24 फरवरी 2025 को यूक्रेन में युद्ध आरंभ हुए तीन साल हो गए। यह युद्ध रूस द्वारा “जल, थल और वायु के माध्यम से यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण” से शुरू हुआ था। रूस और यूक्रेन के नेतृत्व में कई चरणों के आक्रमण और जवाबी हमलों के बावजूद, अब तक कोई सफलता नहीं मिली है। संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यूक्रेन का समर्थन करने की अपने पूर्ववर्ती जो बाइडेन की नीति को उलट दिया है; यूक्रेन में भविष्य में शांति होगी या नहीं, इस बारे में केवल अनुमान ही लगाए जा रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में, यह विशेष रिपोर्ट यूक्रेन युद्ध के विभिन्न आयामों पर गहराई से चर्चा करती है। पहला खंड यूक्रेन में जारी संकट की जड़ों और विभिन्न चरणों पर गंभीरता से चर्चा करता है। दूसरा खंड बीते तीन वर्षों में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शांति मध्यस्थता प्रयासों पर प्रकाश डालता है। तीसरा खंड यूक्रेन शांति प्रक्रिया के संबंध में अटलांटिक पार विभाजन के मद्देनज़र उभरती स्थिति का विश्लेषण करता है और संकट पर भारत की स्थिति को बताते हुए समाप्त हो जाता है।
खंड I
पृष्ठभूमि
यूक्रेन में युद्ध की शुरूआत 24 फरवरी 2022 को हुई थी। इससे पहले यूक्रेन और रूस के बीच करीब आठ वर्षों से तनाव की स्थिति बनी हुई थी। साल 2013 में यूरोपीय संघ (ईयू) के पूर्वी साझेदार (ईएपी) शिखर सम्मेलन में यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच ने एक नियोजित एसोसिएशन अग्रीमेंट करने से इनकार कर दिया था। अग्रीमेंट में यूक्रेन का यूरोप से अधिक आर्थिक एकीकरण किए जाने की बात कही गई थी।[1]
ईएपी शिखर सम्मेलन की विफलता ने यूक्रेन में प्रदर्शनों का रास्ता खोल दिया जो पश्चिमी और रूसी समर्थक भावनाओं में बंटे थे। जब स्थिति बिगड़ी तो राष्ट्रपति यानुकोविच ने 22 फरवरी 2014 को देश छोड़ दिया और रूस में शरण ले ली। मार्च 2014 में, रूस ने क्रीमिया पर कब्ज़ा कर लिया और अपने कब्जे के समर्थन को सिद्ध करने के लिए क्रीमिया में जनमत संग्रह आयोजित किया। इस जनमत संग्रह को अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली और इसके बाद रूस– यूक्रेन के साथ– साथ पश्चिम– रूस के बीच तनाव फिर से बढ़ गया। वर्ष 2014 में हुई इन घटनाओं के बाद से, पूर्वी यूक्रेन में सशस्त्र टकराव जारी रहा क्योंकि यूक्रेन और रूस द्वारा मिन्स्क शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बावजूद कोई सफलता नहीं मिल सकी, जिसे फ्रांस और जर्मनी के साथ– साथ यूरोप सुरक्षा और सहयोग संगठन (ओएससीई/OSCE) द्वारा सुगम बनाया गया था।
बढ़ते तनाव के बीच, पूर्वी यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र (डोनेस्क और लुहांस्क) में संप्रभुता जनमत संग्रह कराए गए जिसमें मुख्य रूप से गैर– यहूदी रूसी हैं, जिससे यूक्रेन में पूर्व– पश्चिम की खाई और गहरी हो गई। परिणामस्वरूप, इस क्षेत्र में 2014 से सशस्त्र संघर्ष जारी है।
यूक्रेन संकट का नया अध्याय फरवरी 2022 से शुरू हुआ जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने डोनबास क्षेत्र को मान्यता दे दी, 21 फरवरी 2022[2] को डोनेस्क और लुहांस्क के साथ "मैत्री, सहयोग एवं परस्पर मदद की संधि" कर ली और फिर “जल–थल–वायु तीनों ही तरफ से यूक्रेन पर हमला” कर दिया।[3]
लंबा– संघर्ष: 2022 से अब तक के विभिन्न चरण और वर्तमान स्थिति
बीते तीन सालों में यूक्रेन में जारी युद्ध कई चरणों से गुज़रा है। पहला चरण 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन पर रूस के हमले के साथ शुरू हुई और 25 मार्च 2022 के आसपास तब समाप्त हुआ जब रूस ने "अभियान के पहले चरण के मुख्य उद्देश्यों” के पूरा कर लिए जाने की घोषणा की।[4] इसके बाद रूस की सैन्य गतिविधियों में कमी आई और रूस एवं यूक्रेन के अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत भी हुई। इनमें सबसे उल्लेखनीय तुर्कीए की मध्यस्थता वाली शांति वार्ता रही। हालांकि, बुचा (यूक्रेन की राजधानी कीव के बाहरी इलाके में बसा शहर) विवाद के बाद नए सिरे से तनाव पैदा हो गया और वार्ता रोक दी गई। रूस पर युद्ध जारी रखने का आरोप लगाया गया था।[5]
