सारांश: देश के भीतर जारी विवादों/ विरोधों के बीच हाल ही में किए गए युद्धविराम समझौतों के रुझानों से स्पष्ट है कि विवादों को सुलझाने की बजाय उसे नियंत्रित करने के लिए युद्धविराम का प्रयोग किया जा रहा है। वर्तमान समय में ये उपाय थोड़े समय के लिए हिंसा को कम कर सकते हैं लेकिन अक्सर स्थायी राजनीतिक परिणाम देने में असफल रहते हैं। यह विफलता इसलिए होती है क्योंकि इन पर ऐसे संदर्भों में बातचीत की जाती और लागू किया जाता है जिसमें सत्ता खंडित होती है, कोई केंद्रीय उत्तरदायित्व नहीं होता और अक्सर इन्हें बाहरी संरक्षकों का समर्थन प्राप्त होता है। इससे यह बात सामने आती है कि युद्ध–विराम की प्रभावशीलता राजनीतिक इच्छाशक्ति, विश्वसनीय प्रवर्तन और पूरक राजनीतिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है। इसी संदर्भ में, यह विशेष रिपोर्ट यमन, लीबिया और सूडान में जारी आंतरिक विवादों का विश्लेषण करते हुए युद्धविराम की बदलती भूमिका की पड़ताल करती है कि कैसे वे शांति– स्थापना व्यवस्था से बदलकर भू–राजनीतिक लाभ उठाने के रणनीतिक हथियार बन गए हैं।
परिचय
युद्धों को समाप्त करने की व्यवस्था में युद्धविरामों का स्थान हमेशा से ही केंद्रीय रहा है। अंतरराष्ट्रीय और आंतरिक, दोनों ही प्रकार की शांति प्रक्रियाओं में ये एक महत्वपूर्ण तत्व होते हैं। परंपरागत रूप से युद्धविरामों को शत्रुता के अस्थायी विराम के रूप में देखा जाता है। इनका उद्देश्य संवाद की गुंजाइश बनाना, मानवीय मदद की पहुँच सुनिश्चित करना और किसी समाधान तक पहुँचने के लिए राजनीतिक समझौता करना होता है। अब तक, युद्धविराम को कूटनीति के अनिवार्य साधन के रूप में ही देखा जाता रहा है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और विवाद मध्यस्थता, दोनों ही क्षेत्रों में इन्हें सक्रिए युद्ध और राजनीतिक समाधान के बीच की संक्रमणकालीन व्यवस्था और सेतु के रूप में समझा जाता है। युद्धरत पक्षों के बीच हिंसा को कम करने और विश्वास को बनाए रखने में युद्धविराम महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।[1] आधुनिक समय में युद्धविरामों का प्रयोग मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने और राजनीतिक गुंजाइश बनाने की उनकी क्षमता को भी उजागर करता है।[2]
हालांकि, आधुनिक शांति–स्थापन प्रक्रिया में युद्ध–विरामों की भूमिका का विश्लेषण करते समय सशस्त्र संघर्षों के वैश्विक परिदृश्य में आए बड़े बदलाव पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। अब वैश्विक परिदृश्य पर अंतर–देशीय विवादों का ही वर्चस्व है। अंतर–देशीय विवाद मूल रूप से देश में होने वाले विवाद होते हैं जिनमें आमतौर पर कोई सशस्त्र समूह, खंडित सत्ता और किसी देश की कमज़ोर या विवादित संप्रभुता शामिल होती है।
इन परिस्थितियों में, युद्धविराम शांति– स्थापना की सीधी– सादी प्रक्रियाओं से विलग होते जा रहे हैं। युद्धविराम अक्सर ऐसी तकनीकी विराम बन कर रह जाते हैं जो किसी व्यापक समाधान की ओर सेतु का काम करने की बजाय हिंसा को नियंत्रित करने का काम करते हैं। यह परिवर्तन एक महत्वपूर्ण सवाल करता है– क्या युद्धविराम अभी भी अंतर–देशीय विवादों में समाधान के विश्वसनीय साधन हैं, या फिर उनकी भूमिका बदलकर युद्ध– प्रबंधन एवं रणनीतिक पुनर्समायोजन के राजनीतिक एवं रणनीतिक साधनों के रूप में हो गई है? [3]
यह शोधपत्र यमन, लीबिया और सूडान के मामलों का विश्लेषण करते हुए अंतरदेशीय विवादों में स्पष्ट नज़र आ रहे परिवर्तनों और युद्धविरामों के रूपांतरण की पड़ताल करता है। यह तर्क देता है कि ऐसी स्थितियों में युद्धविराम शांति स्थापना की व्यवस्था के रूप में कम और हितधारक पक्षों के रणनीतिक लाभ के लिए भू–राजनीतिक साधन के रूप में अधिक काम करते हैं। युद्धविराम विरोधी पक्षों को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने, संगठित होने, हथियार जुटाने और अपने गठबंधनों को नए सिरे से समायोजित करने का अवसर देते हैं। साथ ही वर्तमान शक्ति– संतुलन को भी बनाए रखते हैं। इस प्रकार, युद्धविराम विवाद के समाधान की बजाय, विवाद के प्रबंधन के साधन के रूप में काम करते हैं। इसके अलावा, यह शोध–पत्र लीबिया, यमन और सूडान जैसे देशों में लंबे समय से चले आ रहे विवादों को सुलझाने में युद्धविरामों की विश्वसनीयता को चुनौती देता है।
तनाव कम करने से गतिरोध तक: यमन का नियंत्रित युद्ध
यमन में जारी गृहयुद्ध 21वीं सदी की शुरुआत के सबसे बहुआयामी और लंबे समय तक चलने वाला राज्यांतर्गत विवादों में से एक है। यमन में यह विवाद मुख्य रूप से आंतरिक विद्रोह के रूप में शुरू हुआ था लेकिन धीरे– धीरे यह ऐसे उलझे हुए विवाद में बदल गया जो गहरी ऐतिहासिक दरारों, बड़े बाहरी हस्तक्षेपों और कमज़ोर केंद्रीय सत्ता के दबाव में आ गया। [4] इससे एक ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जिसमें युद्धविराम समझौतों पर बार–बार बातचीत तो हुई है लेकिन वे किसी राजनीतिक समाधान में तब्दील नहीं हो पाए हैं।
