भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए/FTA) को अंतिम रूप देने के करीब आ रहे हैं लेकिन इस राह में सबसे बड़ी बाधा बन कर उभर रहा है – सीबीएएम (कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैक्निज़्म/ CBAM)। सीबीएएम (CBAM) को यूरोप के हरित सौदा के तहत प्रस्तुत किया गया था। यह उन चुनिंदा वस्तुओं के आयात पर शुल्क लगाता है जो विनिर्माण प्रक्रिया के दौरान कार्बन या दूसरे ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित करते हैं। भारत ने इस शुल्क को लेकर चिंता जताई है क्योंकि इससे इस्पात (स्टील) और एल्युमीनियम जैसे कार्बन– गहन वस्तुओं के भारतीय निर्यात लागत यूरोपीय बाज़ार में बढ़ जाएगी। इसी पृष्ठभूमि में, यह मुद्दा सार सीबीएएम (CBAM) और सीबीएएम (CBAM) वस्तुओं में भारत– यूरोपीय संघ व्यापार के बारे में जानकारी देता है और सीबीएएम (CBAM) पर भारतीय प्रतिक्रिया पर रौशनी डालता है।
परिचय
सीबीएएम (CBAM) को जुलाई 2021 में यूरोपीय कमीशन ने अपने “फिट फॉर 55” पैकेज के अंश के रूप में प्रस्तावित किया था। सीबीएएम (CBAM) का संक्रांति काल अक्टूबर 2023 से शुरू हुआ और जनवरी 2026[i] में यह अपने अंतिम चरण में जाएगा। यह एक पर्यावरण नीति साधन है जिसके माध्यम से यूरोपीय संघ आयातित उत्पादों पर वही कार्बन शुल्क लगाता है जो वह यूरोपीय संघ में काम करने वाली कंपनियों पर लगाता है[ii]। इसका उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन पर शुल्क लगाकर कार्बन लीकेज को कम करना और 2050 तक जलवायु तटस्थता प्राप्त करना है।
अलग– अलग देशों के लिए अलग– अलग शुल्क निर्धारित करने की बजाय सीबीएएम (CBAM) यूरोपीय संघ में आने वाली वस्तुओं पर यूरोपीय संघ उत्सर्जन व्यापार व्यवस्था (ईटीएस/ETS) के तहत आने वाले क्षेत्रों के लिए एक समान कार्बन शुल्क लगाता है। इसमें शामिल क्षेत्र हैं– खाद, हाइड्रोजन, बिजली, लोहा और इस्पात, सीमेंट और एल्युमीनियम[iii]। संक्रमण काल में, आयातकों को अपने आयात से होने वाले उत्सर्जन के बारे में प्रत्येक तीन माह पर रिपोर्ट करनी होती थी[iv]। वर्ष 2026 से, सीबीएएम (CBAM) के पूर्ण रूप से लागू हो जाने की उम्मीद है और यूरोपीय संघ ईटीएस (EU ETS) के तहत मिलने वाली छूट धीरे– धीरे समाप्त कर दी जाएगी। सीबीएएम (CBAM) लागू होने के बाद, आयात करने वाली यूरोपीय संघ की कंपनियों को उत्सर्जन की रिपोर्ट देनी होगी और उत्सर्जन प्रमाणपत्र देना होगा। वर्ष 2034 से, सीबीएएम (CBAM) प्रमाणपत्र सीबीएएम (CBAM) वस्तुओं के 100 प्रतिशत सन्निहित उत्सर्जन को कवर करेंगे और इन वस्तुओं के लिए यूरोपीय संघ ईटीएस (EU ETS) के तहत कोई छूट नहीं दी जाएगी[v]।
यूरोपीय हरित सौदा जलवायु तटस्थता प्राप्त करने के लिए यूरोप की विकास रणनीति है[vi]। इसका उद्देश्य 1990 के स्तर से शुद्ध ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को न्यूनतम 55 प्रतिशत कम करना और 2050 तक जलवायु तटस्थता प्राप्त कर लेना है[vii]। इसके तहत, यूरोपीय संघ सीबीएएम (CBAM) और यूरोपीय संघ वन विनाश विनियमन (ईयूडीआर/ EUDR) को गैर– प्रशुल्क बैरियर के रूप में लागू किया गया है। सीबीएएम (CBAM का आखिरी चरण जनवरी 2026 में शुरू होगा[viii]। विशेष बात यह है कि भारत का उत्सर्जन बहुत अधिक है जिसकी वजह से वह यूरोपीय संघ सीबीएएम (EU CBAM) के नियमन दायरे में आ सकता है[ix]।
