नवंबर 2025 का महीना जलवायु बहुपक्षवाद के लिए एक अहम पड़ाव था, जिसमें एक के बाद एक दो संगोष्ठियों का आयोजन किया गया। कॉप30 (पार्टियों का सम्मेलन-30) 9 नवंबर 2025 से 21 नवंबर 2025 तक ब्राज़ील के बेलेम में हुई,[i] इसके तुरंत बाद 22– 23 नवंबर 2025 को दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में जी20 शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया,[ii] जिसने जलवायु प्रतिक्रिया पर नई गति प्राप्त करने का अवसर दिया। हालाँकि, दोनों शिखर सम्मेलनों में संयुक्त राज्य अमेरिका की अनुपस्थिति से कार्यवाही में बाधा आई।
अपनी कमियों के बावजूद, इन संस्थानों ने अपने मज़बूत सहमति– आधारित व्यवस्था के माध्यम से जलवायु प्रतिक्रिया के बारे में वैश्विक नियमों और सिद्धांतों को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है। ये समावेशिता के मुख्य सिद्धांत के आधार पर, ग्लोबल साउथ समेत सभी के लिए वार्ता में स्थान पक्का करते हैं[iii]। जलवायु शासन के मंचों से बड़ी शक्तियों के पीछे हटने से उथल– पुथल का दौर शुरू हो गया है। जब वैश्विक जलवायु प्रतिक्रिया के मुख्य वास्तुकार और वित्तदाता कदम पीछे हटा लेते हैं तो बहुपक्षवादी संस्थानों की प्रासंगिकता और लागू करने की क्षमता दोनों खत्म हो जाती है। इस संदर्भ में, जलवायु शासन का भविष्य दो राहों पर जा सकता है: बिखराव और कमज़ोर महत्वाकांक्षा की ओर बढ़ना या ग्लोबल साउथ के सहयोग पर आधारित वैकल्पिक नेतृत्व का सामने आना।
जलवायु बहुपक्षवाद में संकट
जलवायु शासन का आधुनिक ढांचा बड़े पैमाने पर सहयोग के सिद्धांत पर बनाया गया था जिसे बड़ी शक्तियों ने सहारा दिया और जो वैश्विक महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ाएंगी। इसका इतिहास 1992 में रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी/ UNFCCC) की स्थापना से संबंधित है। इससे पार्टियों के सम्मेलन (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़– सीओपी/ COP) का गठन हुआ जो जलवायु से जुड़े मामलों पर सहमति बनाने के लिए एक ज़रूरी माध्यम है। पहला सीओपी 1995 में बर्लिन, जर्मनी में आयोजित किया गया था। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ताओं के तीन दशकों के बाद, जलवायु वार्ता का इतिहास कई सफलताओं से भरा है लेकिन साथ ही, यह जलवायु बहुपक्षवाद एवं सहयोग के क्षेत्र में और भी बहुत कुछ करने की गुंजाइश बताता है।
नतीजतन, जलवायु प्रतिक्रिया को जी20 समेत कई दूसरे बहुपक्षवाद मंचों और समूहों में एक एजेंडे के रूप में अपनाया गया है। धीरे– धीरे, नीति– निर्माता जलवायु और आर्थिक प्रदर्शन के बीच आपसी संबंध को पहचानने लगे जिससे उस दिशा में नीति बनाने की आवश्यकता महसूस हुई।[iv]
हालांकि, इन संस्थानों में भागीदारी के मामले में गिरावट का रुझान देखा जा रहा है। कॉप की विरासत पर एक बड़ा धब्बा कॉप30 (COP30) वार्ता से अमेरिका की हालिया गैरमौज़ूदगी रही है जो 2015 के पेरिस समझौते से अमेरिका के पीछे हटने और 2025 की शुरुआत में अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं से मुकरने के बाद हुआ है। यह जीवाश्म ईंधन के अधिक प्रयोग और अक्षय ऊर्जा को धीमा करने की अनकी बड़ी नीति के भी अनुरूप है। बड़े उत्सर्जक देशों के बिना, ऊर्जा परिवर्तन, स्थायी वित्त और हरित विकास पर की जाने वाली चर्चाओं को गति नहीं मिल पाई। इसके अलावा, राष्ट्रपति ट्रंप के दक्षिण अफ्रीका में गोरे अल्पसंख्यक आबादी पर कथित अत्याचार के दावे को अमेरिका द्वारा 2026 में अमेरिका में होने वाले आगामी जी20 शिखर सम्मेलन से दक्षिण अफ्रीका को बाहर करने के लिए एक और वजह बताया गया जो कारगर जलवायु बहुपक्षवाद की बाधा बन गया।[v]