ऐसी स्थिति में, युद्धविरामों ने परस्पर विरोधी भूमिकाएं निभाई हैं। ये शांति– स्थापना के साधनों के रूप में कम और विवादित पक्षों को सांस लेने का अवसर देने वाले रणनीतिक विरामों के रूप में अधिक काम करते हैं।[5] इससे युद्ध में शामिल आंतरिक और बाहरी पक्षों को विवाद की राजनीतिक एवं सामाजिक कारणों को संबोधित किए बिना ही फिर से संगठित होने, अपनी रणनीति को समायोजित करने और यथास्थिति बनाए रखने का अवसर मिल जाता है।
यमन में विवाद की जड़ें कबीलाई, सांप्रदायिक और राज्य–स्तर पर बिखराव का मिला– जुला रूप है। यह जटिल समीकरण यमन में जारी मौजूदा गृहयुद्ध से कहीं पहले से मौजूद है। ऐतिहासिक रूप से, यमन के उत्तरी हिस्से पर ज़ायदी शिया संप्रदाय का वर्चस्व रहा है।[6] यमन की लगभग 40 प्रतिशत आबादी ज़ैदवाद को मानती है, जिन्हें फ़ाइवर्स के नाम से भी जाना जाता है। ज़ैदवाद शिया इस्लाम की एक शाखा का प्रतिनिधित्व करता है जो ईरान एवं दूसरे स्थानों पर प्रचलित 'ट्वेल्वर शिया इस्लाम' से अलग है।[7]
यमन में ज़ायदी इमामत 1962 की क्रांति के साथ खत्म हो गई, जिसके बाद यमन के उत्तरी इलाकों, विशेष रूप से सादा प्रांत को हाशिए पर धकेल दिया गया। इसीक से बाद में हूतियों का उदय हुआ जो बहुत हद तक ज़ायदी विचारधारा से जुड़े हैं और बीते दो दशकों से यमन की सुन्नी– बहुमत वाली सरकार से लड़ रहे हैं। हालाँकि वर्तमान गृह–युद्ध 2015 में शुरू हुआ था, लेकिन अंसार–अल्लाह ने सबसे पहले 2004 में सादा प्रांत में यमन सरकार के खिलाफ अपना सशस्त्र विद्रोह किया था, जिसका नेतृत्व हुसैन अल– हूती ने किया था।[8] हूती पहचान और राजनीतिक बहिष्कार की इस ऐतिहासिक परत– दर– परत प्रक्रिया ने यमन में विद्रोहों और शिकायतों के लिए नई ज़मीन तैयार की।[9]
हूती आंदोलन या अंसार अलाल (जिसका मतलब है ‘भगवान का दल’), 1990 के दशक में उत्तरी यमन में उभरा। इसकी शुरुआत राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेले जाने और आर्थिक उपेक्षा के प्रति असंतोष के कारण हुई थी लेकिन यह सऊदी अरब के बढ़ते वित्तीय और धार्मिक प्रभाव के प्रति प्रतिक्रिया भी थी।[10] 1980 और 1990 के दशक के दौरान सऊदी अरब ने यमन पर अपनी ‘विशेष समिति’ के माध्यम से कबाइली नेताओं को वित्तीय संरक्षण प्रदान करके यमन की कबाइली नेटवर्कों में भारी निवेश किया।[11
वर्ष 1994 में, दक्षिणी अलगाववादी आंदोलन और उत्तर में गणराज्य की सरकार के बीच चले अलगाववादी विवादों के दौरान, रियाद ने युद्ध के समय दक्षिणी सरकार को गोला–बारूद देकर समर्थन दिया और शत्रुता समाप्त होने के बाद उत्तर में दी जाने वाली मदद बढ़ा दी। इसने उत्तरी यमन के उन क्षेत्रों में भी सलाफ़ी धार्मिक स्कूलों का समर्थन किया जहाँ परंपरागत रूप से ज़ायदी बहुसंख्यक थे।[12] हूतियों का एक स्थानीय प्रतिरोध आंदोलन उग्र सशस्त्र समूह में बदलना, 2000 के दशक में यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार (IRG) के साथ समय–समय पर होने वाले विवादों के इतिहास का परिणाम था। ये विवाद 2011 की यमनी क्रांति के बाद और बढ़ गए जिसके बाद 2012 में गृहयुद्ध छिड़ गया। इससे केंद्रीय सत्ता और भी कमज़ोर हो गई जिससे इस विवाद का समाधान निकालना और अधिक मुश्किल हो गया है।

स्रोत: सना सामरिक अध्ययन केंद्र
यमन में राजनीतिक बिखराव तब और मज़बूत हो गया जब क्रांति के बाद बनी शासन व्यवस्थाएं कबीलाई नेटवर्क, दक्षिण अलगाववादी आंदोलनों और AQAP और ISIS जैसे दूसरे इस्लामी गुटों की आपसी विरोधी मांगों को समायोजित करने में नाकाम रहीं।[11] इस बात को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि यमन में कबीलाई प्रतिद्वंद्विताएं अक्सर सांप्रदायिक और बाहरी हस्तक्षेप के कारण दब जाती हैं, हालाँकि, कबीलाई भावना ने यमन में संकट को बहुत हद तक भड़काया है। इस विवाद को सऊदी अरब और ईरान के बीच प्रॉक्सी युद्ध यानी अप्रत्यक्ष युद्ध के रूप में देखने पर जो गलत ज़ोर दिया जाता है वह विवाद के मूल कारणों के अध्ययन में रुकावट डालता है जिससे अंततः इसका समाधान रुक जाता है और मानवीय संकट और लंबा खिंच जाता है।[12]
बाहरी हस्तक्षेप और अप्रत्यक्ष समीकरण
जहाँ एक ओर यमन के भीतर के गुटों ने इसे कमज़ोर बना दिया है वहीं दूसरी ओर बाहरी दखलअंदाज़ी ने भी इस पहले से ही बिखरे हुए विवाद को और तेज़ कर दिया है– विशेष रूप से 2014 में जब हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना पर कब्ज़ा कर लिया था। उनके सत्ता संभालने के कुछ ही समय बाद, सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने जिसे संयुक्त अरब अमीरात और दूसरी पश्चिमी शक्तियों, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंग्डम, फ्रांस और कनाडा शामिल थे, का समर्थन प्राप्त था, अब्द– रब्बुह मंसूर हादी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को बहाल करने का प्रयास किया।[13]
