प्रिय मित्रों!
भारत में विश्व के अलग– अलग हिस्सों में लोगों के अपने स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर जाने यानि पलायन का लंबा इतिहास रहा है। इसका उल्लेखनीय उदाहरण औपनिवेशिक काल में मिलता है जिसमें अंग्रोजों की ‘गिरमिटिया मज़दूरी’ व्यवस्था के तहत कैरिबियन, अफ़्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया आदि में हुआ था और बाद में, स्वतंत्रता के बाद, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, खाड़ी, अफ़्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया आदि में हुआ।
हालाँकि गिरमिटिया मज़दूरी व्यवस्था को औपनिवेशिक शासकों ने अपने साम्राज्य के उद्देश्यों को पूरा करने और भारत जैसे कम विकसित एवं गरीब देशों से लाए गए ‘सस्ते मज़दूरों’ की अवधारणा को बनाए रखने के लिए औपचारिक एवं अनौपचारिक तरीके से सरल बनाया था लेकिन 20वीं सदी में भारत से विदेश जाने वालों लोगों की संख्या और इस सदी में भी, अधिकांश, रिश्तेदारी के नेटवर्क, सामुदायिक संबंध, तदर्थ नियुक्ति एजेंट और विदेशों में बेहतर अवसरों के बारे में लोगों की सुनी– सुनाई बातों से बढ़ी है। जब प्रवासी प्रवाह या प्रवासी कल्याण जैसे सबसे अनिवार्य मुद्दों की बात आई तो सरकार ज्यादातर मूकदर्शक की भूमिका में रही।
भारतीय अधिकारियों की तरफ से एक छोटी पहल 1980 के दशक में उत्प्रवास अधिनियम, 1983, के लागू होने के साथ देखी गयी थी। इस अधिनियम ने प्रवासन जांच अनिवार्य (ECR) और प्रवासन जांच अनिवार्य नहीं (ECNR) वाले देशों के बीच अंतर किया और इस तरह धोखाधड़ी एवं वेतन चोरी समेत कई प्रकार के शोषण से, विशेष रूप से ब्लू– कॉलर वर्कर्स (शारीरिक श्रम, तकनीकी कौशल या मशीनरी से जुड़े कार्यों में कार्यरत कर्मी) की दुर्बलता को कम करने के लिए आरंभिक नियम स्थापित किए गए। इस अधिनियम ने एक पीजीई (उत्प्रवासी संरक्षण जनरल/PGE– Protector General of Emigrants) कार्यालय भी स्थापित किया जिसे भर्ती एजेंटों के लिए नियम बनाने और लाइसेंस देने का काम दिया गया था। लेकिन इस अधिनियम का दायरा बहुत सीमित है। यह मुख्य रूप से खाड़ी के ECR देशों और कम एवं मध्यम कुशल उत्प्रवासियों पर ध्यान देता है। इसका अर्थ यह हुआ कि अधिकांश गैर- ECR देश यानि ECNR देशों में जाने वाले लोगों की बड़ी संख्या को उत्प्रवासी शासन अवसंरचना में शामिल नहीं किया गया।
पिछले कई दशकों में और विशेष रूप से नई सदी के आरंभ के बाद से, भारतीय आप्रवासन के तरीकों में और भी बड़ा बदलाव आया है। परंपरागत कामगार प्रवासन के साथ– साथ कुशल पेशेवरों और छात्रों के अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों पर जाने की संख्या बहुत अधिक हुई है।
संस्थागत नज़रिए से, पूर्व का प्रवासी भारतीय मामलों का मंत्रालय (MOIA) 2004 में बनाया गया था लेकिन यह 1983 अधिनियम को लागू करने के पुराने क्षेत्रों की बजाय प्रवासियों और पीआईओ (भारतीय मूल के लोगों) मामलों पर अधिक ध्यान देने लगा। यह काम इस मंत्रालय के गठन से पूर्व श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय (MoLE) के पास था। आगे चलकर, 2016 में, प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्रालय का विलय विदेश मंत्रालय में कर दिया गया।
पिछले दस वर्षों में सरकार ने प्रवासन और आवाजाही मामलों से निपटने के लिए संरचित और व्यवस्थित कदम उठाए हैं। प्रवासियों के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए इस प्रवाह को विनियमित करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप करने की कई पहलें की गई हैं और पहले से जारी पहलों को भी समेकित किया गया है। इनमें ई– माइग्रेट (eMigrate), एमएडीएडी (कांसुलर सेवा प्रबंधन प्रणाली/ MADAD– Consular Services Management System), पीबीबीवाई (प्रवासी भारतीय बीमा योजना/ PBBY– Pravasi Bharatiya Bima Yojana) और आईसीडब्ल्यूएफ (भारतीय समुदाय कल्याण कोष/ ICWF– Indian Community Welfare Fund) जैसी पहलें शामिल हैं।
हालांकि ये उपाय बहुत कारगर हैं लेकिन भारत जिस स्तर पर काम कर रहा है उसे देखते हुए ये बहुत कम हैं। साथ ही, इनका दायरा भी सीमित है क्योंकि ये मुख्य रूप से कमज़ोर तबकों के लिए हैं और इनमें विशेष रूप से उच्च– कुशल पेशेवरों और छात्रों के प्रवासन एवं आवाजाही एवं सामान्य रूप से प्रवासन एवं आवाजाही की पूरी संरचना का उचित रूप से ध्यान नहीं रखा गया है। सरकारी हस्तक्षेप को ठोस और बेहतर बनाने की आवश्यकता है और सरकार की भूमिका को भी बढ़ाने की ज़रूरत है।
वास्तव में, भारत में प्रवासन और आवाजाही संरचना के केंद्र में सरकार को रखना होगा ताकि वह उन भारतीय नागरिकों के कल्याण को सुनिश्चित कर सके जो विदेश में रहना, काम करना या रुकने का विकल्प अपनाते हैं और क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एवं विदेशी साझीदारों के साथ संवाद में उनके हितों का बेहतर प्रतिनिधित्व कर सके। निस्संदेह, यह एक बड़े परिवर्तन से कम नहीं होगा।
भारत में प्रवासन और आवाजाही संरचना के केंद्र में सरकार को रखने के नियामक उद्देश्य क्या होंगे? निम्नलिखित कुछ बातें विचार में आती हैं-
इसी बात को ध्यान में रखते हुए ICWA के सेंटर फॉर माइग्रेशन, मोबिलिटी एंड डायस्पोरा स्टडीज़ (CMMDS) ने आज के पैनल चर्चा का विषय 'भारत में प्रवासन और आवाजाही ढांचे के केंद्र में सरकार को रखनाः बड़ा परिवर्तन’ रखा है ताकि इन सवालों पर बात की जा सके:
मैं गहन विमर्श की प्रतीक्षा में हूँ। पैनल के सदस्यों को मेरी शुभकामनाएं।
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