अप्रैल 2022 के मध्य में, रूस ने पूर्वी यूक्रेन में नए सिरे से हमला शुरू कर दिया। अगस्त 2022 के मध्य तक, युद्ध क्षेत्र यूक्रेन के दक्षिण– पूर्व में स्थानांतरित हो गया, इसमें ज़ापोरिज्जिया, जहाँ एक परमाणु संयंत्र है, भी आता है। रूस के नए सैन्य अभियान के बाद एक प्रमुख घटनाक्रम सितंबर 2022 में यूक्रेन द्वारा शुरू किया गया जवाबी हमला था। हालांकि रूस बाद में स्थिति को नियंत्रित करने में समर्थ था लेकिन यूक्रेन का प्रतिरोध संघर्ष का एक निर्णायक पल था। यूक्रेन ने लचीलापन दिखाया और जवाबी हमले के दौरान खारकीव क्षेत्र पर फिर से कब्ज़ा हासिल करने में कामयाब हो गया। यूक्रेन के जवाबी हमले के बाद, रूस ने फरवरी 2023 में यूक्रेन के खिलाफ नए सिरे से हमले शुरू किए, इस बार उसने पूर्वी यूक्रेन के डोनेस्क क्षेत्र को निशाना बनाया।
यूक्रेन ने जून 2023 की शुरुआत में एक और जवाबी हमला किया, जिसका उद्देश्य “डोनेस्क प्रांत में पूर्व की ओर रूस के सुरक्षा घेरे में सेंध लगाना था, जिसमें बखमुट के आसपास और ज़ापोरिज्जिया प्रांत, जो क्रीमिया के लिए भू– गलियारा बनाता है, में, दक्षिण की तरफ रूस की सुरक्षा तोड़ना था।”[6] पश्चिम के समर्थन के बावजूद, जवाबी हमले का यह दौर असफल रहा और यूक्रेन को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस बीच, एक ऐसा दौर भी आया जब रूस को आंतरिक विद्रोह का सामना करना पड़ा। वैगनर प्राइवेट मिलिट्री कंपनी (पीएमसी) समूह के प्रमुख येवगेनी प्रिगोझिन द्वारा रूसी रक्षा मंत्रालय (एमओडी) पर उनके शिवरों पर हमले करने का आरोप लगाया गया और समूह ने मॉस्को की ओर मार्च करना शुरू कर दिया।[7]
असफलताओं के एक चरण के बाद, रूस स्थिति को अपने पक्ष में करने में सक्षम था। आने वाले महीनों में यूक्रेन के खिलाफ उसने हमले जारी रखे। ऐसा 2024 के मध्य तक जारी रहा। इस चरण में कुछ उल्लेखनीय घटनाएं भी हुईं, जैसे– फरवरी 2024 में अवदिवका पर रूसी कब्ज़ा, जिसके बाद अवदिवका के पश्चिम में लगातार रूसी आक्रामक अभियान चलाए गए; मई 2024 में उत्तरी खारकीव ओब्लास्ट में रूस का आक्रामक युद्धाभ्यास और जून– जुलाई 2024 में टोरेस्क और कुराखोव के आसपास रूस के आक्रामक अभियानों में तेजी आई।[8]
हमलों और जवाबी हमलों के बीच अगस्त 2024 में एक ऐसा चरण शुरू हुआ जब यूक्रेन ने कुर्स्क क्षेत्र में रूस के खिलाफ अपना पहला सीमा–पार हमला शुरू किया। यूक्रेन की सेना ने रूस पर अचानक सीमा पार हमला करने के लिए मशीनों से लैस पैदल सेना और तोपों का इस्तेमाल किया और वे सुदज़ा शहर समेत लगभग 1,250 वर्ग किलोमीटर भीतर घुस गए। हमलों में यूक्रेन की प्रगति रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसका उद्देश्य यूक्रेन के पूर्व से रूसी सेना को हटाना था। अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यूक्रेन का हमला प्रतीकात्मक था क्योंकि इसने सीमा पार हमला करने में रूस को चुनौती देने की अपनी अभूतपूर्व क्षमता का प्रदर्शन किया था।[9] यह यूक्रेन संकट पर ध्यान वापस लाने में भी मददगार साबित हुआ क्योंकि पश्चिम का ध्यान इज़रायल– हमास युद्ध पर भी था। यूक्रेन द्वार हमला शुरू करने से महीनों पहले, पश्चिमी समर्थन कम होना शुरू हो गया था। जैसे, यूक्रेन को पश्चिम से मदद मिलने में बहुत देर हुई। इसके अलावा, पश्चिम के नेताओं ने इस दौरान रूस की सुरक्षा का विरोध करने के लिए यूक्रेन को "सक्रिए रक्षा" करने के लिए भी प्रोत्साहित किया। इस मोड़ पर यूक्रेन के हमले की स्थिति ने पश्चिमी आकलन को बदल दिया[10] और रूस के खिलाफ देश के लिए मजबूत समर्थन को प्रेरित किया।
हाल के घटनाक्रमों में, यूक्रेन ने 5 जनवरी 2025 को कुर्स्क पर एक नया हमला शुरू किया और फिर 6 फरवरी 2025 को एक और हमला किया।[11] हालांकि, इस नए हमले में प्रगति बहुत सीमित है लेकिन यह पूर्वी यूक्रेन के डोनेस्क क्षेत्र में रूस की प्रगति के लिए भटकाव की तरह काम करना जारी रखता है। दूसरी ओर, रूस ने हाल के महीनों में, विशेष रूप से बीते कुछ दिनों में यूक्रेन के खिलाफ ड्रोन हमलों को बढ़ा दिया है।[12]
युद्ध के तीन साल पूरे होने पर, यूक्रेन युद्ध के विभिन्न चरण क्षेत्रीय संघर्षों की वैश्विक प्रकृति में महत्वपूर्ण स्मरणपत्र के रूप में काम करते हैं– 2022 से आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान पूरी दुनिया, विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के लिए नुकसानदेह रहा है। यह युद्ध आधुनिक युद्ध के संचालन में महत्वपूर्ण सबक भी देता है। इसमें अन्यों के अलावा ड्रोन का प्रयोग; पीएमसी/विदेशी सैन्य कर्मचारियों का इस्तेमाल; डिजिटल/सोशल मीडिया जंग के सबक भी हैं।[13] इस बीच, ईरान, चीन और उत्तर कोरिया भी भागीदारी एवं रूस के प्रति उनके समर्थन ने संकट में जटिल परत बना दी है। अपने हितों और नज़रियों के बावजूद, इन देसों को बांधने वाला एक सामान्य सूत्र पश्चिम, विशेष रूप से अमेरिका, के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं हैं। इस संबंध में, इन देशों के बीच संकट और उभरते समीकरण भी अमेरिका के नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था को चुनौती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