मार्च 2015 में, सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के खिलाफ हवाई हमले शुरू किए और नौसैनिक नाकेबंदी लगा दी, जबकि इस दौरान उन्होंने आम नागरिकों को अंधाधुंध तरीके से मारा। वर्ष 2015 के शुरुआती सैन्य हस्तक्षेप में पश्चिमी शक्तियाँ सीधे तौर पर शामिल नहीं थी, लेकिन उन्होंने सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन को लॉजिस्टिक, हथियार और खुफिया जानकारी के रूप में सहायता प्रदान की, जिसका उद्देश्य हादी को सत्ता में वापस लाना था। इस हस्तक्षेप ने युद्ध को एक व्यापक शिया– सुन्नी भू–राजनीतिक विवाद के रूप में प्रस्तुत किया जिसमें कथित रूप से हूतियों को ईरान से राजनीतिक और सैन्य समर्थन प्राप्त हुआ था। दूसरी ओर, सऊदी के नेतृत्व वाले गुट ने अपनी दक्षिणी सीमा पर ईरान के संभावित प्रभाव का मुकाबला करने का प्रयास किया।[14]
इसके परिणामस्वरूप, पहले से ही बंटी हुई गृह–कलह में अप्रत्यक्ष युद्ध की स्थिति बन गई है, जिससे बातचीत और युद्धविराम, दोनों ही प्रयास और अधिक जटिल हो गए हैं। बाहरी पक्षों के पास विवाद को सुलझाए बिना दबाव बनाए रखने के लिए रणनीतिक मकसद होते हैं। एक ठोस केंद्रीय सत्ता की गैर–मौजूदगी बाहरी दखल की अहमियत को बढ़ा देती है।[15] हूती यमन में अपना प्रभाव बनाए रखते हैं और ईरान एवं उसके अप्रत्यक्ष हिज़बुल्लाह से मिलने वाले बाहरी समर्थन का लाभ उठाकर स्वयं को हाशिए पर धकेले जाने का विरोध करते हैं।[16] दूसरी ओर, सऊदी अरब अपने सहयोगियों– संयुक्त अरब अमीरात और दूसरे पश्चिमी देशों के साथ मिलकर यमन में ईरानी प्रभाव को सीमित करने का प्रयास कर रहा है।
युद्धविराम और शांति के प्रयास
यमन में युद्धविराम के बार– बार विफल होने के कारण कोई स्थायी राजनीतिक परिणाम भी नहीं निकल पाया है। इसका मुख्य कारण देश के भीतर युद्ध की खंडित संरचना और किसी ऐसे एकल संप्रभु सत्ता का अभाव है जो समझौतों को लागू करने में सक्षम हो। दो देशों के बीच होने वाले युद्धों– जहां अक्सर युद्धविराम का नियमन सरकारी संस्थाओं और स्पष्ट रूप से परिभाषित कमान– श्रृंखलाओं के माध्यम से किया जाता, के विपरीत यमन में आंतरिक युद्धविराम ऐसे संदर्भ में संचालित होते हैं जहाँ सत्ता कई सशस्त्र गुटों के बीच बंटी हुई होती है। इनमें हूती, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यताप्राप्त सरकार, दक्षिणी अलगाववादी, कबाइली मिलिशिया और आतंकवादी समूह शामिल हैं। इस बिखराव के कारण यमन में युद्धविराम रुक– रुककर और असमान रूप से लागू हो पाए हैं। यह इस बात को दर्शाता है कि युद्धविराम की परिवर्तनकारी प्रकृति का राजनीतिक लाभ उठाने के लिए प्रयोग किया गया है।
यमन में तनाव कम करने का सबसे आम तरीका मानवीय युद्धविराम है। दुश्मनी में ये छोटे– छोटे विराम अक्सर संयुक्त राष्ट्र या अंतरराष्ट्रीय मानवीय संगठनों जैसे अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस समीति (ICRC) और यमन रेड क्रिसेंट सोसायटी (YRCS) द्वारा संभव बनाए जाते हैं। मानवीय विराम मूल रूप से उन गंभीर मानवीय परिस्थितियों में मदद पहुँचाने की अनुमति देने के लिए तैयार किए गए थे जहाँ इसकी सख्त ज़रूरत थी। हालाँकि, इस प्रकार के युद्धविरामों को सीमित मानवीय पहुँच सुनिश्चित करने में कुछ सीमा तक सफलता मिली, लेकिन वे युद्ध की दिशा बदलने और राजनीतिक प्रोत्साहन पैदा करने में विफल रहे।
यमन में मानवीय युद्धविराम बहुत हद तक राजनीतिक वार्ताओं से स्वतंत्र रूप से संचालित होते रहे हैं जिसके कारण जैसे ही तात्कालिक मानवीय उद्देश्य पूरे हो जाते हैं, हिंसा फिर से भड़क उठती है।[17] मानवीय विरामों को राजनीतिक समाधानों से अलग रखना, युद्धविरामों की उन संरचनात्मक कमियों को उजागर करता है जो शांति के लिए व्यापक तनाव– कम करने वाले ढांचे के बिना केवल अल्पकालिक राहत को प्राथमिकता देते हैं।
इन पैटर्नों को यमन में आए संकट के कालानुक्रमिक अध्ययन से और स्पष्ट किया गया है। वर्ष 1994 के गृह युद्ध के दौरान शुरुआती मध्यस्थता प्रयासों से लेकर-2015 के बाद तक, मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में की गई शांति पहलें, सत्ता के अंतर्निहित विवादों और शासन की कमियों को दूर करने में निरंतर विफल रही हैं।[18] वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुए राष्ट्रव्यापी युद्धविराम संधि ने 2015 में सऊदी– नेतृत्व वाले हस्तक्षेप की शुरुआत के बाद से हिंसा में सबसे बड़ी कमी दर्ज की।
इससे ईंधन के आयात में सहूलियत हुई और सना हवाई अड्डा फिर से खुल गया। फिर भी, यह युद्धविराम सत्ता के बँटवारे, क्षेत्रीय शासन और राष्ट्र के पुनर्निर्माण जैसे मुख्य राजनीतिक मुद्दों पर प्रगति करने से अधिक मददगार साबित नहीं हुआ।[19] युद्ध का जारी रहना इस बात को दर्शाता है कि युद्धविराम, समाधान के मार्ग बनाने की बजाय, किस हद तक केवल रणनीतिक विराम के रूप में ही काम कर पाए हैं।
यमन में कूटनीति बार– बार विफल रही है क्योंकि युद्धरत पक्षों के बीच राजनीतिक संवाद की जगह अब युद्धविराम वार्ता ने ले ली है। इससे वैधता, प्रतिनिधित्व और संप्रभुता से जुड़े मुद्दों की लगातार हो रही उपेक्षा की स्थिति और भी गंभीर हो गई है।[20] इसके अलावा, प्रतिस्पर्धी सत्ताओं के बीच के राजनीतिक विरोधाभासों को सुलझाने के बजाय बाहरी मध्यस्थता के प्रयास भी बहुत हद तक हिंसा को नियंत्रित करने पर ही केंद्रित हैं। फिर, सहायता कार्यों में असुरक्षा, पहुँच पर लगी पाबंदियों और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण बाधाएं भी बनी हुई हैं। इससे यमन में मानवीय संकट और भी गहरा गया है, क्योंकि आम नागरिकों को लगातार विस्थापन एवं अभाव का सामना करना पड़ रहा है।[21]