ब्रिक्स (BRICS) के माध्यम से स्वच्छ तकनीक सहयोग
ब्रिक्स मंच वास्तव में 2009 में बनाया गया था जो 2001 में गोल्डमैन सैक्स द्वारा दिए गए आर्थिक अवधारणा पर आधारित था। ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन ने मिलकर इस समूह की शुरुआत की थी और 2010 में दक्षिण अफ्रीका को एक नए सदस्य देश के रूप में शामिल किया गया था। इस समूह में 2023 में ईरान, मिस्र, इथियोपिया, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया को भी शामिल कर लिया गया, साथ ही 2024 में कई “साझीदार देशों” को भी ब्रिक्स में शामिल किया गया। कुल मिलाकर, इस समूह के सदस्य देश विश्व की आबादी के 45% और विश्व की जीडीपी के 35% का प्रतिनिधित्व करते हैं।[vi]
“ब्रिक (BRIC)” देशों की अवधारणा जी7 अर्थव्यवस्थाओं के दबदबे के गैर– पश्चिमी विकल्प के तौर पर सामने आया था।[vii] इस गुट के और विस्तार ने पश्चिमी देशों और प्रणालियों, जिसमें आर्थिक, तकनीक और सुरक्षा शामिल हैं, के लिए वैकल्पिक ढांचों की आवश्यकता की ओर एक बदलाव का संकेत दिया है।[viii] इस संबंध में यह समूह स्वच्छ ऊर्जा के पैटर्न को समझने और साथ मिलकर सीखने एवं न्यायसंगत बदलाव की दिशा में आम चिरस्थायी मार्ग बनाने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।
वर्ष 2024 में, ने एक अहम पड़ाव पार कर लिया, क्योंकि अब जीवाश्म ईंधन कुल ऊर्जा क्षमता का अधिकांश हिस्सा नहीं रह गया है।[ix] भारत, चीन और ब्राज़ील इस विस्तार में सबसे आगे रहे हैं, विशेष रूप से सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में। दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात जैसे दूसरे बड़े देश भी भौगोलिक लाभों और कम होती लागत का फायदा उठाकर सौर नवाचार हब के रूप में उभरे हैं।
तालिका 1 को ध्यान से देखने पर पता चलेगा कि ब्रिक्स देशों में स्वच्छ तकनीक प्रणाली की प्रकृति के बारे में कई ज़रूरी बातें पता चलती हैं। यह समूह तकनीक में एक समान होने की बजाय बहुत अलग– अलग प्रकार की तकनीक प्रदर्शित करता है। एक तरह जहाँ चीन और भारत सौर और पवन ऊर्जा निर्माण एवं प्रयोग में क्रमशः लगभग 1.23 TW और 653 GW की कुल क्षमता के साथ अव्वल है वहीं ब्राज़ील जैव ईंधन (915.5 अरब लीटर/ वर्ष) और पनबिजली (209 GW) के क्षेत्र में अगुवाई कर रहा है। रूस और संयुक्त अरब अमीरात के पास मज़बूत परमाणु क्षमताएं हैं जिसमें रूस लगभग 37 संयंत्रों के साथ चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है और संयुक्त अरब अमीरात का बरकाह परमाणु संयंत्र देश की 25% ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करता है।