संकट की वैश्विक प्रकृति ने अनिवार्य रूप से विश्व भर के देशों से अलग– अलग शांति प्रस्तावों को जन्म दिया है, हालांकि सीमित सफलता के साथ। युद्ध के बाद हुई विभिन्न शांति प्रक्रियाओं और उनके अपर्याप्त परिणामों के कारणों को आगामी खंडों में बताया गया है।
खंड II
ट्रम्प 2.0 की शुरुआत के साथ ही यूक्रेन में शांति प्रक्रिया को लेकर बयानबाज़ी तेज़ हो गई है। युद्ध के शुरुआती दौर में बेलारूस और तुर्की में शांति वार्ता के शुरुआती दौर को छोड़ दें तो फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से विश्वसनीय शांति वार्ता का अभाव रहा है। इस संबंध में, सऊदी अरब में हाल ही में संपन्न हुए रूस– अमेरिका शांति वार्ता– शांति वार्ता बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण मोड़ है। हालाँकि, यूरोप और यूक्रेन के वार्ता की मेज से अनुपस्थित रहने के कारण विश्वसनीयता संदिग्ध बनी ही है। इस संदर्भ में, यह ध्यान देने योग्य बात है कि विश्व में अलग– अलग देशों द्वारा प्रस्तावित विभिन्न शांति योजनाओं/ प्रक्रियाओं के बावजूद यूक्रेन में “शांति” क्यों मायावी बनी हुई है।
कूटनीतिक पहलः अंतरराष्ट्रीय शांति मध्यस्थता प्रयासों की समीक्षा
रूस– यूक्रेन द्विपक्षीय वार्ता और इस्तांबुल विज्ञप्ति
रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता युद्ध शुरू होने के तत्काल बाद शुरू हो गई थी जब दोनों पक्ष 28 फरवरी 2022 को वार्ता के पहले दौर के लिए यूक्रेन– बेलारूस सीमा पर मिले थे। द्विपक्षीय वार्ता से पहले अगले दो माह तक इस तरह के और दौर चले, जहां दोनों पक्ष मार्च 2022 के अंत तक तुर्कीए द्वारा संचालित इंस्ताबुल विज्ञप्ति में लगभग समझौते की स्थिति में थे लेकिन बुचा में कथित रूसी हमले और शांति वार्ता के प्रति पश्चिम देशों की उदासीनता के बाद अचानक समाप्त हो गई। इसमें पश्चिम की कोई भूमिका नहीं थी।[14] इसके अलावा, विज्ञप्ति की विफलता के लिए वार्ता की महत्वाकांक्षी प्रकृति को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जहाँ दोनों पक्ष शीत युद्ध के बाद की सुरक्षा संरचना के सिद्धांतों पर ही बात करते हैं, लेकिन युद्ध विराम और मानवीय गलियारों जैसे तात्कालिक मुद्दों पर कोई प्रगति नहीं की।[15]
इस्तांबुल विज्ञप्ति दोनों पक्षों के बीच शांति समझौते के सबसे करीब है, जहां यूक्रेन ने रूस और पश्चिम से सुरक्षा गारंटी एवं भविष्य में यूरोपीय संघ की सदस्यता के बदले में तटस्थ (नाटो या किसी अन्य सैन्य गठबंधन में सदस्यता की कोई महत्वाकांक्षा नहीं) और गैर– परमाणु स्थिति (सीमित सेना के साथ) पर सहमति व्यक्त की।[16] दिलचस्प बात यह है कि विज्ञप्ति में क्रीमिया का भी उल्लेख किया गया था, जहाँ दोनों पक्षों से दस से पंद्रह (15) वर्षों के भीतर इस विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से हल करने की आशा की गई थी। इस प्रकार, इस्तांबुल विज्ञप्ति वार्ता प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण घटना थी जहाँ रूस ने यूक्रेन के लिए यूरोपीय संघ की सदस्यता और क्रीमिया प्रायद्वीप की स्थिति पर किसी भी चर्चा के प्रति अपना विरोध स्वीकार कर लिया है, बदले में उसने कीव के लिए तटस्थता की बात कही है।
हाल ही में, राष्ट्रपति पुतिन ने निरस्त शांति समझौते और इस्तांबुल विज्ञप्ति के रूप में दोनों पक्षों द्वारा तय की गई वार्ता की सहमत शर्तों के आधार पर वार्ता को फिर से शुरू करने का सुझाव दिया है। उन्होंने बार– बार पश्चिम पर रूस और यूक्रेन के बीच इस्तांबुल वार्ता को विफल करने का आरोप लगाया है।
तृतीय– पक्ष शांति पहल
इस्तांबुल वार्ता के खत्म होने के साथ ही दोनों पक्षों के बीच सीधी बातचीत भी खत्म हो गई और उसके बाद तीसरे पक्ष की शांति और कूटनीतिक पहल शुरू हुई। ये शांति योजनाएं चीन, ब्राजील, इंडोनेशिया, मैक्सिको और दक्षिण अफ्रीका जैसे देसों से आई हैं। हालांकि, इनमें से कोई भी दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने में सफल नहीं हो पाया है और दुनिया भर में कोई विशेष प्रगति हासिल करने में विफल रहा है।