विखंडन को स्थिर बनाना: लीबिया की ठहरी हुई राजनीतिक व्यवस्था
लीबिया में जारी वर्तमान युद्ध की जड़ में सांप्रदायिक विभाजन और सरकारी संस्थाओं का सुनियोजित विघटन है। यह सब लीबिया की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित एवं विनियमित करने के लिए सत्ताधारी वर्ग के बीच जारी जबरदस्त होड़ का परिणाम है। हालाँकि लीबिया में इतावली औपनिवेशिक शासन का दौर छोटा रहा लेकिन यह जबरदस्ती शांति स्थापित करने और उमर अल– मुख्तार जैसे नेताओं के नेतृत्व में चल रहे प्रतिरोध आंदोलनों को कुचलने पर आधारित था, इस इतावली औपनिवेशिक शासन ने अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ी जिसमें राष्ट्र निर्माण के बिना ही सेना का वर्चस्व स्थापित हो गया।[22] लीबिया को 1947 में आज़ादी मिल गयी थी लेकिन वह 1951 में जाकर आज़ाद मुल्क बन पाया था। हालाँकि, आज़ाद मुल्क बन जाने के बाद भी मुल्क की संस्थाओं की कमियां दूर नहीं हुई, उलटे, लीबिया किराए पर गुज़ारा करने वाला एक ऐसा देश बना रहा जिसमें राजनीतिक भागीदारी बहुत कम थी और क्षेत्रीय असंतुलन बहुत अधिक।
आज़ादी के बाद से लीबिया का सफ़र लचीले राजनीतिक संस्थानों की कमी और पहचान के सैन्यीकरण के लगातार बने रहने से तय हुआ है। आज़ादी के बाद शासन व्यवस्था राजशाही और तानाशाही शासन के बीच डगमगाती रही। मुअम्मर गद्दाफ़ी के शासन के चार दशकों के दौरान जान– बूझकर औपचारिक सरकारी संस्थाओं को समाप्त कर दिया गया और उनकी जगह निजी नेटवर्क, नियंत्रण के अनौपचारिक तरीकों और क्रांतिकारी समितियों को बढ़ावा दिया गया। संस्थागत सत्ता के इस सुनियोजित क्षरण के कारण लीबिया में कुछ क्षेत्र राजनीतिक रूप से हाशिए पर चले गए और हितों एवं पहचान से संबंधित मामलों पर शांतिपूर्ण संवाद के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं का अभाव हो गया।[23]
स्रोत: बीबीसी
साल 2011 के व्यापक जन–आंदोलनों की वजह से गद्दाफ़ी की सरकार गिर तो गई लेकिन कोई एक समान राजनीतिक बदलाव की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई। इसकी बजाय, व्यवस्थित राजनीतिक प्रक्रिया की कमी और हथियारबंद गुटों के तेज़ी से बढ़ने की वजह से लीबिया गृह– युद्ध की चपेट में आ गया। सशस्त्र समूहों ने स्वयं को स्थानीय, क्षेत्रीय और वैचारिक पहचानों से जोड़ लिया। इसके अलावा, 2014 तक, प्रतिस्पर्धी सरकारें और सैन्य गठबंधन– जिनमें से प्रत्येक के अपने– अपने मिलिशिया समर्थक थे– त्रिपोली, बेंगाज़ी और सिरते जैसी दूसरे रणनीतिक क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए आपस में लड़ने लगे।[24]
इससे लीबिया में बहुत ही बिखरी हुई राजनीतिक व्यवस्था बन गई। लीबिया पर अभी दो विरोधी सरकारों और देश के कुछ हिस्सों में सक्रिए मिलिशिया का नियंत्रण है। उत्तरी हिस्से पर जनरल हफ़्तार की लीबिया नेशनल आर्मी (LNA) का नियंत्रण है जबकि दक्षिणी हिस्से पर, हालांकि, संयुक्त राष्ट्र समर्थित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त त्रिपोली स्थित गवर्नमेंट ऑफ नेशनल यूनिटी(GNU) का नियंत्रण है। दक्षिण के कुछ हिस्से मिलिशिया समूहों के नियंत्रण में हैं।
लीबिया में युद्धविराम का तर्क
देश के भीतर होने वाले विवादों में– जैसा कि लीबिया के संदर्भ में देखा गया है जहाँ संप्रभुता बिखरी हुई होती है और संस्थागत सत्ता पर नियंत्रण के लिए होने वाली होड़ के कारण उसकी शक्ति सीमित हो जाती है, वहाँ युद्धविराम अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं। जैसे, लीबिया में युद्धविराम ने विवाद–समाधान के साधनों के रूप में कम बल्कि सत्ता और वैधता के लिए अभिजात वर्ग के बीच होने वाले सौदों को औपचारिक रूप देने के माध्यम के रूप में अधिक काम किया है। इसने संघर्षरत पक्षों के बीच सैन्य संतुलन में होने वाले बदलावों को रोकने में भी योगदान दिया है।
अक्टूबर 2020 संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में औपचारिक रूप से लागू की गई सबसे उल्लेखनीय युद्धविराम संधियों में से एक ने दो सबसे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गुटों– त्रिपोली के संयुक्त– राष्ट्र मान्यता प्राप्त जीएनयू और खलीफ़ा हफ़्तार से जुडे एलएनए के बीच शहरी युद्ध की तीव्रता को अस्थायी रूप से कम कर दिया। हालाँकि, युद्धविराम अंतर्निहित मिलिशिया संरचना को समाप्त करने और लीबिया की सुरक्षा व्यवस्था को एकीकृत करने में विफल रहा।[25]
युद्धविराम, जिसके परिणामस्वरूप सेनाओं की वापसी या एकीकृत शासन व्यवस्था स्थापित होनी चाहिए थी, उसके बजाय उसने क्षेत्रीय नियंत्रण रेखाओं को ही स्थिर कर दिया और सशस्त्र गुटों को राजनीतिक हितधारक के रूप में अपनी स्थिति और मज़बूत करने का अवसर दे दिया। जो मिलिशिया समूह कभी बदलते गठबंधनों के रूप में काम करते थे। इस प्रकार, युद्धविराम ने राजनीतिक सत्ता के सुदृढ़ीकरण और मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को बनाए रखने के लिए व्यवस्था के रूप में काम किया। इसने सशस्त्र समूहों को संस्थागत सुधारों या राष्ट्रीय सुलह के प्रति प्रतिबद्ध हुए बिना ही अपने प्रभाव को लेकर संवाद करने में सक्षम बनाया।[26]