इंडोनेशिया और इथियोपिया क्रमशः भूतापीय और पनबिजली पर बहुत अधिक निर्भर हैं। इंडोनेशिया 29 GW की क्षमता के साथ भूतापीय ऊर्जा का शीर्ष उत्पादक है। इथियोपिया के नीले नील नदी पर बने ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी पावर प्लांट से 5,150 मेगावाट बिजली पैदा करने की उम्मीद है, इस वजह से यह इस महाद्वीप का एक ऐतिहासिक परियोजना बन गया है। इन देशों के पास मौजूद क्षमताओं की विविधता प्रणालिगत जोखिम को कम करती है और मुकाबले की बजाय ब्रिक्स देशों के बीच एक– दूसरे की पूरक बनने का मौका देती है।
इसके अलावा, यह तालिका ब्रिक्स देशों में संभावित भौगोलिक संसाधनों में एक संरचनात्मक लाभ की ओर संकेत करती है। दक्षिण अफ्रीका का सौर और पवन ऊर्जा में विकास, निकल और कोबाल्ट जैसे संक्रमण धातुओं में इंडोनेशिया का दबदबा, ब्राज़ील की जैवऊर्जा क्षमता और स्वच्छ तकनीक निर्माण के क्षेत्र में चीन का दबदबा, ये सभी मिलकर इस समूह को वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को आकार देने की स्थिति में लाते हैं। ईरान के पास भौगोलिक लाभ भी हैं जो सौर और भू–तापीय ऊर्जा संसाधनों की पड़ताल के लिए लाभकारी बनाते हैं। यदि समन्वय स्थापित किया जाए तो ये विशेषताएं पश्चिमी देशों के दबदबे वाली मूल्य श्रृंखला पर निर्भरता कम कर सकती हैं और व्यापार पाबंदियों, निर्यात नियंत्रण या भू–राजनीतिक झटकों से जुड़ी कमियों को कम कर सकती हैं।
तालिका 1: ब्रिक्स देशों द्वारा स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्य और प्रगति
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देश |
स्वच्छ ऊर्जा पैटर्न |
शुद्ध शून्य लक्ष्य |
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ब्राज़ील |
1. ऊर्जा क्षेत्र में अक्षय ऊर्जा का 86% हिस्सा 2. पनबिजली का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक (110 GW) 3. विश्व में दूसरा सबसे बड़ा जैवईंधन उत्पादक (15.5 अरब लीटर/ वर्ष) 4. स्थापित अक्षय ऊर्जा क्षमता के मामले में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा देश (209 GW) 5. क्षेत्र में अक्षय ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत– पनबिजली (49%)
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2050 |
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चीन |
1. स्थापित अक्षय ऊर्जा क्षमता के मामले में विश्व का शीर्ष देश (1.9 TW) 2. सौर (1.1 TW), पवन (600 GW) और पनबिजली (436 GW) का सबसे बड़ा उत्पादक |
2060 |
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मिस्र |
1. वर्ष 2023 की तुलना में पवन और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में 24% की वृद्धि 2. संभावित प्रमुख स्थान– बेनबन सौर पार्क (सौर ऊर्जा), गल्फ ऑफ स्वेज़ में अमेया विंड फार्म (पवन ऊर्जा), स्वेज नहर आर्थिक क्षेत्र (हरित हाइड्रोजन), एल– दबा (परमाणु ऊर्जा) |
2050 |
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इथियोपिया |
1. लगभग 100% बिजली अक्षय ऊर्जा स्रोतों (6 GW) से पैदा करता है। 2. अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में पनबिजली का हिस्सा 90% है 3. ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी प्लांट– पिछले वर्ष चालू हुआ था– (5, 150 MW) |
2050 |