इसलिए, सीबीएएम (CBAM) जारी एफटीए वार्ता को पूरा करने में एक बड़ी बाधा बन गया है। जैसे– जैसे अंतिम दौर नज़दीक आ रहा है, यूरोप में अंदरूनी मतभेद बढ़ते जा रहे हैं। तनाव औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और जलवायु नीति के लक्ष्य के बीच है। इसके अलावा, यूरोपीय उद्योग संघ ने चिंता जताई है कि " सीबीएएम वास्तविकता से अधिक कागज पर गतिमान है”[x]। और इसकी वजह से इस्पात की पूरी मूल्य श्रृंखला में लागत में बहुत वृद्धि हो जाएगी[xi]।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच सीबीएएम(CBAM) वस्तुओं का व्यापार
यूरोपीय संघ भारत का एक प्रमुख व्यापार साझीदार है। सीबीएएम– क्षेत्र की वस्तुओं में यूरोपीय संघ को भारत का निर्यात बहुत अधिक और अच्छे– खासे मूल्य का है। भारत यूरोपीय संघ बाज़ार में लोहा और इस्पात का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। साल 2020 में जहां लोहा और इस्पात का निर्यात 1.92 अरब डॉलर का था वहीं 2023 और 2024 में यह निर्यात बढ़कर लगभग 4.4– 4.6 अरब डॉलर मूल्य का हो गया था। वर्ष 2024 में एल्युमीनियम का निर्यात भी लगभग 1.1 अरब डॉलर का था।
ऐसे में जबकि लोहा और इस्पात एवं एल्युमीनियम के निर्यात का स्तर स्थिर बना हुआ है, धातुओं की तुलना में उर्वरकों का निर्यात कम हो रहा है। यूरोपीय संघ के देशों में उर्वरकों के सीमित व्यापार और उर्वरक उद्योग पर भारत का घरेलू फोकस के कारण कीमतें कम हैं। सीमेंट का निर्यात भी धीरे– धीरे कम हुआ है। परिवहन की उच्च लागत, यूरोपीय बाज़ार में परिपूर्णता, और कार्बन– गहन सीमेंट उत्पादन के लिए सीबीएएम मानदंडों का पालन, ये सभी सीमेंट उद्योग से यूरोपीय संघ को किए जाने वाले निर्यात में लगातार गिरावट की वजहें हैं।
तालिका 1: भारत का यूरोपीय संघ को सीबीएएम (CBAM) वस्तु निर्यात (हजार अमेरिकी डॉलर)
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वस्तुएं |
2020 में मूल्य |
2021 में मूल्य |
2022 में मूल्य |
2023 में मूल्य |
2024 में मूल्य |
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लोहा और इस्पात |
19,22,931 |
60,78,331 |
43,77,035 |
46,37,709 |
44,83,934 |
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एल्युमीनियम |
4,23,161 |
16,98,666 |
25,94,982 |
10,74,731 |
11,97,187 |
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उर्वरक |
5,646 |
1,535 |
2,186 |
2,964 |
2,324 |
|
सीमेंट |
2,23,835 |
2,84,885 |
2,00,106 |
1,78,885 |
1,62,204 |
(स्रोत: आईटीसी(ITC) व्यापार मानचित्र[xii])
लोहा और इस्पात उद्योग भारत के यूरोपीय संघ को होने वाले सीबीएएम निर्यात का 90 प्रतिशत है और इसलिए यह विशेष रूप से प्रभावित होगा। हालांकि ये निर्यात देश की जीडीपी का केवल 0.2 प्रतिशत हैं,[xiii] लेकिन सीबीएएम का भारतीय निर्यात पर बहुत असर पड़ेगा।
पहला, भारतीय निर्यात को सन्निहित उत्सर्जन हेतु ज़रूरी प्रमाणपत्र लेने में सीधा– सीधा खर्चा आएगा। इससे लाभ कम होगा और निर्यात प्रतिस्पर्धा में कमी आएगी। दूसरा, सीबीएएम (CBAM) का बोझ अलग– अलग क्षेत्र के अलग– अलग है। इस्पात उद्योग विशेषरूप से अपने अधिक उत्सर्जन, निर्यात की बड़ी मात्रा और निश्चित उत्पादन पैटर्न, जो तत्काल परिवर्तन को तैयार नहीं हैं, की वजह से मुश्किल में है।
तीसरा, बड़े भारतीय इस्पात उत्पादक अपने बेहतर संसाधनों और क्षमता के कारण नए नियमों को ज्यादा तेज़ी से अपना सकते हैं। संभावना है कि छोटे और मझोले उद्यमों को ऐसा करने में समय लगेगा। नतीजतन, भारतीय इस्पात उद्योद पर सीबीएएम (CBAM) पर असर असमान और अनुचित होने की संभावना है, जिसमें बड़े उद्यमी छोटे उद्यमियों की तुलना में अधिक तेज़ी से और आसानी से बदलाव कर पाएंगे। अच्छी बात यह है कि भारतीय निर्यातक कर के प्रभाव को कम करने के लिए पर्यावरण के अधिक अनुकूल उत्पादन तरीकों को अपना सकते हैं।
इससे संबंधित क्षेत्रों में कार्बन–मुक्ति (decarbonisation) तकनीक और प्रक्रिया में निवेश बढ़ सकता है। आखिर में सीबीएएम (CBAM) कार्बन टैक्स लगाने की वजह से कुल व्यापार पर भी असर डालता है। इसके कारण, भारतीय निर्यात की मात्रा में काफी कमी आएगा। साथ ही, ज्यादातर व्यापार नुकसान और कल्याण का बोझ भारत को ही उठाना पड़ेगा[xiv]।
भारत– यूरोपीय संघ व्यापार संबंधों में सीबीएएम की भूमिका
सीबीएएम भारत के यूरोपीय संघ के साथ व्यापार संबंधों के लिए एक बड़ी चुनौती है। यूरोपीय संघ भारत का दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है और भारत के कुल वस्तु निर्यात का लगभग 15[xv] है। भारत ने सीबीएएम पर इक्विटी को लेकर चिंता जताई है क्योंकि यह बिना किसी नैतिक ज़िम्मेदारी के विकासशील देशों पर कार्बन शुल्क लगाता है। यह एक असमान शुल्क है क्योंकि सभी देशों पर एक जैसा कार्बन शुल्क लगाया जाता है और उनके उत्सर्जन के इतिहास पर विचार नहीं किया जाता।
जैसे– भारत जैसे विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है। हालांकि सीबीएएम के तहत ज़िम्मेदारी विकासशील देशों पर डाली गई है। इसके अलावा, विकास एवं क्षमता से अलग– अलग स्तरों को नज़रअंदाज़ करके संसाधन विकासशील देशों से दूसरी जगह भेजे जा रहे हैं। इसके विपरीत, विकसित देशों ने पेरिस समझौते के तहत विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्तपोषण पर सहमति जताई है।
इसके अलावा, भारत ने सीबीएएम की विश्व व्यापार संगठन के सिद्धांतों के साथ संगतता पर चिंता जताई है क्योंकि यह एक गैर– प्रशुल्क बाधा है और एफटीए (FTA) को कमज़ोर करता है[xvi]। इसलिए, सीबीएएम एफटीए वार्ता का एक अहम हिस्सा बन जाता है। भारत जलवायु संक्रमण निवेश के साथ व्यापार रणनीति को मिलाकर अपने बाज़ार हिस्सेदारी को बनाए रख सकता है और अधिक प्रतिस्पर्धी औद्योगिक आधार विकसित कर सकता है। जारी एफटीए को सफल बनाने के लिए सीबीएएम मुद्दे का समाधान आवश्यक है। यदि इसका समाधान नहीं निकाला गया तो इससे यूरोपीय संघ में भारतीय उद्योगों के लिए निर्यात कम हो सकता है और प्रतिस्पर्धा भी घट सकती है। इससे इन क्षेत्रों में रोज़गार और आर्थिक विकास भी प्रभावित होंगे। दूसरी ओर, सीबीएएम पर समाधान और एक सफल एफटीए से द्विपक्षीय व्यापार एवं आर्थिक संबंध मजबूत हो सकते हैं।
ध्यान रखें कि, भारत के पास पहले से ही अपना उत्सर्जन कम करने का तंत्र है जिसमें प्रदर्शन, उपलब्धि और व्यापार (पीएटी/PAT) योजना है और अक्षय ऊर्जा प्रमाणपत्र (आरईसी/REC) योजना शामिल हैं[xvii]। पीएटी (PAT) योजना अलग– अलग उद्योगों के लिए ऊर्जा खपत के लक्ष्य निर्धारित करती है जबकि आरईसी (REC) योजना में उद्योगों को अपनी ऊर्जा खपत में निश्चित मात्रा में अक्षय ऊर्जा का प्रयोग करना होता है[xviii]। इसके अलावा पीएटी (PAT) योजना सीबीएएम (CBAM) के कार्बन उत्सर्जन लेखा– विधि के तहत नहीं आती। इसलिए, यूरोपीय संघ मानकों का प्रयोग कर सन्निहित उत्सर्जन की गणना करने पर, भारतीय उद्योगों को कार्बन मान अधिक दिखाना पड़ सकता है। इससे भारतीय निर्यातकों की लागत बढ़ेगी, भले ही उनके वास्तविक कार्बन उत्सर्जन स्तर कम हों।
निष्कर्ष
यूरोपीय संघ ने 2050 तक जलवायु तटस्थता प्राप्त करने के लिए 2021 में सीबीएएम (CBAM) को अपनाया था। सीबीएएम (CBAM) को यूरोपियन ग्रीन डील फ्रेमवर्क के तहत लागू किया जा रहा है। यह इस महीने से लागू होने वाला है और इसका उद्देश्य कार्बन– गहन वस्तुओं पर शुल्क लगाना है। लोहा, इस्पात और एल्युमीनियम क्षेत्र भारत से यूरोपीय संघ को होने वाले मुख्य निर्यात में शामिल हैं। इसलिए सीबीएएम को लागू करना भारत के लिए चुनौती है क्योंकि इसका निर्यात पर बुरा असर पड़ने वाला है। इसके अलावा, भारत ने इक्विटी के मुद्दों और डब्ल्यूटीओ के सिद्धांतों के साथ इसकी संगतता को लेकर भी चिंता जताई है।