इसके अलावा, आपस में लड़ रहे गुटों के बीच एकीकृत कमान व्यवस्था की कमी ने इस स्थिति को और मज़बूत किया है। एक तरफ GNU का अधिकार विभिन्न सशस्त्र समूहों के गठबंधन समर्थन पर निर्भर करता है वहीं दूसरी तरफ LNA समय– समय पर सत्ता में होने वाले परिवर्तनों के बावजूद, अपने कमांडरों और क्षेत्रीय सहयोगियों के नेटवर्क के माध्यम से अपना प्रभाव बनाए रखता है। LNA को उन अंतरराष्ट्रीय पक्षों का समर्थन प्राप्त है जिन्होंने सत्ता की इन वितरण– संबंधी संरचनाओं को संबोधित किए बिना ही युद्धविराम को औपचारिक रूप देकर, इस विवाद को सुलझाने के बजाय परोध रूप से स्थिर कर दिया है।
3 फऱवरी 2026 को मुअम्मर गद्दाफ़ी के बेटे सैफ़ अल– इस्लाम की हालिया हत्या, आज के समय में भी लीबिया में राजनीतिक संवेदनशीलता की तीव्रता को दर्शाती है।[27] सैफ़ अल– इस्लाम की हत्या एक राजनीतिक युग के अंत का संकेत है जिसके परिणाम अभिजात वर्ग की राजनीति और युद्ध प्रबंधन के भविष्य, दोनों के लिए होंगे। यह लीबिया में एक ऐसे युग के अंत का प्रतीक है जहाँ गद्दाफ़ी शासन के नेटवर्क के बचे– खुचे हिस्सों को राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने के लिए पूरी तरह से लामबंद किया जा सकता था।[28] हालाँकि, गद्दाफ़ी के बेटे की मौत ने नई राष्ट्रीय सहमति बनाने की बजाय गुटों के बीच मतभेदों को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। विभिन्न सशस्त्र कमांडर और क्षेत्रीय शक्तियां इस प्रतीकात्मक और रणनीतिक खालीपन को भरने का प्रयास कर रही हैं।
लीबिया का मामला यह दिखाता है कि देशों के भीतर होने वाले विवादों में– जिनकी पहचान किसी वैध संप्रभु सत्ता की अनुपस्थिति और शासन के दावों को लेकर तीव्र प्रतिस्पर्धा से होती है– युद्धविराम, विवाद के समाधान का माध्यम बनने के बजाय यथास्थिति बनाए रखने का एक ज़रिया बन सकता है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय कर्ताओं ने अक्सर बदलाव की बजाय स्थिरता को प्राथमिकता दी है। ऐसा उन्होंने उन पहलों से दूर रहने के बजाय, जो सत्ता में मज़बूती से जमे लोगों को चुनौती दे सकती थीं, केवल तनाव कम करने वाली अस्थायी व्यवस्थाओं का समर्थन करके किया है। यह देशों के भीतर होने वाले विवादों में समकालीन कूटनीतिक जुड़ाव की प्रकृति को भी दर्शाता है जो अक्सर बदलाव के बजाय शांति स्थापित करने पर ज़ोर देता है। लीबिया का अनुभव यमन के मामले में अध्ययन किए गए युद्धविराम की असफलता के समान ही पैटर्न को पुष्ट करता है, यह इस बात को स्पष्ट करता है कि युद्धविराम को किस प्रकार से फिर से बनाया जाए, लागू किया जाए और राजनीतिक बदलाव के साथ जोड़ा जाए, इस विषय पर पुनर्विचार करने की कितनी आवश्यकता है।
अंतहीन हिंसा: सूडान में गृहयुद्ध का प्रबंधन
स्रोत: मध्य– पूर्वी अध्ययन केंद्र
सूडान में जारी वर्तमान युद्ध की जड़े सैन्य शासन के लंबे इतिहास, हाशिए पर पड़े समूहों की उपेक्षा और सशक्त नागरिक सत्ता स्थापित करने की बार– बार की असफलताओं में निहित हैं। सूडान को 1956 में आज़ादी मिली थी। तब से लेकर अब तक, यहाँ सत्ता कभी सैन्य शासकों के हाथों में रहती है तो कभी कमज़ोर नागर सरकारों के हाथों में। सूडान में, सशस्त्र बलों को तटस्थ सरकारी संस्थाओं के रूप में नहीं बल्कि ऐसे राजनीतिक कर्ताओं के रूप में देखा जाता है जो आर्थिक और वैचारिक व्यवस्थाओं में गहरा पैठ रखते हैं।
दक्षिण में लगातार जारी गृहयुद्ध, 2011 में दारफ़ुर में हुआ युद्ध और दक्षिण कोर्डोफ़ान एवं नीली नील नदी (ब्लू नाइल) को लेकर चल रहा विवाद एक ऐसा पैटर्न दर्शाते हैं जिसमें हिंसा शासन का नियमित ज़रिया बन गई है। वर्ष 2023 से अब तक लगभग 400,000 लोग मारे जा चुके हैं, 1 करोड़ 10 लाख (11 मिलियन) लोग विस्थापित हुए हैं और 3 करोड़ (30 मिलियन) लोगों को मानवीय सहायता की आवश्यकता है।[29] वर्ष 2019 में उमर अल– ब़शीर को सत्ता से हटाए जाने से लोकतांत्रिक परिवर्तन की उम्मीद पैदा हुई थी लेकिन सेना और नागरिकों की संयुक्त साझेदारी में चल रही परिवर्तन की प्रक्रिया, देश पर सेना के वर्चस्व को समाप्त करने में नाकाम रही। इसकी बजाय, सत्ता आपस में टकराने वाले गुटों– विशेष रूप से सूडानी सशस्त्र बल (SAF) और रैपिड सपोर्ट फोर्सेस (RSF) के हाथों में सिमट कर रह गई।
संसाधनों, सत्ता और वैधता को लेकर SAF और RSF के बीच की होड़ ने नए सिरे से युद्ध शुरू होने का आधार दे दिया।[30] इसके अलावा, सत्ता के किसी एक नागर केंद्र के अभाव का अर्थ था कि यह परिवर्तन शुरू से ही सैन्य हस्तक्षेप के प्रति संवदेनशील बना रहा। हालाँकि, इस युद्ध की जड़े कहीं अधिक गहरी हैं जो जातीय विभाजन, कबाइली सैन्यीकरण और डिंग्का एवं नुएर जैसे दक्षिणी सूडानी समुदायों के दशकों से हाशिए पर रखे जाने में निहित हैं।[31]
सूडान में युद्धविराम की प्रकृति