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भारत |
1. स्थापित बिजली क्षमता का 50% अक्षय ऊर्जा से, लक्ष्य (2030) से पांच वर्ष आगे चल रहा है 2. अक्षय ऊर्जा क्षमता में विश्व में चौथा स्थान (253 GW) 3. सौर ऊर्जा (132 GW) और पवन ऊर्जा (53 GW) उत्पादन (संयुक्त) में तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक |
2070 |
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इंडोनेशिया |
1. ऊर्जा संक्रमण धातुओं– निकल, कोबाल्ट, बॉक्साइट और कॉपर के शीर्ष स्रोतों में से एक। 2. भूतापीय स्रोतों से पैदा होने वाली वास्तविक बिजली का सबसे बड़ा उत्पादक (29 GW) |
2060 |
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ईरान |
1. अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में पनबिजली का 90% हिस्सा है (19 पनबिजली संयंत्र – 10,857.5 MW) 2. भूतापीय ऊर्जा के लिए अनुकूल भौगोलिक स्थिति– सबलान और दमावंद के ज्वालामुखी क्षेत्र। मेशकिन शहर में देश का पहला भूतापीय ऊर्जा संयंत्र (5MW) 3. सौर ऊर्जा के लिए बहुत संभावना है– यहाँ वर्ष 300 से ज्यादा धूप वाले दिन होते हैं |
उल्लिखित नहीं |
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रूस |
1. परमाणु ऊर्जा का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक (37 ऊर्जा संयंत्र – 29.57 GW) और परमाणु ऊर्जा उत्पादक तकनीक का सबसे बड़ा विक्रेता (रोसाटॉम) 2. पनबिजली का पांचवां सबसे बड़ा उत्पादक (52 GW) 3. विश्व में अक्षय ऊर्जा के लिए सबसे बड़ी तकनीकी क्षमता रखता है।
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2060 |
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दक्षिण अफ्रीका |
1. वर्ष 2024 में अफ्रीका में सबसे अधिक नई सौर क्षमता स्थापित की गईं 2. अक्षय ऊर्जा क्षमता – 13.5 GW 3. प्रमुख तकनीक – सौर पीवी (7.4 GW) और पवन (6.2 GW)
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2050 |
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संयुक्त अरब अमीरात |
1. दुनिया के तीन सबसे बड़े सौर ऊर्जा संयंत्र यहीं हैं– इसमें दुनिया का सबसे बड़ा एकल– साइट सौर संयंत्र– अल धफरा सौर पीवी (कुल क्षमता – 2,627 GW) 2. परमाणु ऊर्जा संयंत्र चलाने वाला पहला अरब देश– बराकाह परमाणु ऊर्जा संयंत्र– देश की कुल बिजली आवश्यकता की 25% आवश्यकता को पूरा करता है। |
2050 |
[लेखक ने यह तालिका अलग– अलग स्रोतों से जानकारी इकट्ठा कर बनाई है]
ब्रिक्स देशों में अक्षय क्षमता तेज़ी से बढ़ रही है लेकिन जीवाश्म ईंधन अवसंरचना, विशेष रूप से कोयला, अभी भी संचालन क्षमता पर हावी है और भविष्य की ऊर्जा नियोजन में गहराई से जुड़ा है जो एक ऐसे बदलाव को दिखाता है जो परिवर्तनशील होने की बजाए योगशील है। वैश्विक ऊर्जा मॉनिटर ट्रैकर (तालिका 2) संचालन क्षमता में जीवाश्म ईंधन के दबदबे को दर्शाता है, जो एक पुरानी समस्या है। हालाँकि, वर्तमान स्थिति और भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण अंतर करना ज़रूरी है। ऐसे में जबकि ब्रिक्स देशों में वर्तमान ऊर्जा क्षमता में जीवाश्म ईंधन, विशेषकर कोयले का दबदबा बना हुआ है, भविष्य में विस्तार का रास्ता तेज़ी से अक्षय ऊर्जा की तरफ बढ़ रहा है।