चीन ने युद्ध की पहली वर्षगांठ पर अपना 12-सूत्री शांति प्रस्ताव रखा[17] और शत्रुता समाप्त करने, मानवीय गलियारों की सुविधा, रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता की बहाली, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, युद्धबंदियों की अदला– बदली एवं परमाणु प्रतिबंधों का उपयोग जैसे सिद्धांतों की वकालत की। हालाँकि, राष्ट्रपति पुतिन ने शांति हेतु “वास्तविक इच्छा” के रूप में इसका स्वागत किया[18], लेकिन शांति योजना इस सरल कारण से असफल रही कि इसमें शांति प्राप्त हेतु आवश्यक ठोस कदम नहीं बताए गए हैं। यह चीन के वैश्विक नज़रिए की पुनरावृत्ति है जैसे कि बीजिंग द्वारा शीत युद्ध की मानसिकता को छोड़ने, एकतरफा प्रतिबंधों को समाप्त करने और औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखलाओं की स्थिरता सुनिश्चित करने के आह्वान में देखा जा सकता है जिससे चीन को बहुत लाभ हुआ है।
एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों से मिलकर बना ग्लोबल साउथ युद्ध का मुखर आलोचक रहा है और ऊर्जा, भोजन एवं उर्वरक की आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा, जो सीधे– सीधे उनकी अर्थव्यवस्था एवं आजीविका को प्रभावित करता है, जैसे स्पष्ट कारणों से बातचीत के जरिए शांति की मांग कर रहा है। साथ ही उन्होंने पश्चिम से अपनी दूरी बनाए रखी है और यूक्रेन को पश्चिमी प्रतिबंधों एवं हथियार वितरण कार्यक्रमों का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है। भोजन, ऊर्वरक एवं ऊर्जा सुरक्षा की अपनी जरूरतों के कारण ब्राजील[19], मैक्सिको[20], इंडोनेशिया[21] और कुछ अफ्रीकी[22] देश शांति योजनाएं लेकर आए जिनका उद्देश्य युद्ध को समाप्त करना और वैश्विक खाद्य एवं ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं में सामान्य स्थिति वापस लाना है। इन शांति योजनाओं में मुख्य रूप से विश्वास– निर्माण उपायों को सुविधाजनक बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जैसे कि युद्ध विराम, संवाद और कूटनीति, तनाव कम करना, परमाणु प्रतिबंध एवं मानवीय मदद। साल 2023 में शांगरी– ला वार्ता के दौरान प्रस्तुत इंडोनेशिया की शांति योजना, एक कदम आगे बढ़ते हुए कोरिया जैसी शांति गतिरोध का प्रस्ताव करती है, जिसमें दोनों पक्ष वर्तमान स्थिति में युद्ध विराम कर सकते हैं और शांति समझौता होने तक शांति बनाए रख सकते हैं।
ज़ेलेंस्की का शांति सूत्र और स्विस शिखर सम्मेलन
राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने बाली में जी–20 शिखर सम्मेलन के दौरान अपना दस सूत्री शींति सूत्र प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने रूस की वापसी, यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता (क्रीमिया समेत) की पूर्ण बहाली और सुरक्षा गारंटी को किसी भी शांति समझौते के लिए पूर्व शर्त के रूप में रखा। परमाणु सुरक्षा के अलावा, यूक्रेन के ऊर्जा अवसंरचना की बहाली समेत खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, युद्धबंदियों के आदान– प्रदान एवं युद्ध के अभियोजन पर भी जोर दिया गया है।
ज़ेलेंस्की के फॉर्मूले के आधार पर, यूक्रेन में शांति पर एक स्विस– मेज़बान शिखर सम्मेलन 15 जून 2024 को हुआ जो यूक्रेन और उसके पश्चिमी सहयोगियों के प्रयासों के बावजूद, कुछ भी महत्वपूर्ण परिणाम लाने में विफल रहा। जारी की गई संयुक्त विज्ञप्ति केवल परमाणु सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और युद्धबंदियों की रिहाई और विनिमय जैसे मुद्दों पर एक आम समझ बना सकी। यह यूक्रेनी नेतृत्व के लिए एक झटका था कि जारी की गई विज्ञप्ति एक कमज़ोर दस्तावेज़ थी, जो वर्तमान में रूस के कब्जे वाले यूक्रेन के क्षेत्रों के सवाल पर भाग लेने वाले देशों (आमंत्रित 160 में से लगभग 90) के बीच आम सहमति बनाने में विफल रही और फिर भी भारत, ब्राज़ील एवं दक्षिण अफ्रीका जैसे ग्लोबल साउथ के प्रमुख देशों ने दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। चीन ने पहले ही शिखर सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया था।
यह भी तर्क दिया जा सकता है कि रूसी संघ की भागीदारी के बिना एकतरफा शिखर सम्मेलन आयोजित कर स्विस ने न केवल अपनी तटस्थता से समझौता किया है बल्कि अधिक सार्थक एवं प्रभावी भूमिका निभाने का अवसर भी गंवा दिया है। अंततः शिखर सम्मेलन एक बातचीत की दुकान से कुछ अधिक नहीं रह गया जहाँ केवल युद्ध के व्यापक मुद्दों पर चर्चा की गई, जिससे युद्ध विराम और रूसी सैनिकों की वापसी जैसे तात्कालिक मुद्दों पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया।
ट्रम्प की शांति योजना
व्हाइट हाइउस में ट्रंप की वापसी ने युद्ध की गतिशीलता को पूरी तरह से बदल दिया है। युद्ध को समाप्त करने के अपने प्रयास में राष्ट्रपति ट्रंप ने यूरोपीय और यूक्रेन के नेताओं किनारे कर दिया है और रूस के साथ सीधी वार्ता शुरू कर दी है। यूरोप और यूक्रेन को आश्चर्य हुआ कि युद्ध को समाप्त करने के लिए 18 फरवरी को शांति वार्ता के पहले दौर के लिए रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका के वार्ता प्रतिनिधिमंडल ने रियाद में मुलाकात की। इस शांति वार्ता में यूरोप और यूक्रेन का कोई प्रतिनिधि नहीं था।