सूडान में युद्धविराम का स्वरूप दिखावटी, बार– बार होने वाला और अस्थायी रहा है। सूडान में युद्धविराम मुख्य रूप से हिंसा को रोकने वाले व्यावहारिक तंत्रों की बजाय, सद्भावना के कूटनीतिक प्रदर्शन के रूप में काम करते हैं। हालाँकि अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मध्यस्थ बार– बार युद्धविराम की घोषणा करते हैं लेकिन हम उन्हें ज़मीनी स्तर पर वास्तव में लागू होते हुए बहुत कम ही देखते हैं। जैसे, 15 अप्रैल 2023 को SAF और RSF के बीच गृहयुद्ध छिड़ने के बाद से कई बार युद्ध– विराम किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कोई भी युद्धविराम एक दिन से अधिक नहीं चल सका। युद्धविराम के तुरंत बाद ही इसके उल्लंघन के मामले देखे गए क्योंकि SAF और RSF दोनों ही जारी वार्ताओं के दौरान हवाई हमले, तोप से हमले और ज़मीनी हमले जारी रखे हुए हैं।[32] इनमें से अधिकांश युद्धविराम अमेरिका, सऊदी अरब, अफ़्रीकी संघ (AU) और अंतरसरकारी विकास प्राधिकरण (IGAD– Intergovernmental Authority on Development) द्वारा करवाए गए थे।[33]
सूडान में युद्धविराम वैधता और नियंत्रण का दावा करने के साधन के रूप में काम करते हैं जिसमें सशस्त्र समूह राजनीतिक रूप से उत्तरदायी होने का दिखावा करते हैं जबकि वे सैन्य अभियानों में लगे रहते हैं। RSF और SAF दोनों ने युद्धविराम समझौतों का लाभ उठाकर अपनी सैन्य टुकड़ियों को फिर से तैनात किया है, आपूर्ति मार्गों को सुरक्षित किया है और अपने क्षेत्रीय नियंत्रण को मज़बूत किया है, विशेष रूप से ख़ार्तूम और दारफ़ुर में। सूडान में जारी इस युद्ध को आंतरिक विभाजन एवं बाहरी हस्तक्षेप, दोनों ने ही प्रभावित किया है। बाहरी पक्षों द्वारा किए जाने वाले मध्यस्थता के प्रयास, अक्सर जवाबदेही या समझौतों के प्रवर्तन की तुलना में संवाद और बातचीत तक पहुँच को अधिक प्राथमिकता देते हैं।[34] आपसी युद्ध में शामिल पक्ष युद्धविराम समझौतों से मिली मोहलत का इस्तेमाल अपनी रणनीति को फिर से बनाने और एक– दूसरे के खिलाफ अपने सैन्य अभियान चलाने के लिए करते हैं। इस संदर्भ में, युद्धविराम अंतरराष्ट्रीय पक्षों को समाधान प्रक्रिया में शामिल रहने का एक ऐसा ज़रिया देता है जिसके माध्यम से उन्हें इस गहरी सच्चाई का सामना नहीं करना पड़ता कि न तो RSF न ही SAF अपनी ज़बरदस्ती करने के अधिकार को छोड़ने को तैयार है।
इसके अलावा, नागरिक पक्षों को हाशिए पर धकेलने से मध्यस्थता के प्रयासों की लगातार विफलता की समस्या और भी गंभीर हो गई है। सूडान में युद्धविराम की वार्ताओं से लोकतंत्र– समर्थक समूहों को बड़े पैमाने पर बाहर रका गया है। इसके उलट, इसने एक ऐसे सैन्य– प्रदान वार्ता संरचना को और मज़बूत किया है जो केवल सशस्त्र पक्षों को ही एकमात्र वैध हितधारक मानता है।[35] इसे चुनौती देने के बजाय, युद्धविराम उन्हीं सत्ता–संरचना को फिर से दोहरा रहे हैं जिन्होंने मूल रूप से इस युद्ध को जन्म दिया था।
मानवीय सुरक्षा के बिना युद्धविराम
युद्धविराम को अक्सर मानवीय आधार पर उचित ठहराया जाता है लेकिन सूडान में नागरिकों की सुरक्षा पर इसका प्रभाव बहुत सीमित रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने बार– बार चेतावनी दी है कि युद्धविराम के विफल होने से खाद्य असुरक्षा, विस्थापन और नागरिकों की मौतें बढ़ी हैं।[36] विशेष रूप से दारफ़ुर उन क्षेत्रों में से एक रहा है जो सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ है क्योंकि युद्धविराम होने के बाद भी वहाँ जातीय हिंसा और व्यापक पैमाने पर अत्याचार जारी रहे हैं।
यमन के विपरीत, यहाँ युद्धविराम कम–से–कम मानवीय राहत तो पहुँचा पाते हैं, सूडान में शायह ही कभी कोई अस्थायी मानवीय राहत मिल पाती है। इसका मुख्य कारण है युद्धविराम को लागू करने वाली व्यवस्थाओं को अभाव और नागरिक अवसंरचनाओं को जान– बूझकर निशाना बनाना। इसलिए, युद्धविराम शांति– स्थापना के वास्तविक व्यावहारिक साधनों की बजाय, शांति दृष्टिकोण के प्रसार के लिए अलंकारिक युक्ति के रूप में अधिक काम करते हैं।[37]
लगातार टूटते रहने के बावजूद, सूडान में युद्धविराम जारी रहते हैं। यह इस शोधपत्र के मुख्य तर्क को रेखांकित करता है: कि युद्धविराम समझौते, युद्ध की स्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहते हैं, इसलिए नहीं कि वे प्रभावी होते हैं बल्कि इसलिए कि वे राजनीतिक रूप से उपयोगी होते हैं। एक ओर, ये समझौते अंतरराष्ट्रीय पक्षों को शांति प्रक्रिया में अपनी भागीदारी का दावा करने का अवसर देते हैं तो दूसरी ओर क्षेत्रीय शक्तियाँ इनके माध्यम से अपने हितों को सुरक्षित रखती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह घरेलू सशस्त्र समूहों को शक्ति की स्थिति से बातचीत करने का मार्ग प्रदान करता है। इस मामले में, युद्धविराम संयोगवश विफल नहीं होते बल्कि वे संरचनात्मक रूप से विफल होते हैं।[38] इसका कारण यह है कि वे शांति के लिए किसी विश्वसनीय राजनीतिक रूपरेखा में कभी भी शामिल नहीं होते। इसके अलावा, किसी एक वैध संप्रभु सत्ता द्वारा प्रवर्तन की कमी भी इस संकट को और बढ़ाती है।