तालिका 2: तकनीक और स्थिति के हिसाब से ऊर्जा क्षमता (ब्रिक्स)
[स्रोत- ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर रिपोर्ट, “ब्रिक्स में ऊर्जा”]
जलवायु वित्त और वित्तपोषण
17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन, जो जुलाई 2025 में रियो डी जनेरियो, ब्राज़ील में आयोजित किया गया था, उसमें 'जलवायु वित्त पर लीडर्स फ्रेमवर्क घोषणा' को अपनाया गया। यह एक महत्वपूर्ण संस्थागत प्रगति थी।[x] ब्रिक्स देशों को भी ऐसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे कोयले का प्रयोग धीरे– धीरे खत्म करने की आवश्यकता, अनुकूलन वित्त में कमी और अवसंरचनाओं की कमी। यदि पेरिस समझौते के वर्तमान जलवायु वित्त रूपरेखा का विकल्प नहीं है तो, एक पूरक कोष उस वित्तीय कमी को पूरी करने में मदद कर सकता है जो स्वच्छ ऊर्जा के प्रयोग को रोक रहा है।[xi] इसके अलावा, लचीलेपन और साझा समृद्धि पर बने जलवायु वित्त कोष का प्रयोग कर, देश अधिक विश्वसनीय वित्तीय प्रवाह को सुनिश्चित कर सकते हैं और अस्थिर वैकल्पिक वित्तपोषण पर अधिक निर्भरता से बच सकते हैं।[xii]
हालांकि यह घोषणा एक सकारात्मक कदम है, लेकिन ब्रिक्स ने बीते एक दशक में न्यायसंगत बदलाव जलवायु अनुकूलन और शमन हेतु वित्तपोषण प्राप्त करने की दिशा में बड़ी प्रगति की है। न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) की स्थापना 2015 में ब्रिक्स फ्रेमवर्क के तहत उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में परियोजना का समर्थन एवं उन्हें धन उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से की गई थी। वर्ष 2022–2026 के लिए एनडीबी (NDB) की सामान्य रणनीति ‘सतत भविष्य के लिए विकास वित्त को बढ़ाना’ पर केंद्रित है, जिसका लक्ष्य ऊपर बताई गई अवधि में अपने कुल कोष का 40% जलवायु परिवर्तन को कम करने और उसके अनुकूलन के लिए देना है।[xiii] वर्ष 2024 के आखिर तक एनबीडी (NDB) का जलवायु वित्त में योगदान कुल 8,091 मिलियन डॉलर का हो गया था, जिसमें से तीन– चौथाई से अधिक हिस्सा जलवायु शमन के लिए समर्पित था।[xiv]
इसके अलावा, नीचे दी गई तालिका (तालिका 3) ऊर्जा परिदृश्य में मुख्य रुझानों को दिखाती है जिसमें 2016 और 2024 के बीच लगातार वृद्धि और बढ़ते क्षेत्रीय कवरेज को दिखाया गया है। परिवहन संरचना और बहु– क्षेत्रीय परियोजनाओं का महत्व इस बात की ओर इशारा करता है कि बुनियादी आर्थिक और भौतिक संपर्क बनाने पर रणनीतिक ज़ोर दिया जा रहा है, जो लंबे समय की उत्पादकता, क्षेत्रीय एकीकरण और भविष्य के ऊर्जा परिवर्तन के लिए ज़रूरी हैं। ये निवेश आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत बनाते हैं, रसद की कमियों को दूर करते हैं और समय के साथ स्वच्छ तकनीक को बढ़ाने के लिए ज़रूरी संरचनात्मक स्थिति तैयार करते हैं।
साथ ही, स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता के लिए लगातार धन उपलब्ध कराना यह दर्शाता है कि जलवायु से संबंधित बातों को अलग लक्ष्यों के रूप में देखने की बजाय उन्हें धीरे– धीरे बड़े विकास प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है, जिससे तत्काल विकास आवश्यकताओं और दीर्घकाल में सतत लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाया जा सके।