दोनों पक्षों ने अपने द्विपक्षीय संबंधों में परेशानियों को दूर करने के लिए एक परामर्श व्यवस्था बनाने और यूक्रेन में युद्ध को समाप्त करने के लिए एक उच्च स्तरीय टीम नियुक्त करने पर सहमति व्यक्त की। रूस और अमेरिका के बीच सीधी बातचीत की प्रकिया की शुरुआत रूस के लिए एक बड़ी रणनीतिक जीत है, जो इस युद्ध को यूरोप के व्यापक शीत युद्ध के बाद के सुरक्षा ढांचे से रूस की निराशा के परिणाम के रूप में पेश कर रहा है। युद्ध के मैदान पर रूस के सैनिकों को हाल में मिली सफलताओं एवं यूक्रेन के कुर्स्क घुसपैठ की संबंधित विफलता ने रूस को बेहतर स्थिति में बातचीत करने के लिए प्रेरित किया है।
ट्रम्प के राष्ट्रपति अभियान पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि वह जल्द– से– जल्द युद्ध को समाप्त करना चाहते हैं, भले ही इसके लिए यूक्रेन को अपने क्षेत्र रूस के हाथों गंवाने पड़े। ट्रम्प के सलाहकारों ने पहले ही यूक्रेन को नाटो की सदस्यता मिलने की संभावना को खारिज कर दिया है। वार्ता प्रक्रिया में यूरोप कहीं नज़र नहीं आ रहा है और अमेरिका–रूस वार्ता के परिणामस्वरूप यूरोप के लिए एक नई सुरक्षा संरचना बन सकती है, जहाँ यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता की कीमत पर रूस की अधिकांश सुरक्षा चिंताओं का सम्मान किया जाएगा।
शांति योजनाओं की विफलता: कूटनीति पर ठोस सबक?
जान–माल के मामले में विनाशकारी परिणामों के बावजूद, दोनों पक्ष बिना किसी द्विपक्षीय शांति वार्ता के पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समझौता करने में विफल रहे हैं और तीसरे पक्ष की मध्यस्थता वाले शांति समझौते के प्रति विरोध और अविश्वास है। फिर, दोनों पक्षों को सही तरह से शांति समझौते पर सहमत होने से किसने रोका है जो यूक्रेन की क्षेत्रीय संप्रभुता का सम्मान करेगा और रूस के वास्तविक सुरक्षा हितों का संज्ञान लेगा?
सबसे पहले, प्रत्येक पक्ष के नीति निर्माताओं के बीच दूसरे पक्ष के वास्तविक इरादों एवं डिजाइनों के बारे में गहरा अविश्वास है। ये संदेह वैध कारणों से पैदा होते हैं- (1) रूस का बुडापेस्ट मेमोरेंडम (1994) का उल्लंघन, जिसने यूक्रेन, बेलारूस और कज़ाकिस्तान को उनके सोवियत युग के परमाणु शस्त्रागार को वापस करने के बदले में सुरक्षा आश्वासन (गारंटी नहीं) दिया था (2) नाटो विस्तार (जैसा कि रूस ने दावा किया है) के छह दौर के बावजूद अमेरिकियों द्वारा विस्तार न करने का वादा (पश्चिम ने ऐसी कोई प्रतिबद्धता देने से इनकार किया है) और (3) एंजेला मार्केल जैसे यूरोपीय नेताओं के बयान, जिसमें उन्होंने दावा[23] किया है कि मिन्स्क समझौते पर हस्ताक्षर यूक्रेन को शक्ति प्राप्त करने के लिए समय देने के लिए किया गया था। इसकी वजह से रूस का पश्चिम के प्रति अविश्वास बढ़ गया है। ऐसी स्थिति में, दोनों पक्षों को लगा है कि शांति समझौते पर पहुँचने के बाद भी दूसरा पक्ष अपना वादा नहीं निभाएगा।
शांति समझौते पर बातचीत करने में विफलता का कारण दोनों पक्षों द्वारा अपनाए गए अतिवादी रुख भी हैं। ऐसे में जबकि यूक्रेन ने रूस के साथ द्विपक्षीय शांति वार्ता पूरी तरह से बंद कर दिया है, क्रेमलिन ने लगातार यह कहा है कि डोनबास, लुहांस्क और क्रीमिया की स्थिति पर बातचीत का सवाल ही नहीं उठता। दूसरे कारण, जैसे कि अपने सशस्त्र बलों की ताकत में दृढ़ विश्वास और भविष्य की वार्ताओं में बढ़त हासिल करने के लिए कब्जा किए गए क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करने और नए क्षेत्रों को हासिल करने की निरंतर तलाश (यूक्रेन आक्रमण और कुर्स्क पर किया गया हमला), तीसरे पक्ष के प्रस्ताव में विशिष्टता का अभाव, एक कमजोर संयुक्त राष्ट्र और पश्चिम में यह विश्वास की रूस के पक्ष में यूक्रेन के क्षेत्रों का बलिदान करने वाली कोई भी शांति वार्ता विवादों को निपटाने के साधन के रूप में युद्ध को सामान्य बना देगी, ने भी, युद्ध को जारी रखने में बहुत योगदान दिया है।
