3 जनवरी 2026 को एक सैन्य अभियान के जरिए वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को निकाले जाने से पश्चिमी गोलार्ध में एक बहुत महत्वपूर्ण भू– राजनीतिक संकट पैदा हो गया है। ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ नाम से अमेरिकी विशेष बलों के इस अभियान ने लैटिन अमेरिका के प्रति अमेरिकी नीति में असाधारण वृद्धि को दिखाया है और यह किसी भी वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष को सीधे– सीधे हटाए जाने का दुर्लभ मामला है। हालाँकि वेनेज़ुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में सरकार का प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है। अपदस्थ राष्ट्रपति मादुरो को अब अमेरिका में नार्को– आतंकवाद और संगठित आपराधिक गतिविधियों से जुड़े आरोपों का सामना करना पड़ेगा।
इस अभियान पर अलग– अलग अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं मिलीं जो वैश्विक व्यवस्था में बड़ी दरारों को दिखाता है। रूस, चीन, ब्राज़ील, मैक्सिको, कोलंबिया, क्यूबा और स्पेन ने इस कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे वेनेज़ुएला की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। जबकि अर्जेंटीना, अल सल्वाडोर, इज़रायल और वेनेज़ुएला के विपक्ष ने इस अभियान का स्वागत किया और इसे राजनीतिक बदलाव की दिशा में एक आवश्यक कदम बताया। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और यूरोपीय संघ समेत कई यूरोपीय देशों ने इस पर मिली– जुली प्रतिक्रिया दी, उन्होंने दखल देने के सैन्य स्वरूप से स्वयं को अलग रखा लेकिन यह भी कहा कि मादुरो सरकार के पास लोकतांत्रिक वैधता नहीं है और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
हालाँकि इस तरह का सैन्य अभियान पहले कभी नहीं देखा गया लेकिन इसे एक अलग या अचानक चलाया गया अभियान नहीं समझा जा सकता। बल्कि, यह ट्रंप प्रशासन द्वारा राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल के दौरान अपनाई गई सोची– समझी और सतत रणनीतिक दिशा में उठाए जाने वाले कदमों का परिणाम है जिसका उद्देश्य पश्चिमी गोलार्ध में अपना दबदबा फिर से कायम करना था। इस अभियान ने लैटिन अमेरिका को भी गहरा झटका दिया है जिससे वॉशिंगटन के साथ पहले से ही नाज़ुक संबंध और भी खराब हो गए हैं और क्षेत्रीय देशों को संप्रभुता, सामूहिक सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़े बुनियादी सवालों का सामना करने के लिए विवश होना पड़ा है। यह शोधपत्र वेनेज़ुएला के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई की पृष्ठभूमि की पड़ताल करता है और लैटिन अमेरिका के लिए इसके परिणामों और व्यापक भू–राजनीतिक परिणामों का मूल्यांकन करता है।
वेनेज़ुएला पर सैन्य कार्रवाई और ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से रणनीतिक तैयारी
ट्रंप के दुबारा राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिकी नीति में एक बड़ा बदलाव हुआ, जिसकी पहचान राजनयिक संयम को पूरी तरह से खारिज करने और दबावपूर्ण शासन को खुले तौर पर अपनाने से हुई।[i] शुरू से ही, प्रशासन ने संकेत दे दिया था कि वह लैटिन अमेरिका में अमेरिकी रणनीतिक हितों को सुरक्षित करने के लिए आक्रामक कूटनीति और आर्थिक प्रतिबंधों से लेकर गोपनीय अभियानों तक, शक्ति के सभी उपलब्ध साधनों का प्रयोग करेगा। यह रुख पिछली सरकारों के अधिक संतुलित तरीकों से बिल्कुल अलग था और सत्ता के मंसूबों, प्रतिरोध और एकतरफ़ापन की सोच पर आधारित था।