देश के भीतर के विवादों में युद्धविराम– केंद्रित युद्ध प्रबंधन की सीमाओं को समझने के लिए सूडान महत्वपूर्ण उदाहरण बन जाता है। समय– समय पर युद्धविराम की घोषणाएं और उनकी लगातार विफलताएँ न केवल वास्तविक राजनयिक प्रयासों की कमी को उजागर करती हैं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव को भी दर्शाती हैं। नागरिक सत्ता और राष्ट्र की संप्रभुता के बुनियादी सवाल को सुलझाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है। सूडान का मामला यह दर्शाता है कि ऐसे हालात में युद्धविराम शांति के साधन के रूप में कम बल्कि जवाबदेही को टालने, लंबे समय से चली आ रही अस्थिरता को सामान्य बनाने और सैन्यीकरण को और लंबा खींचने की व्यवस्था के रूप में अधिक काम करते हैं।
देश के भीतर होने वाले विवादों में समकालीन युद्धविरामों की विशेषताएं
यमन, लीबिया और सूडान के संदर्भ में युद्धविरामों का प्रयोग यह दर्शाता है कि समकालीन आंतरिक– देशीय विवादों में युद्ध– विराम अब शांति के लिए संक्रमणकालीन व्यवस्था के रूप में काम नहीं करते हैं। इसकी बजाय, इनका उपयोग सामरिक उद्देश्यों, राजनीतिक सौदेबाज़ी, हिंसा के प्रबंधन, मानवीय पहुँच और अंतरराष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय मध्यस्थता के साधनों के रूप में किया जाता है। मूल राजनीतिक विवादों को सुलझाए बिना शत्रुता में की गई अस्थायी कमी– यानी युद्धविराम– क्षेत्रीय नियंत्रण को मज़बूत कर सकता है और संबंधित पक्षों को सैन्य एवं राजनीतिक रूप से पुनर्संगठित होने का अवसर प्रदान कर सकता है।
इसके परिणामस्वरूप, युद्ध और क्षेत्रीय नियंत्रण की स्थिति गतिहीन हो जाती है और शांति प्रक्रिया लंबा खिंच जाती है। यह उन अंतर्निहित सत्ता संरचनाओं को बनाए रखने में भी योगदान देता है जो मूल रूप से इन युद्धों को जन्म देती हैं। यह पैटर्न इस बात में एक व्यापक परिवर्तन को दर्शाता है कि युद्ध– विरामों का अभ्यास किस प्रकार किया जाता है। हाल में किए गए शोधों से पता चलता है कि युद्ध– विराम अब राजनीतिक समाधान के लिए परिवर्तनकारी संरचना और संप्रभुता एवं संबंधित संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण की बजाय शत्रुता की अल्पकालिक समाप्ति, कूटनीतिक संकेत और बाहरी हितधारकों के बीच समन्वय को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।[39]
यमन, लीबिया और सूडान में, युद्धविराम मुख्य रूप से इसलिए असफल नहीं हुआ कि देश और गैर– देशीय पक्षों ने इसका पालन कम किया बल्कि इसलिए कि वे एक ऐसे राजनीतिक संरचना में फँसे हुए हैं जो विखंडन, सैन्य– सत्ता और अभिजात वर्ग की सौदेबाज़ी को बढ़ावा देता है। नतीजतन, युद्धविराम एक ऐसी निरंतर प्रक्रिया बन जाता है जो अस्थायी राजनीतिक समाधानों के माध्यम से शांति स्थापित करने की बजाय अस्थिरता को बनाए रखता है और उसे पुनरुत्पादित करता है।
ये तीनों मामले यह दर्शाते हैं कि युद्धविराम तीन परस्परव्यापी काम करते हैं। पहला, हिंसा को नियंत्रित करना; दूसरा, सत्ता को अभिजात वर्ग और मिलिशिया के हाथों में मज़बूत करना और बनाए रखना; तीसरा और आखिरी, समझौतों के दोषपूर्ण स्वरूप के कारण पक्षों के बीच अविश्वास को बढ़ावा देना। ये काम इस तथ्य के अनुरूप हैं कि देश में होने वाले विवादों और विरोधों में, विशेषरूप से जहाँ कोई एक संप्रभु सत्ता न हो, युद्धविराम अक्सर सामरिक नज़रिए से तो सफल रहते हैं, किंतु रणनीतिक दृष्टिकोण से विफल हो जाते हैं।[40]
सबसे पहले, युद्ध विराम देश के भीतर जारी विवादों/विरोधों को समाप्त करने की बजाय उसे नियंत्रित करते हैं। वे सशस्त्र समूहों की सैन्य क्षमताओं को नष्ट किए बिना युद्ध की गति, भौगोलिक स्थिति और दृश्यता को विनियमित करते हैं। युद्धविरामों का उपयोग तेज़ी से “शांति के बिना विराम” के रूप में किए जा रहे हैं जो सशस्त्र समूहों को पुनर्गठित होने में मदद करता है। हालांकि, यह अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के साथ तनाव में संयम का संकेत देता है,[41] जिससे यह युद्ध में दिलचस्पी रखने वाले पक्षों के लिए रणनीतिक साधन के रूप में काम करता है। यमन में युद्धविराम, लीबिया में क्षेत्रीय यथास्थिति बनाए रखना और सूडान में युद्धविराम का बार– बार उल्लंघन, ये सभी रणनीतिक लाभ के लिए अस्थिरता को नियंत्रित करने के तर्क पर पूरी तरह से खरे उतरते हैं।
दूसरी बात, युद्धविराम सत्ता को बनाए रखने में मदद करते हैं, विशेष रूप से ऐसे हालात में जहाँ कोई भी पक्ष या किरदार दूसरे पर पूरी तरह से जीत का दावा नहीं कर सकता। युद्धविराम, समझौते का रास्ता आसान बनाने की बजाय, युद्ध को रोककर वर्तमान असमानताओं को और बढ़ावा देते हैं। यह समानांतर सत्ताओं को संस्थागत रूप देता है और सैन्य शासित शासन को सामान्य बनाता है। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि जब युद्घविराम आपसी थकावट की बजाय गतिरोध से पैदा होते हैं तो वे सबसे अधिक नाज़ुक और राजनीतिक रूप से उपयोगी साधन होते हैं।[42]