रूस के साथ सीधी बातचीत शुरू करके ट्रंप ने बातचीत की प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। युद्ध से सीधे प्रभावित यूक्रेन और यूरोप की लगभग अनुपस्थिति सऊदी अरब में शांति वार्ता को कई वैधता नहीं देती है। शुरू से ही इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि युद्ध के किसी भी समाधान में युद्धरत पक्षों की वैध चिंताओं को शामिल किया जाना चाहिए। दोनों पक्ष यानि यूक्रेन और रूस दो अलग– अलग हितधारकों– अमेरिका और यूरोप से बात कर रहे हैं। दोनों राजधानियों के बीच अभी भी कोई सीधा संवाद नहीं है। इसके अलावा ट्रंप के आने से न केवल शांति प्रक्रिया जटिल हुई है बल्कि यूरो– अटलांटिक गठबंधन के अस्थिर होने का भी खतरा है जिससे यूरोपीय असुरक्षाएं और बढेंगी। व्हाइट हाउस में ट्रंप और ज़ेलेंस्की के बीच हाल ही में हुई तकरार ने शांति प्रक्रिया को और जटिल बना दिया है। यूक्रेन और उसके यूरोपीय सहयोगियों ने उनकी भागीदारी के बिना किसी भी सांति समझौते को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। यूक्रेनी संप्रभुता की कीमत पर भी शांति वार्ता को तेज करने के ट्रंप के दृढ़ संकल्प ने यूरो– अटलांटिक गठबंधन में बहुत तनाव पैदा कर दिया है और इसका नतीजा यूरोप में एक और हथियारों की दौड़ में हो सकता है क्योंकि जारी युद्ध के मद्देनज़र यूरोप की रक्षा कमियां उजागर हो गई हैं। अटलांटिक पार गठबंध में तनाव और उसके बाद रूस के साथ ट्रंप की मित्रता न केवल यूक्रेन के लिए बल्कि यूरोप की व्यापक सुरक्षा और वैश्विक शांति स्थिरता के लिए भी हानिकारक साबित हो रही है।
असफल शांति प्रयासों के संदर्भ में, यूक्रेन की स्थिति में युद्ध कूटनीति और वार्ता के लिए मूल्यवान सबक भी हैं। जारी युद्ध बहुत हद तक यूरोप के लिए शीत युद्ध के बाद की सुरक्षा संरचना का परिणाम है जो रूस की भागीदारी के बिना विकसित हुई और बहुत हद तक नाटो विस्तार के कई दौरों के साथ रूस की असहमति को दर्शाती है। हालांकि रूस ने अतीत में अक्सर नाटो के विस्तार की आलोचना की है, उसने दिसंबर 2021 में पहली बार अटलांटिक पार गठबंधन से लिखित सुरक्षा गारंटी मांगी।[24] रूसी मांगों में यूक्रेन को नाटो को किसी भी संभावित सदस्यता पर रोक लगाना शामिल था। रूस को यह भी आशा थी कि नाटो यूरोप के पूर्वी परिधि में अपने सैनिकों और हथियारों की तैनाती को सीमित करेगा। पश्चिम और रूस के बीच व्यापक संचार अंतराल और विशेष रूप से इन सुरक्षा गारंटियों पर बातचीत करने में विफलता ने संघर्ष के एक नए चरण को जन्म दिया जब रूस ने दो महीने बाद यूक्रेन पर हमला कर दिया और जंग छेड़ दी।
किसी भी सफलता तक पहुँचने में विफलता विवादों को हल करने में कूटनीति (द्विपक्षीय और बहुपक्षीय दोनों) की सीमाओं को दर्शाती है। यूक्रेन के संबंध में, विभिन्न हितधारकों के बीच बातचीत में होने वाली देरी के कारण अक्सर एक गैर– समावेशी शांति मध्यस्था प्रक्रिया हुई है जिसके परिणामस्वरूप काफी समय से युद्ध जारी है। नतीजतन, युद्ध की मानवीय लागत बहुत बड़ी रही है लेकिन राजनीतिक मतभेदों के कारण इसे अक्सर दरकिनार कर दिया गया है। कूटनीति की लेन–देन की प्रकृति सामने आई है, जिसका सबसे हालिया उदाहरण प्रस्तावित यूएस– यूक्रेन खनिज सौदा है जो अमेरिका को यूक्रेन के दुर्लभ खनिज– भंडार तक पहुँच प्रदान करता है। इस सौदे के बाद पुनर्निर्माण निवेश कोष में यह प्रावधान है कि यूक्रेन अमेरिका को राजस्व का लगभग 50 फीसदी देगा। इस लिहाज से यह सौदा यूक्रेन को रूस के साथ युद्ध के आरंभ से लेकर अब तक अमेरिका से प्राप्त वित्तीय और सैन्य मदद चुकाने में मदद करेगा।[25]
साथ ही, पश्चिम– रूस के बीच चल रहे तनाव ने शांति की मध्यस्थता में संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय निकायों की स्पष्ट खामियों को उजागर किया है। इसने एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की जटिलताओं को भी उजागर किया है। इसने एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की जटिलताओं को भी उजागर किया है जहाँ विभिन्न शक्ति केंद्रों ने युद्ध पर अलग– अलग रुख अपनाया है, जिससे शांति समझौते तक पहुँचना मुश्किल हो गया है।
इस पृष्ठभूमि में, भारत सभी हितधारकों के साथ बातचीत करने और संकट को हल करने के लिए सभी पक्षों से समावेशी कूटनीतिक प्रयास करने का आग्रह करने के लिए आगे आया है। इसने युद्ध की शुरुआत से ही यूक्रेन को उदार मानवीय सहायता प्रदान करके बातचीत का नेतृत्व भी किया है।
खंड III
निष्कर्ष
यूक्रेन में युद्ध क्षेत्रीय विवादों की वैश्विक प्रकृति को समझने का एक महत्वपूर्ण पाठ है। इस संकट ने यूरोप में सुरक्षा संरचना के लिए अपरिहार्य परिणाम दिए हैं, इसने भविष्य में उभरने वाले अन्य समस्याओं पर भी नए सिरे से ध्यान आकर्षित किया है। इस संबंध में विचार करने के लिए सबसे प्रमुख रंगमंच हिंद– प्रशांत क्षेत्र है। इस क्षेत्र में चीन की हठी रवैया, अमेरिका– चीन टकराव और पश्चिम– रूस तनाव के मद्देनज़र रूस– चीन की “असीमित साझेदारी” हिंद– प्रशांत में उभरती स्थिति के लिए निहितार्थ हैं। उदाहरण के लिए, “चीन अमेरिका की हिंद– प्रशांत रणनीति के लिए स्थायी चुनौती बना हुआ है, हाल के दिनों में उत्तर कोरिया सबसे तात्कालिक चुनौती के रूप में उभरा है”।[26] इस संदर्भ में यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यूक्रेन के विपरीत, जो अब परमाणु संपन्न राष्ट्र नहीं रहा, हिंद– प्रशांत क्षेत्र में प्रमुख हितधारक परमाणु संपन्न राष्ट्र हैं, जिससे विवाद की स्थिति में परिस्थिति पहले से अधिक गंभीर हो जाती है।