इस रूपरेखा में, वेनेज़ुएला केवल अपनी राजनीतिक अस्थिरता या आर्थिक समस्याओं की वज़ह से नहीं बल्कि इसलिए एक अहम स्थान बनकर उभरा क्योंकि यह अमेरिका के खिलाफ लगातार विरोध का प्रतीक बना हुआ था। बीते एक दशक में, काराकास ने चीन, रूस और ईरान[ii] के साथ अपने राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक संबंधों को बेहतर बनाया था। वेनेज़ुएला के बुनियादी ढांचा और ऊर्जा के क्षेत्र में चीन का निवेश, रूसी सैन्य सहयोग और हथियारों की आपूर्ति और ईंधन आपूर्ति एवं औद्योगिक परियोजनाओं में ईरान की दखल ने वेनेज़ुएला को बाहरी शक्तियों के लिए रणनीतिक देश में बदल दिया। वाशिंगटन के नज़रिए से, संबंधों का यह जाल अमेरिका की रणनीतिक गहराई और उसके पड़ोसी प्रदेशों में प्रभाव के लिए स्पष्ट खतरा था।
अमेरिका ने लगातार लैटिन अमेरिका को एक भू– राजनीतिक अखाड़े के रूप में प्रस्तुत किया है जिससे विरोधी शक्तियों को बचने की आवश्यकता थी। इसलिए, अमेरिका ने न केवल मादुरो सरकार को अलग– थलग करने की कोशिश की, बल्कि वेनेज़ुएला में पैठ बना चुके बाहरी प्रभाव के बड़े नेटवर्क को भी समाप्त करने की कोशिश की। इसलिए सैन्य अभियान को वेनेज़ुएला के तेल भंडाल तक पहुँच हासिल करने के संकीर्ण उद्देश्य तक सीमित नहीं किया जा सकता है हालांकि ऊर्जा से जुड़ी बातें महत्वपूर्ण बनी हुई हैं। वेनेज़ुएला के पास विश्व का सबसे बड़ा प्रमाणित[iii] तेल भंडार[iv] है और अमेरिकी ऊर्जा कंपनियाँ लंबे समय से अनुकूल लाइसेंसिंग और निवेश की शर्तें चाह रही हैं। हालाँकि, यह अभियान चीन, रूस और ईरान को इस क्षेत्र से बाहर निकालने और बिना किसी चुनौती के अमेरिकी वर्चस्व को फिर से स्थापित करने के बड़े रणनीतिक प्रयास का हिस्सा होना चाहिए।
यह तरीका ट्रंप की ब्रिक्स की लगातार आलोचना के मुताबिक भी है जिसे उन्होंने तेज़ी से व्यापक पश्चिमी व्यवस्था को कमज़ोर करने वाला बताया है। ब्रिक्स के सदस्य देशों के साथ वेनेज़ुएला की बढ़ती भागीदारी और वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्थाओं[v] में उसकी हिस्सेदारी ने उसे एक भू– राजनीतिक बोझ के रूप में देखने की सोच को और मज़बूत किया। इस तरह सैन्य अभियान ने यह संकेत दिया कि विरोधी शक्तियों के साथ गठबंधन करने पर बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा।
राष्ट्रपति ट्रंप की लैटिन अमेरिका के प्रति बड़ी नीतियां इस रणनीतिक तर्क को और स्पष्ट करती हैं। प्रवासन और सीमा सुरक्षा के मुद्दों पर मेक्सिको से उनका टकरावपूर्ण रवैया, ड्रग कार्टेल्स के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकियां और बार– बार नार्को– आतंकवाद के आरोप, ये सभी जबरदस्ती के उपायों को उचित ठहराने के लिए घरेलू और अंतराष्ट्रीय मुद्दों को सुरक्षा से जोड़ने की इच्छा को दिखाते हैं। इसी तरह, ब्राज़ील के साथ उनका लेन–देन वाला संबंध जो रणनीतिक तालमेल और आर्थिक दबाव के बीच बदलता रहता था, राजनीतिक सहमति सुनिश्चित करने की बड़ी कोशिश को दर्शाता था।