तालिका 3: संचालन क्षेत्र के हिसाब से NDB के पोर्टफोलियो का विस्तार (31 दिसंबर 2024, मिलियन अमेरिकी डॉलर में)
[स्रोत- वर्ष 2024 के लिए NDB की सतत विकास वित्तपोषण पर रिपोर्ट]
न्यायोचित परिवर्तन की ओर
ब्रिक्स देशों में, बदलाव बहुत अधिक क्षेत्रीय असमानताओं और तेज़ी से हो रहे औद्योगीकरण के बीच होते हैं। 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2025 में, ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जलवायु कार्रवाई को विकास की प्राथमिकताओं, रोज़गार सुरक्षा और सामाजिक न्याय के साथ जोड़ा जाना चाहिए, जो इन सभी का आधार है। उन्होंने कहा कि ‘जलवायु न्याय भूख, गरीबी और नस्लवाद के खिलाफ जंग में और अधिक समावेशी वैश्विक शासन को बढ़ावा देने में सहयोग करता है।’[xv]
कई ब्रिक्स सदस्य अभी भी संरचनात्मक रूप से जीवाश्म ईंधन पर निर्भर हैं। भारत, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया के कोयले पर निर्भर क्षेत्र, साथ ही रूस, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसी तेल और गैर उत्पादक अर्थव्यवस्थाएं, तेज़ी से इन्हें खत्म करने की जटिलता के बारे में भी बताती हैं।[xvi] इस संदर्भ में, एक उचित बदलाव के लिए अचानक कार्बन–मुक्ति (decarbonisation) के बजाय सोच– समझकर नियोजन, कर्मियों को कुशल बनाना, क्षेत्रीय विविधता और सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता है। हालांकि ब्रिक्स देशों में मौजूदा ऊर्जा क्षमता में जीवाश्म ईंधन, विशेषरूप से कोयले का दबदबा बना हुई है लेकिन भविष्य में विस्तार का मार्ग तेज़ी से अक्षय ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है।
निष्कर्ष
जब दो सबसे महत्वपूर्ण जलवायु वार्ता ग्लोबल साउथ के दो सबसे अहम देशों, ब्राज़ील और साउथ अफ्रीका में शुरू हुई, तो बड़ी शक्तियों द्वारा दिखाई गई लापरवाही यह बताती है कि सहयोग और तालमेल को कैसे नए सिरे से गढ़ा जा सकता है। बड़ी शक्तियों के पीछे हटने या कम भागीदारी ने उस सहमति– आधारित मॉडल को कमज़ोर कर दिया है जिसने कभी बहुपक्षवाद को परिभाषित किया था। फिर भी, बदलाव का यह क्षण एक ऐतिहासिक अवसर की ओर भी इशारा करता है। ग्लोबल साउथ के देशों के पास अब राजनीतिक स्थान, तकनीकी क्षमता और सामूहिक शक्ति है कि वे अपने दम पर नियम बनाने वाले बन सकें।
एक बड़ा ब्रिक्स फ्रेमवर्क ऐसा ही मार्ग सुझाता है। अलग– अलग ऊर्जा व्यवस्था, एक– दूसरे की पूरक तकनीकी शक्ति और एनबीडी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय प्रभाव को एक साथ लाकर, यह समूह जलवायु सहयोग का एक ऐसा मॉडल बना सकता है जो न केवल बराबरी वाला हो, बल्कि वास्तव में बहुध्रुवीय भी हो। बदलाव की चुनौतियों के साथ उनके साझा अनुभव, नवाचार और संस्थान बनाने की उनकी क्षमता के साथ मिलकर, उन्हें वैश्विक जलवायु व्यवस्था के लिए विकास– केंद्रित विज़न पेश करने की स्थिति में लाते हैं।
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*अनुष्का सिंह, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण:
[i] 2025. Unfccc.int. 2025. https://unfccc.int/cop30/about-cop30.
[ii] Lawal, Shola. 2025. “G20 Summit in South Africa: Who’s Attending and What’s on the Agenda?” Al Jazeera. November 22, 2025. https://www.aljazeera.com/economy/2025/11/22/g20-summit-in-south-africa-whos-attending-and-whats-on-the-agenda.
[iii] Volcovici, Valerie, and Richard Valdmanis. 2025. “Planet in Peril: 30 Years of Climate Talks in Six Charts.” Reuters, November 6, 2025. https://www.reuters.com/sustainability/cop/30-years-climate-talks-progress-pitfalls-planet-peril-2025-11-06/.
[iv] Solikova, Angela. n.d. “G20 and the Ongoing Fight to Contain Climate Change.” https://ris.org.in/newsletter/RIS%20Latest%20Publications/2020/April/G20%20Digest/G20%20Digest%20March-may%202020_vol_1_No_5/pdf/Angela%20Solikova.pdf.
[v] News, PBS. 2025. “G20 Summit in South Africa Ends with Glaring US Absence after Trump’s Boycott.” PBS News. November 23, 2025. https://www.pbs.org/newshour/world/g20-summit-in-south-africa-ends-with-glaring-u-s-absence-after-trumps-boycott.
[vi] Patrick, Stewart, Erica Hogan, and Oliver Stuenkel. 2025. “BRICS Expansion and the Future of World Order: Perspectives from Member States, Partners, and Aspirants.” Carnegie Endowment for International Peace. March 31, 2025. https://carnegieendowment.org/research/2025/03/brics-expansion-and-the-future-of-world-order-perspectives-from-member-states-partners-and-aspirants?lang=en.
[vii] Ferragamo, Mariel. 2025. “What Is the BRICS Group and Why Is It Expanding?” Council on Foreign Relations. June 26, 2025. https://www.cfr.org/backgrounder/what-brics-group-and-why-it-expanding.
[viii] “BRICS Expansion: Redefining Global Structural Power in a Changing World Order.” 2025. SAIIA. February 5, 2025. https://saiia.org.za/research/brics-expansion-redefining-global-structural-power-in-a-changing-world-order/.
[ix] Norman, James. 2025. “BRICS Can Lead Clean Energy Transition in New Members, Where Fossil Fuels Predominate.” Global Energy Monitor. April 28, 2025. https://globalenergymonitor.org/report/brics-can-lead-clean-energy-transition-in-new-members-where-fossil-fuels-predominate-2/.
[x] “Leaders’ Framework Declaration on Climate Finance.” n.d. Accessed December 15, 2025.
[xi] “A BRICS Agenda for Enhancing Climate Finance |.” 2025. UN Trade and Development (UNCTAD). August 15, 2025. https://unctad.org/publication/brics-agenda-enhancing-climate-finance.
[xii] Ibid.
[xiii] “Scaling Up Development Finance for a Sustainable Future New Development Bank General Strategy for 2022-2026.” n.d. https://www.ndb.int/wp-content/uploads/2022/07/NDB_StrategyDocument_eVersion_07.pdf.
[xiv] “Report on Sustainable Development Financing | 1 Report on Sustainable Development Financing for 2024.” n.d. Accessed December 18, 2025. https://www.ndb.int/wp-content/uploads/2025/12/2025_FC_IS32_002-Report-Sustainable-Development-Financing-for-2024-1.pdf.
[xv] Das, Puja. 2025. “Brazilian President Lula Calls for ‘Planned and Just’ Exit from Fossil Fuels as COP30 to Begin in the Amazon.” Down to Earth. November 6, 2025. https://www.downtoearth.org.in/climate-change/brazilian-president-lula-calls-for-planned-and-just-exit-from-fossil-fuels-as-cop30-to-begin-in-the-amazon.
[xvi] “New Report Reveals BRICS Governments’ Revenues from Fossil Fuels.” 2019. International Institute for Sustainable Development. 2019. https://www.iisd.org/articles/press-release/new-report-reveals-brics-governments-revenues-fossil-fuels.