ओवल ऑफिस में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी ने यूक्रेन के लिए पश्चिमी समर्थन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा यूक्रेन के राष्ट्रपित व्लादिमीर ज़ेलेंस्की की आलोचना और रूस के साथ सीधी शांति वार्ता के लिए दबाव डालना, जारी युद्ध का एक निर्णायक क्षण है। इसने यूक्रेन के संबंध में लड़खड़ाती अटलांटिक पार एकता, साथ ही समग्र सुरक्षा संरचना पर भी ध्यान दिया है। हाल ही में संपन्न म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की यूरोप की मुखर आलोचना; और सऊदी अरब में शांति वार्ता में यूरोपीय और यूक्रेन के हितधारकों की अनुपस्थिति, ट्रम्प के शासन में अमेरिका और रूस के बीच बढ़ती दूरियों को दर्शाती है। इसके अलावा, यूरोप में यूक्रेन की थकान के स्पष्ट संकेत भी हैं क्योंकि देश घरेलू नीति चुनौतियों से निपटते हैं। ऐसे में जब शांति वार्ता की शुरुआत एक सकारात्मक संकेत है, कोई भी सफलता सभी हितधारकों की भागीदारी पर निर्भर करती है और 2014 के यूक्रेन संकट के बाद दो मिन्स्क शांति समझौतों का विफल कार्यान्वयन इस संबंध में महत्वपूर्ण चेतावनी को दर्शाता है।
भारत की स्थिति
संकट के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान को देखते हुए, दुनिया भर के क्षेत्रों को भी संघर्ष के शीघ्र समाधान में हिस्सेदारी करनी है। इस रिपोर्ट में चर्चा किए गए विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शांति प्रस्ताव संकट पर वैश्विक ध्यान और हिस्सेदारी को उजागर करते हैं। इस संदर्भ में, भारत का रुख विशेष ध्यान देने योग्य है क्योंकि देश ने पूरे संकट के दौरान कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा है। भारत ने विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत और कूटनीति की वकालत करके एक सैद्धांतिक और सुसंगत स्थिति बनाए रखी है। भारतीय नेतृत्व ने अक्सर शत्रुता को तत्काल समाप्त करने का आह्वान किया है और युद्ध की शुरुआत से ही रूस और यूक्रेन के शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत की है। इसमें राष्ट्रपति पुतिन और राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की दोनों के साथ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टेलीफोन पर बातचीत शामिल है। इसके अलावा, भारतीय प्रधानमंत्री ने अगस्त 2024 में रूस और यूक्रेन दोनों का दौरा किया और भारत की प्रतिबद्धता और "शांति की शीघ्र वापसी को सुविधाजनक बनाने हेतु हर संभव तरीके से योगदान” करने की इच्छा को दोहराया।[27] भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ जोहान्सबर्ग में हुई मुलाकातों ने सभी हितधारकों के साथ भारत के कूटनीतिक प्रयासों को दोहराया है। पीएम मोदी का प्रसिद्ध कथन “यह युद्ध का समय नहीं है” न केवल यूरोप में संकट के प्रति भारत के नज़रिए को परिभाषित करता है बल्कि बड़ी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रति भी भारत के नज़रिए को परिभाषित करता है जिसमें भारत वैश्विक समुदाय के मार्गदर्शक के रूप में सहयो और समन्वय हेतु मुखर रहा है। साथ ही, भारत अपने विकास और सुरक्षा जरूरतों के प्रति भी सचेत रहा है। इसलिए उसने अपने राष्ट्रीय हितों के अनुकूल रवैया बनाए रखा है। भारत की भूमिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार किया गया है, इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण भारत की सफल जी-20 अध्यक्षता है। सितंबर 2023 में नई दिल्ली में जी–20 शिखर सम्मेलन में भारत यूक्रेन पर पश्चिम– रूस तनाव के बावजूद एक संयुक्त घोषणा हेतु बातचीत करने में सक्षम था।
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*डॉ. हिमानी पंत, शोध अध्येता और अमन कुमार, रिसर्च एसोसिएट, इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (ICWA)
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[1] Pressure on Yanukovych, Deutsche Welle, November 28, 2013, https:// www.dw.com/en/the-pressure-on-yanukovych-increases/a-17257434 (Accessed on February 20, 2025).
[2] President signed Federal Law on Ratifying the Treaty of Friendship, Cooperation and Mutual Assistance between the Russian Federation and DPR and LPR, The Kremlin, http://kremlin.ru/acts/news/6783 (Accessed on
[3] Address by the President of the Russian Federation, the Kremlin, February 24, 2022, http://en.kremlin.ru/events/president/ news/67843 (Accessed on February 15, 2025).
[4] Main objectives of first stage of special operation in Ukraine generally accomplished - Russian General Staff, Interfax, March 25, 2022, https://interfax.com/newsroom/top-stories/77393/.
[5] Ukraine: Russian Forces’ Trail of Death in Bucha, Human Rights Watch, April 21, 2022, https://www.hrw.org/news/2022/04/21/ukraine-russian-forces-trail-death-bucha(Accessed 20 February 2025).
[6] Wa r in Ukraine, Global Conflict Tracker, CFR, April 24, 2024, https://www.cfr.org/global-conflict-tracker/conflict/conflict-ukraine (Accessed February 20, 2025).
[7] Message from Yevgeny Prigozhin, Telegram,https://t.me/concordgroup_official/1283; English translation available https://t.me/russiawire/3235
[8] Russian Offensive Campaign Assessment, February 6, Institute for the Study of War, 2025https://understandingwar.org/backgrounder/russian-offensive-campaign-assessment-february-6-2025 (Accessed 18 February 2025).
[9] Ukraine’s Kursk Offensive: Symbolic Gains, Strategic Costs? Geopolitical Monitor, https://www.geopoliticalmonitor.com/ukraines-kursk-offensive-symbolic-gains-strategic-costs/January 13, 2025 (Accessed February 20, 2025).
[10] Russian Offensive Campaign Assessment, Institute for the Study of War, February 62025https://understandingwar.org/backgrounder/russian-offensive-campaign-assessment-february-6-2025 (Accessed 18 February 2025).
[11]Ukraine presses on in Kursk; Denmark warns Russia could wage war in Europe, February 13, 2025, https://www.aljazeera.com/news/2025/2/13/ukraine-resumes-the-offensive-in-kursk (Accessed February 20, 2025).
[12] Russia launches war’s largest drone attack on Ukraine, Kyiv says, Indian Express, February 24, 2025, https://indianexpress.com/article/world/russia-launch-wars-largest-drone-attack-ukraine-9852064/Accessed February 24, 2025).
[13] How Russia-Ukraine Conflict Changed the Nature of Warfare, The Geostrata, February 24, 2023, https://www.thegeostrata.com/post/how-the-russia-ukraine-conflict-is-changing-the-nature-of-warfare, (Accessed February 24, 2025).
[14] Antonio Troianovski, Adam Entous and Michel Schwirtz. “Ukraine Russia Peace is Elusive as ever. But in 2022 they were talking,” The New York Times, June 14, 2024, https://www.nytimes.com/interactive/2024/06/15/world/europe/ukraine-russia-ceasefire-deal.html (Accessed September 05,2024).
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[17] Aljazeera. “All you need to know about China’s plan for Russia-Ukraine talks,” Aljazeera, February 24, 2023, https://www.aljazeera.com/news/2023/2/24/all-you-need-to-know-about-chinas-plan-for-russia-ukraine-war (Accessed September 5, 2024).
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[22] Samir Bhattacharya. “Evaluating the African Peace Mission to Ukraine and Russia: What did it achieve,” Vivekananda International Foundation, July 10, 2023, https://www.vifindia.org/article/2023/july/10/evaluating-the-african-peace-mission-to-ukraine-and-russia-what-did-it-achieve (Accessed September 05, 2024).
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[24] Agreement on measures to ensure the security of The Russian Federation and member States of the North Atlantic Treaty Organization, MFA Russia, https://mid.ru/ru/foreign_policy/ rso/nato/ 1790803/?lang= en &clear_cache=Y (Accessed March 3 2025).
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[26] Swaran Singh, “Ukraine Crisis and US Indo Pacific Strategy” in Ukraine Crisis: A Point of Inflection for the Emerging World Order, Special Publication, Indian Council of World Affairs, 2022 (Accessed 3 March 2025)
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