इसके अलावा, विशेषज्ञों के अनुसार, किसी देश में होने वाले विवादों में किए गए दिखावटी युद्धविराम समझौते, युद्धरत पक्षों के बीच अविश्वास पैदा करते हैं। दिखावटी समझौते मुख्य रूप से ऐसे समझौते होते हैं जिनमें एक या अधिक पक्ष अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण तो सहमत हो जाते हैं लेकिन उनका उस समझौते का पालन करने का कोई इरादा नहीं होता। युद्धविराम समझौते की स्थिरता बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि युद्धरत पक्ष उसे कितना अपनाते हैं। यह एक छलावा– भरी शांति का रूप ले सकता है, जब यह किसी गृहयुद्ध में शामिल पक्षों को ऐसे शांति समझौतों पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश करता है, जिनका पालन करने का उनका कोई इरादा नहीं होता। इससे पक्षों के बीच एक– दूसरे के प्रति विश्वास की कमी पैदा हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप फिर से युद्धविराम का उल्लंघन होता है।[43]
स्रोत: लेखन ने Napkin AI का प्रयोग कर यह तस्वीर बनाई है
हालाँकि, यमन, लीबिया और सूडान का ऐतिहासिक और युद्ध का सफ़र अलग– अलग रहा है फिर भी वे युद्धविराम के साझा ढांचागत तर्क के इर्द– गिर्द एक– दूसरे से जुड़ते हैं। यह जुड़ाव इस तर्क को मज़बूती देता है कि युद्धविराम की असफलताओं को केवल उनके लागू होने में आई रुकावटों के तौर पर ही नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें उसी मूल युद्धविराम व्यवस्था के अलग– अलग रूपों के तौर पर भी समझा जाना चाहिए। एक ऐसी व्यवस्था जो युद्ध को सुलझाने की बजाय, अव्यवस्था को संभालने पर अधिक ज़ोर देती है। हालाँकि, युद्ध से जूझ रहे देशों में युद्धविराम ने ज़बरदस्त सफलता भी हासिल की है।
जैसे, डेटन समझौते ने नवंबर 1995 में सर्बिया और बोस्निया और हर्ज़ेगोविना के बीच युद्ध को असरदार तरीके से समाप्त कर दिया। इसी तरह, 1998 का गुड फ्राइडे समझौता, जिस पर ब्रिटिश और आयरिश सरकारों के साथ– साथ उत्तरी आयरलैंड की कई पार्टियों ने भी हस्ताक्षर किए थे, भी एक उल्लेखनीय उदाहरण है। इस समझौते के तहत संघवादियों और राष्ट्रवादी पार्टियों के बीच सत्ता– साझेदारी की व्यवस्थाएं स्थापित की गईं।[44] बहरहाल, इन समझौतों की सफलता के पीछे के कारणों पर विचार करना महत्वपूर्ण है क्योंकि ये कठिन राजनीतिक सवालों को टाल देते हैं, बाहरी दबाव को कम करते हैं और सत्ता का पुनर्वितरण किए बिना संवाद के रास्ते खुले रखते हैं।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, ये तीनों मामले इस आम धारणा को चुनौती देते हैं कि युद्धविराम तटस्थ होते हैं या स्वाभाविक रूप से शांति को बढ़ावा देने वाले साधन होते हैं। इससे यह पता चलता है कि किसी देश के भीतर होने वाले विवादों/ विरोधों के संदर्भ में, युद्धविराम शासन के ऐसे राजनीतिक रूप से प्रयोग किए जाने वाले साधन होते हैं जो उन युद्धों की दिशा तय करते हैं। ज़रूरी नहीं है कि युद्धविराम युद्ध को उकसाने का ही काम करें बल्कि जब उन्हें बिना किसी राजनीतिक शर्त, सख्त अनुपालन या पक्षों की ओर से समाधान के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता के लागू किया जाता है तो वे अनजाने में ही युद्ध को लंबा खींचने का माध्यम बन जाते हैं।
इसके अलावा, किसी केंद्रीय सत्ता का अभाव और एक संप्रभु राजनीतिक संरचना की कमी यमन, लीबिया और सूडान जैसे देशों में शांति वार्ता की राह की कुछ प्रमुख बाधाएं हैं। आज के समय में युद्धविराम मुख्य रूप से इसलिए विफल नहीं होते कि उनकी रूपरेखा ठीक से तैयार नहीं की गई होती बल्कि इसलिए होते हैं क्योंकि वे रणनीतिक रूप से उन सशस्त्र अभिजात वर्ग और बाहरी पक्षों के हितों से जुड़े होते हैं जो युद्ध की स्थिति को बनाए रखने के पक्ष में होते हैं। बार– बार उल्लंघन होने के बावजूद, युद्धविरामों का लगातार प्रयोग न केवल उनकी बेअसरता को दिखाता है बल्कि वर्तमान स्थिति को बनाए रखने में उनकी राजनीतिक उपयोगिता को भी दर्शाता है। यमन, लीबिया और सूडान उन अलग– अलग रास्तों के उदाहरण हैं जिनके माध्यम से यह तालमेल काम करता है, लेकिन ये सभी एक ही नतीजे पर पहुँचते हैः शांति की आड़ में छिपे लंबे समय से चले आ रहे विवादों का सामान्यीकरण।
आजकल के युद्धविरामों की विफलता का करण यह नहीं है कि ‘युद्धविराम’ की व्यवस्था में ही कोई बुनियादी कमी है बल्कि यह उस दौर की निशानी है जिसमें हम जी रहे हैं, एक ऐसा दौर जहाँ कूटनीति के लिए लेन– देन वाले तरीके और सशस्त्र युद्धों को तुरंत निपाटने के ऐसे तरीके हावी हैं, जिनका मकसद केवल तात्कालिक राजनीतिक लाभ उठाना होता है। जब तक ऐसी स्थिति बनी रहेगी– जो आपसी विश्वास, तालमेल और सहयोग से पूरी तरह वंचित है, तब तक युद्धविरामों के नतीजों में किसी भी प्रकार के सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती।
इस संदर्भ में वैश्विक भू–राजनीतिक माहौल में एक ऐसी संरचना के पक्ष में बदलाव लाना ज़रूरी है जहाँ नियमों का सम्मान किया जाए और उनका पालन हो, विशेष रूप से जब बात सशस्त्र युद्धों और हिंसा की हो। वास्तव में यदि युद्धविराम प्रभावी हों तो वे इस प्रकार के परिवर्तन के साधन साबित हो सकते हैं। यह याद रखना भी महत्वपूर्ण है कि युद्धविराम और नियंत्रण रेखाएं अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं हैं, बल्कि व्यापक समाधान, शांति और स्थिरता, आपसी विश्वास, सामंजस्य एवं समझ, सहयोगात्मक संबंध और स्थायी मानवीय सुरक्षा ही युद्धविराम जैसे संक्रमणकालीन उपाय के अंतिम उद्देश्य हैं।
*****
*अज़रा शाहाब, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण: