’ के दृष्टिकोण को अपनाते रहे हैं, जिसमें आर्तिक समझौतों में अनुकूल शर्तें और ‘अंतहीन युद्धों’ में अमेरिकी सैनिकों की भागीदारी का अंत शामिल है। इस नीतिगत प्रक्षेप पथ के अंतर्गत, राष्ट्रपति ट्रम्प की इस क्षेत्र की हालिया यात्रा, मध्य– पूर्व के प्रति संयुक्त राज्य अमेरिका के नज़रिए में उनके द्वारा लाए जा रहे सूक्ष्म बदलावों को उजागर करती है।
राष्ट्रपति ट्रम्प की विदेश नीति और मध्य– पूर्व
राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने वर्तमान कार्यकाल में, अपने पहले कार्यकाल के जैसे ही मध्य– पूर्व का पहला अंतरराष्ट्रीय दौरा किया। यह अवसर राष्ट्रपति के रूप में सऊदी अरब के उनके दूसरे दौरे का भी प्रतीक था।[i] अपने पहले आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय दौरे के लिए इस क्षेत्र का चयन क्षेत्रीय शक्तियों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने के राष्ट्रपति ट्रम्प के दृष्टिकोण में निरंतरता को दर्शाता है। हालाँकि यह क्षेत्र ट्रम्प प्रशासन के लिए उच्च प्राथमिकता वाला क्षेत्र है जिसमें इज़रायल के लिए समर्थन और ईरान के साथ संभावित वार्ता की घोषणाएं शामिल हैं, फिर भी इस क्षेत्र में स्थिरता प्राप्त करने के लिए अभी तक कोई नीतिगत रणनीति नहीं बनाई गई है।
‘पहले अमेरिका/ अमेरिका फर्स्ट’ नीति ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति का केंद्रीय स्तंभ रही है। यह अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देने और अधिक व्यावहारिक विदेश नीति बनाने पर केंद्रित है। इस दृष्टिकोण का एक प्रमुख पहलू राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा मध्य पूर्व समेत शेष विश्व के साथ अमेरिका के आर्थिक संबंधों को फिर से सुधारने का प्रयास कर रहा है। क्षेत्र के उनके दोनों दौरों के दौरान, रक्षा बिक्री और निवेश के समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। साल 2017 में, संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब ने दोनों देशों में लगभग 400 अरब डॉलर के निवेश पर सहमति जताई और सऊदी अरब द्वारा 110 अरब डॉलर की रक्षा खरीद की घोषणा की गई।[ii]
इसी तरह, 2025 में राष्ट्रपति ट्रम्प ने सऊदी अरब द्वारा अमेरिका में 600- अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता की घोषणा की। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा उद्योग, तनीकी नेतृत्व और वैश्विक अवसंरचनाओं एवं महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुँच में निवेश शामिल है।[iii] संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब ने सबसे बड़े बिक्री समझौते पर भी हस्ताक्षर किए– लगभग 142 अरब डॉलर का, जिसके तहत सऊदी अरब को एक दर्जन से अधिक अमेरिकी रक्षा कंपनियों से अत्याधुनिक युद्ध उपकरण एवं सेवाएं मिलेंगी।[iv] कतर और संयुक्त अरब अमीरात के साथ भी इसी प्रकार के समझौते किए गए हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप ने संयुक्त राज्य अमेरिका और कतर के बीच 243.5 अरब डॉलर से अधिक के आर्थिक सौदों की घोषणा की जिसमें कतर एयरवेज को बोइंग विमान और जीई एयरोस्पेस इंजन की बिक्री भी शामिल है।[v] दोनों देशों ने ड्रोन– रोधी क्षमताओं, दूर से संचालित होने वाली विमान प्रणालियों आदि क्षेत्रों में अपने रक्षा निवेश में भी तेजी लाई। संयुक्त अरब अमीरात के साथ राष्ट्रपति ट्रम्प ने दोनों देशों के बीच 200 अरब डॉलर से अदिक के वाणिज्यिक सौदों की घोषणा[vi] की जिसमें विमानन क्षेत्र और नवीन प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा एवं ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित किया गया।
ट्रम्प प्रशासन की दूसरी प्राथमिकता क्षेत्र में युद्धों में अमेरिकी सैन्य भागीदारी को कम करना रही है। उनकी सुरक्षा नीति ‘ताकत के बल पर शांति’ के सिद्धांत पर आधारित है। फिर भी, संयुक्त राज्य अमेरिका में यह स्वीकार्यता है कि मध्य– पूर्व और एशिया जैसे अपनी सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोगियों और साझेदारों के समर्थन के बिना निर्णायक कार्रवाई करने के लिए उसके पास पर्याप्त शक्ति का अभाव है। इसलिए वह सहयोगियों से समान दायित्व साझा करने और रक्षा खर्च को बढ़ाने की मांग कर रहा है।
सुरक्षा के प्रति दूसरा दृष्टिकोण लंबे समय से चले आ रहे विवादों को समाप्त करने के लिए शांति वार्ता करना रहा है। राष्ट्रपति ट्रम्प के पहले कार्यकाल के दौरान, उनके प्रशासन ने अब्राह्म समझौते पर बातचीत की थी। ये समझौते इज़रायल और उसके पड़ोसियों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित करने की दिशा में पहला कदम थे,[vii] इस विश्वास के साथ कि “…चुनौतियों का समाधान करने का सबसे अच्छा तरीका सहयोग और संवाद है एवं देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करना मध्य– पूर्व और विश्व भर में स्थायी शांति के हितों को आगे बढ़ाता है।”[viii] क्षेत्र के अपने हाल के दौरे में, राष्ट्रपति ट्रम्प ने घोषणा की कि वह सीरिया को प्रतिबंधों से राहत देंगे क्योंकि यह देश एक दशक से भी अधिक समय से जारी गृहयुद्ध से उबरने की राह पर है। प्रतिबंधों को हटाने से दशकों के गृहयुद्ध के बाद उसकी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में मदद मिलने की संभावना है।
इज़रायल और उसके पड़ोसियों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों को सुलझाने के इस कदम ने न केवल इज़रायल और दूसरे अरब पड़ोसियों के बीच बल्कि अरब देशों और ईरान के बीच भी सामान्य संबंधों की संभावनाएं खोल दी हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ सीधी बातचीत की बात बार– बार कही थी। हाल ही में हुए इज़रायल– ईरान युद्ध और उसके बाद अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए मिसाइल हमलों ने इस प्रक्रिया को रोक दिया; हालांकि हाल ही संपन्न नाटो शिखर सम्मेलन (होग, 2025) में राष्ट्रपति ट्रंप ने दोनों देशों के बीच जल्द ही वार्ता के फिर से शुरू होने की उम्मीद जताई।
वार्ता के एजेंडे में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को शामिल किए जाने की संभावना है। इन वार्ताओं का ईरान– अमेरिका संबंधों और ईरान के अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह देखना अभी बाकी है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस पहल का स्वागत किया है लेकिन ट्रम्प प्रशासन द्वारा गाजा में नागरिकों के खिलाफ इज़रायल की कार्रवाइयों की निंदा न करना, गाजा में पुनर्निर्माण पर राष्ट्रपति ट्रम्प के उत्तेदक विचार और गाजा में फिलिस्तीनियों को मानवीय सहायता देने के लिए अमेरिकी सरकारी एजेंसियों के स्थान पर एक निजी संगठन को स्थापित करने से संयुक्त राज्य अमेरिका की छवि को नुकसान पहुँचा है।
कई लोगों के लिए, राष्ट्रपति ट्रंप का यह दावा कि संयुक्त राज्य अमेरिका क्षेत्र में शांति का समर्थन करना चाहता है, एक तर्कसंगत नीतिगत उद्देश्य है और इस क्षेत्र में उनकी सक्रियता को दर्शाता है। ट्रंप प्रशासन का नीतिगत नज़रिया क्षेत्र के साथ वैचारिक एकता, लोकतंत्र एवं साझा मूल्यों की जरूरत की बजाय परिमाण– उन्मुख नज़रिए से जुड़ना है। यह अमेरिकी व्यापार के लिए अवसरों की तलाश के अर्थ में अधिक लेन– देन वाला है; यह राष्ट्रपति ट्रम्प के पैसे, राजसी ठाठ– बाट और साथियों की प्रशंसा के प्रति व्यक्तिगत आकर्षण को भी दर्शाता है।
निष्कर्ष
राष्ट्रपति ट्रंप की विदेश नीति को अलगाव की ओर वापसी, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति उदासीनता या अनुशासनहीन कहना गलत होगा। उन्होंने ऐसे रणनीतिक लक्ष्य निर्धारित किए हैं जो अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देते हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय मानदंडों में उनकी रुचि कम है। उनका नज़रिया ऐसा प्रतीत होता है कि वे व्यवधान पैदा करने के विरोधी नहीं है और उसके बाद अनुबंध के चरण में वे संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए अधिकतम लाभ प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। मध्य– पूर्व में उन्होंने अमेरिकी हितों को आगे बढ़ाने के लिए ईरान के साथ बातचीत करने के प्रयासों के बावजूद, इज़रायल की सुरक्षा पर अपना मजबूत रुख बनाए रखा है।
अब अब्राह्म समझौते पर वापस लौटना चाहेंगे, जिसे उनका प्रशासन आर्थिक समृद्धि, राजनीतिक और कूटनीतिक स्थिरता एवं संयुक्त सुरक्षा रूपरेखा के लिए महत्वपूर्ण मानता है। ऐसा समझौता संयुक्त राज्य अमेरिका के सुरक्षा बोझ को हल्का करेगा और क्षेत्र में चीन, रूस और ईरान के 'अस्थिर' प्रभाव को भी कम करेगा। सतत आर्थिक सहभागिता एजेंडा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मध्य पूर्व में अस्थिरता न आए, आर्थिक विकास बना रहे और यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बना रहे।
हाल में हुए इस दौरे को राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में मध्य– पूर्व के प्रति अमेरिका के रुख में नए बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। यह मध्यपूर्व के देशों के साथ संबंधों के क्षेत्रों को पुनर्परिभाषित करने के प्रयास के माध्यम से, आर्थिक जुड़ाव, व्यापार– से– व्यापार निवेश पर ध्यान देने और क्षेत्रीय देशों के घरेलू शासन संबंधी मुद्दों, साथ ही क्षेत्र के युद्धों से दूर रहकर, विश्व की एकमात्र महाशक्ति के रूप में अमेरिका की वापसी को और मजबूत करता है। वास्तव में हम संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर से इन देशों के घरेलू विज़न दस्तावेज़ों की विकास प्राथमिकताओं के साथ पुनःसंरेखित करने का प्रयास देख रहे हैं।
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*डॉ. स्तुति बनर्जीआईसीडब्ल्यूए (ICWA) में वरिष्ट शोध अध्येता हैं।
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार लेखिका के व्यक्तिगत विचार हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[i] President Trump’s visits to the Middle East: Qatar, United Arab Emirates (UAE), and Saudi Arabia in 2025; Iraq in 2018; and Israel, Palestine, and Saudi Arabia in 2017.
[ii] The White House, “President Trump’s Speech to the Arab Islamic American Summit 21 May 2017,” https://trumpwhitehouse.archives.gov/briefings-statements/president-trumps-speech-arab-islamic-american-summit/, Accessed on July 4, 2025
[iii] The White House, “Fact Sheet: President Donald J. Trump Secures Historic $600 Billion Investment Commitment in Saudi Arabia, 13 May 2025,” https://www.whitehouse.gov/fact-sheets/2025/05/fact-sheet-president-donald-j-trump-secures-historic-600-billion-investment-commitment-in-saudi-arabia/, Accessed on July 4, 2025
[iv] Ibid. The White House, “Fact Sheet: President Donald J. Trump Secures Historic $600 Billion Investment Commitment in Saudi Arabia, 13 May 2025,” https://www.whitehouse.gov/fact-sheets/2025/05/fact-sheet-president-donald-j-trump-secures-historic-600-billion-investment-commitment-in-saudi-arabia/, Accessed on July 4, 2025
[v] The White House, “Fact Sheet: President Donald J. Trump Secures Historic $1.2 Trillion Economic Commitment in Qatar 14 May 2025,” https://www.whitehouse.gov/fact-sheets/2025/05/fact-sheet-president-donald-j-trump-secures-historic-1-2-trillion-economic-commitment-in-qatar/, Accessed on July 4, 2025
[vi] The White House, “Fact Sheet: President Donald J. Trump Secures $200 Billion in New US-UAE Deals and Accelerates Previously Committed $1.4 Trillion UAE Investment, 15 May 2025,” https://www.whitehouse.gov/fact-sheets/2025/05/fact-sheet-president-donald-j-trump-secures-200-billion-in-new-u-s-uae-deals-and-accelerates-previously-committed-1-4-trillion-uae-investment/, Accessed on July 4, 2025.
[vii] The Accords included bilateral agreements between Israel and Bahrain, Morocco, UAE and Sudan. The agreements are available at https://www.state.gov/the-abraham-accords
[viii] US Department of State, “The Abraham Accords Declaration 2020,” https://www.state.gov/the-abraham-accords , Accessed on July 4, 2025