पनामा नहर और आसपास के बुनियादी ढांचे को लेकर पनामा के साथ प्रशासन की राजनयिक चालों[vi] ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वाशिंगटन इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण समुद्री और रसद गलियारे पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्पित है।
इन नीतियों के पीछे बहुत ही यथार्थवादी वैश्विक नज़रिया है जो सिद्धांतों से अधिक प्रभाव को प्राथमिकता देता है। जब अंतरराष्ट्रीय कानून, बहुपक्षीय संस्थाएं या स्थापित नियम कथित राष्ट्र हितों से टकराए तो अमेरिका ने उनके प्रति बहुत कम सम्मान दिखाया। वेनेज़ुएला की घटना इस रवैये का सबसे अच्छा उदाहरण है।
ऐसी आक्रामक रणनीति अपनाने में ट्रंप का आत्मविश्वास अमेरिका और लैटिन अमेरिकी देशों के बीच सत्ता के भारी असंतुलन[vii] से और बढ़ गया था। इस क्षेत्र में विश्वसनीय प्रतिरोध खड़ा करने के लिए आवश्यक सैन्य क्षमता, तकनीकी कुशलता और संस्थागत तालमेल की कमी है। इस असंतुलन ने वाशिंगटन को खलकर दबाव बनाने वाला रवैया अपनाने के लिए बढ़ावा दिया जो ट्रंप के अभियान के बाद मेक्सिको, क्यूबा, कोलंबिया और यहाँ तक कि ग्रीनलैंड को दिए गए बयानों में स्पष्ट दिखता है।
इन टिप्पणियों में एक स्पष्ट संदेश मिला कि यदि बात मानी जाएगी तो ही वार्ता होगी, जबकि विरोध करने पर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। इस तरह वेनेज़ुएला एक लक्ष्य और चेतावनी दोनों बन गया। पनामा नहर और ब्राज़ील के मामले में भी शुरुआती विरोध के बावजूद इन देशों ने अमेरिका के साथ सौदा करने और सुलह का रुख अपनाने पर सहमति जताई, इसलिए मामला आगे नहीं बढ़ा। वेनेज़ुएला के मामले में, मादुरो लगातार अड़े रहे[viii] यहाँ तक कि उन्होंने सीधे अमेरिका को चुनौती दे दी और कोलंबिया के साथ भी संबंध बनाए जो पहले अमेरिका का गैर– नाटो सहयोगी था। इससे साबित होता है कि अमेरिकी नीति खुले टकराव के जोखिम के बिना धीरे– धीरे दबाव बढ़ाकर अपने हितों को सुरक्षित कर रही है।
परिणाम और व्यापक प्रभाव
किसी वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष को सैन्य तरीके से हटाना अंतरराष्ट्रीय कार्यप्रणाली में एक बहुत बड़ा बदलाव है और यह एक बहुत ही परेशान करने वाली मिसाल कायम करता है। हालांकि, ऐतिहासिक रूप से शासन बदलने के अभियान गोपनीय कार्रवाई, छद्म सेनाओं या राजनयिक दबाव के माध्यम से हुए हैं लेकिन आपराधिक मुक़दमे के बहाने प्रत्यक्ष सैन्य दखल से किसी राष्ट्रपति को खुलेआप अपदस्थ करना आज के अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में पहले कभी नहीं हुआ है। यह काम कानून लागू करने और युद्ध के बीच सीमाओं को धुंधला करता है और संप्रभु समानता के मूलभूत सिद्धांत को कमज़ोर बनाता है।
नार्को– आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे खतरों का हवाला देकर सैन्य दखल को उचित ठहराने से, अमेरिका ने एक ऐसा माहौल बना दिया है जिसे दूसरे शक्तिशाली देश भी अपना सकते हैं। यदि ऐसे तर्क सामान्य हो जाते हैं तो वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक ऐसे अखाड़े में बदलने का जोखिम पैद कर देगें जहाँ खतरों का मुकाबला करने और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर एकतरफा शक्ति को ज्यादा– से– ज्यादा सही ठहराया जाएगा। मानदंडों पर आधारित पाबंदियों में यह कमी वैश्विक स्थिरता के लिए बड़े खतरे पैदा करती है, विशेष रूप से छोटे और कमज़ोर देशों के लिए।
इन अभियानों ने शांतिपूर्ण वार्ता और राजनयिक तरीकों से विवाद सुलझाने की गुंजाइश को कम करके अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को भी गहरा झटका दिया है। संप्रभुता, जो पहले से ही बड़ी शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौर में दबाव में है, अब और कमज़ोर हो सकती है। वेनेज़ुएला का मामला यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय कानून को चुनिंदा तरीके से लागू किया जा सकता है या नज़रअंदाज़ किया जा सकता है जिससे दोहरे मापदंडों की धारणा मज़बूत होती है और बहुपक्षीय संस्थानों की विश्वसनीयता कमज़ोर होती है।
जैसा कि उम्मीद थी लैटिन अमेरिका पहले से भी अधिक भू– राजनीतिक हॉटस्पॉट बनने वाला है। चीन के आर्थिक प्रभाव के विस्तार, रूसी सुरक्षा भागीदारी और पनामा नहर के आसपास अमेरिकी कूटनीतिक दांव–पेंच के बाद यह क्षेत्र पहले ही रणनीतिक गणनाओं में फिर से शामिल हो गया था। वेनेज़ुएला की घटना इस रुझान को और बल देती है जिससे यह क्षेत्र एक बाहरी कारक के बजाय विवादित अखाड़ा बन गया है। इस विकास से पूरे क्षेत्र में सैन्यीकरण, बाहरी दखल और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
ऐतिहासिक रूप से, अमेरिका ने पूरे लैटिन अमेरिका में सैन्य और राजनीतिक अभियान चलाए हैं, विशेषरूप से शीत युद्ध के दौरान, जिन्हें अक्सर वैचारिक आवश्यकताओं के नाम पर उचित ठहराया गया है। हालांकि मौजूदा हालात अलग हैं, लेकिन वेनेजुएला अभियान से भविष्य में तनाव बढ़ने की संभावना है, जिसमें वेनेज़ुएला की सेना के साथ सीधे टकराव का खतरा भी शामिल है।
हालांकि, लंबे समय तक या बड़े पैमाने पर विवाद होने की संभावना कम है। वाशिंगटन तेल रियायतें और लाइसेंसिंग समझौते प्राप्त करने को उत्सुक है और भविष्य में सैन्य कार्रवाई न करने के बदले मौजूदा वेनेज़ुएला सरकार के साथ लेन– देन का संबंध बना सकता है। बड़े युद्ध/विवाद से[ix] क्षेत्रीय अस्थिरता, मानवीय संकट और बदनामी का खतरा होगा जिसे अमेरिका फिलहाल संभालने की स्थिति में नहीं दिख रहा है।
वेनेज़ुएला और पूरे लैटिन अमेरिकी क्षेत्र के लिए, यह अभियान एक गंभीर रणनीतिक झटका रहा है। इसने रक्षा तैयारियों, खुफिया समन्वय और संकट प्रतिक्रिया व्यवस्थाओं में कमियों को उजागर कर दिया है। वेनेज़ुएला एक चौराहे पर खड़ा है, उसे एक मज़बूत और खुशहाल विपक्ष का सामना करना पड़ रहा है जो चाविस्मो की नींव को मज़बूत करना चाहता है और अमेरिका के साथ वार्ता में शामिल हो रहा है। इससे भी ज्यादा ज़रूरी बात यह है कि इसने ऐसे समय में लैटिन अमेरिकी समूहवाद की सीमाओं को उजागर किया है जब क्षेत्रीय संस्थाएं बिखरी हुई और वैचारिक रूप से बंटी हुई हैं। यह अभियान मेक्सिको, क्यूबा और निकारागुआ जैसे देशों[x] के लिए भी स्पष्ट संकेत है कि वाशिंगटन के साथ तनावपूर्ण संबंधों के नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं।
नाटो जैसे किसी लैटिन अमेरिकी संगठन की गैर–मौजूदगी और सत्ता में भारी असंतुलन को देखते हुए, तीन बड़ी रणनीतिक राहें सामने आती हैं। पहला, देश आर्थिक और सैन्य सहयोग के लिए चीन, रूस और दूसरे बाहरी क्षेत्रीय देशों के साथ करीबी संबंध बनाने की कोशिश कर सकते हैं। हालांकि यह तरीका विविधीकरण और लाभ दे सकता है, लेकिन इसमें अमेरिका से भौगोलिक नज़दीकी, इन साझीदारों की सीमित भौतिक सैन्य उपस्थिति और अमेरिका की अधिक ठोस जवाबी कार्रवाई को भड़काने की संभावना के कारण बहुत जोखिम है।
दूसरा, लैटिन अमेरिकी देश अमेरिका के साथ अलग– अलग बात करने का विकल्प अपना सकते हैं ताकि वैचारिक विरोध की बजाय व्यावहारिक संवाद को प्राथमिकता देकर लगभग लाभकारी समझौते किए जा सके। यह तरीका प्रभुत्व में असमानता, अंदरूनी बंटवारे और नियमों, परंपराओं और नैतिकता की परवाह किए बिना अपने हितों की सुरक्षा करने की अमेरिका की दिखाई गई इच्छा को स्वीकार करता है। हालांकि, यह थोड़े समय के लिए स्थिति को स्थिर बना सकता है लेकिन इससे अमेरिका के महाशक्ति के रूप में मज़बूत होने का खतरा है जो मोनरो सिद्धांत की याद दिलाता है, और इससे क्षेत्रीय स्वायत्तता भी कम हो सकती है।
तीसरा, लैटिन अमेरिकी देश सामूहिक मोलभाव, बेहतर सैन्य सहयोग और गहन आर्थिक एकीकरण पर आधारित एक समेकित लैटिन अमेरिकी तरीका अपना सकते हैं। हालांकि, इस विकल्प के लिए गहन वैचारिक दरारों को दूर करने, पर्याप्त संसाधनों को जुटाने और दीर्घकालिक राजनीतिक इच्छाशक्ति बनाए रखने की आवश्यकता होगी। संस्थागत तालमेल और रणनीतिक सहमति की कमी में, यह रास्ता तुरंत हासिल हे लायक होने की बजाय केवल एक उम्मीद बनकर रह जाता है। हालाँकि, विश्व भर में बिखराव और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की कमियों के साथ– साथ यथार्थवादी राजनीति के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए एक मज़बूत और एकजुट लैटिन अमेरिका सबसे अच्छा विकल्प होगा।
निष्कर्ष
तुरंत नतीजों की परवाह किए बिना, वेनेज़ुएला के खिलाफ सैन्य कार्रवाई संप्रभुता का स्पष्ट उल्लंघन है और यह दिखाता है कि ट्रंप प्रशासन अमेरिकी रणनीतिक हितों को सुरक्षित करने के लिए सभी उपलब्ध साधनों का प्रयोग करने और लैटिन अमेरिका में विरोधी शक्तियों को स्थान न देने के लिए कितना दृढ़ है। यह अभियान दीर्घकालिक रणनीतिक गणनाओं को दिखाता है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में किसी भी वैश्विक विवाद की स्थिति में पश्चिमी गोलार्ध विरोधी शक्तियों के प्रभाव से बचा रहे और प्रतिस्पर्धी शक्तियों का लॉन्चपैड न बने। हालांकि इसे आधिकारिक रूप से नार्को– आतंकवाद और संगठित अपराध से लड़ने के उपाय के रूप में बताया गया है लेकिन इसका मकसद वृहद रणनीति के क्षेत्र में कहीं अधिक गहन है।
लैटिन अमेरिका के लिए, यह संकट मुश्किल और अलग– अलग विकल्प पेश करता है। चीन, रूस और दूसरे बाहरी साझेदार के साथ करीबी संबंध बनाने के कुछ आर्थिक और रणनीतिक मौके मिलते हैं लेकिन इसमें बड़े भू– राजनीतिक जोखिम भी हैं। इसके उलट, अमेरिका के हितों को मानने से रणनीतिक आज़ादी की कीमत पर स्थिरता मिल सकती है।
वैकल्पिक रूप से, वेनेजुएला की घटना इस क्षेत्र के लिए अपनी कमियों का फिर से आकलन करने और राजनीतिक एकजुटता, आर्थिक लचीलेपन और रक्षा क्षमताओं को मज़बूत करने में सामूहिक रूप से निवेश करने के लिए एक उत्प्रेरक का काम कर सकती है। बदलती भू– राजनीतिक और नए सिरे से बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा के दौर में, वेनेज़ुएला का संकट एक चेतावनी और महत्वपूर्ण मोड़ दोनों है जो आने वाले वर्षों में लैटिन अमेरिका की रणनीतिक दिशा को आकार देगा।
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*डॉ. अर्नब चक्रवर्ती , शोधकर्ता, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली।
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[i] Mauricio Cervantes (3rd January 2026). Trump captura a Maduro; el 2026 en Venezuela y América Latina. Accessed 6th January 2026. https://agendapublica.es/noticia/20522/trump-captura-maduro-2026-venezuela-am-rica-latina.
[ii] Forbes Centro América (7th January 2026). Trump exige a Venezuela que ponga fin a relaciones con China, Irán y Rusia, según ABC. Accessed 8th January 2026. https://forbescentroamerica.com/2026/01/07/trump-exige-a-venezuela-que-ponga-fin-a-relaciones-con-china-iran-y-rusia-segun-abc.
[iii] Scientific America (7th January 2026). Why Does Venezuela have so much Oil? Geology. Accessed 8th January 2026. https://www.scientificamerican.com/article/trump-wants-venezuelas-oil-why-does-it-have-so-much/.
[iv] Despite possessing an estimated 303 billion barrels of oil reserve, the Venezuelan oil infrastructure is in shambles and production is quite low at around 1 million per day. Hence, it would take a herculean effort to not only restore daily production but to also improve its infrastructure. The US will need absolute surety from the Venezuelan administration regarding reciprocity, security guarantees and stability. It will also have to take into account the role of China, Russia and Iran to some extent which have significant stakes in Venezuela’s oil sector.
[v] Since 2017, in response to increasing sanctions from the US, Venezuela has entered in payment mechanism which involves other currencies thus circumventing the US Dollar.
[vi] Glenn Taylor (6th January 2026). Why Trump’s Venezuela Operation Is Putting the Panama Canal Back in Play. Sourcing Journal. Accessed 8th January 2026. https://sourcingjournal.com/topics/logistics/venezuela-panama-canal-president-donald-trump-us-military-operation-nicolas-maduro-china-colombia-shipping-1234797381/.
[vii] Roberto Russel & Juan Gabriel Tokatlian (14th May 2025). A Non-Hegemonic Order: A View From Latin America. 16(2), Latin American Policy. Accessed 8th January 2026. https://onlinelibrary.wiley.com/doi/10.1111/lamp.70016.
[viii] National Post (5th January 2026). Defiant Maduro pleads not guilty, gets into shouting match during first U.S. court appearance. Accessed 8th January 2026. https://nationalpost.com/news/world/maduro-u-s-court-not-guilty-shouting.
[ix] Issac Chotiner (7th January 2026). The Former Trump Skeptics Getting Behind His War in Venezuela. The New Yorker, Accessed 8th January 2026. https://www.newyorker.com/news/q-and-a/the-former-trump-skeptics-getting-behind-his-war-in-venezuela.
[x] El Cronista (6th January 2026). México se arriesga a provocar la ira de Donald Trump con envíos de petróleo a Cuba. Accessed 8th January 2026. https://www.cronista.com/mexico/actualidad-mx/mexico-se-arriesga-a-provocar-la-ira-de-donald-trump-con-envios-de-petroleo-a-cuba/.