इसलिए, सीबीएएम (CBAM) एफटीए (FTA) वार्ता को पूरा करने में एक रुकावट बन गया है। हालांकि सीबीएएम वार्ता में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (सीसीटीएस/ CCTS) को शामिल करने से निर्यातकों को कुछ राहत मिल सकती है। सीसीटीएस कार्बन मूल्य निर्धारण के माध्यम से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए भारत की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था में कार्बन– मुक्ति (decarbonisation ) के प्रयासों को बढ़ावा देना और समर्थन करना है। इसलिए सीसीटीए को शामिल करने से भारतीय निर्यातकों की लागत कम होगी क्योंकि उद्योग यूरोपीय संघ बाज़ार में प्रवेश करने से पहले ही कार्बन लागत का भुगतान कर चुके होंगें।
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*आँचल गर्ग, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण:
[i] https://taxation-customs.ec.europa.eu/system/files/2023-11/CBAM%20Guidance_EU%20231121%20for%20web_0.pdf.
[ii] Carbon taxes in Europe, 2025, https://taxfoundation.org/data/all/eu/carbon-taxes-europe/.
[iii] European Commission (2023). Carbon Border Adjustment Mechanism. Taxation and Customs Union, https://taxation-customs.ec.europa.eu/carbon-border-adjustment-mechanism_en.
[iv] EUR-Lex (2023). Carbon Border Adjustment Mechanism, https://eur-lex.europa.eu/legal-content/EN/TXT/?uri=legissum:4696271.
[v] https://taxation-customs.ec.europa.eu/system/files/2023-11/CBAM%20Guidance_EU%20231121%20for%20web_0.pdf
[vi] Sharma, Vatsala, and Khushi Gupta. "Implications of Carbon Border Adjustment Mechanism: a case of India’s exports to European Union." Journal of Resources, Energy and Development 18, no. 1-2 (2022): 55-76.
[vii]https://taxation-customs.ec.europa.eu/system/files/2023-11/CBAM%20Guidance_EU%20231121%20for%20web_0.pdf.
[viii] Ibid.
[ix] Best, Frank. "The EU Carbon Border Adjustment Mechanism and its Influence on Imports from India." (2023).
[x] EUROMETAL (2025). "European steel industry warns CBAM risks 'structural mismatch' between rules, reality, https://eurometal.net/european-steel-industry-warns-cbam-risks-structural-mismatch-between-rules-reality/.
[xi] Ibid.
[xii] ITC Trade map, https://www.trademap.org/Bilateral_TS.aspx?nvpm=1%7c699%7c%7c%7c14719%7cTOTAL%7c%7c%7c2%7c1%7c1%7c2%7c2%7c1%7c1%7c1%7c1%7c1.
[xiii] https://csep.org/working-paper/assessing-the-distributional-implications-of-the-eus-cbam-on-india-a-cge-analysis/.
[xiv] Sikdar, Chandrima. &”Impact of EU’s carbon border tax on South Asian trade partners” &; Asia Europe.
[xv] https://www.policycircle.org/industry/india-eu-fta-cbam-impact/.
[xvi] https://www.cnbctv18.com/access/opinion/india-eu-free-trade-agreement-carbon-border-adjusted-mechanism-indias-export-challenges-19792995.htm.
[xvii] Oxford Institute for Energy Studies (University of Oxford). “Building the Indian Carbon Market: A Work in Progress.” Oxford Institute for Energy Studies, 2023. http://www.jstor.org/stable/resrep49373.
[xviii] Bureau of Energy Efficiency (2022), Policy Paper on Indian Carbon Market (ICM), Government of India.