परिचय
23 अक्टूबर 2025 को रैपिड सपोर्ट फोर्सेस (आरएसएफ/RSFs) द्वारा अल– फ़ाशिर पर कब्जा करने के बाद से सूडान में तबाही मची हुई है।[1] हालांकि, इस विवाद की जड़ें बंटवारे, सैन्य आदीवासी राजनीति और दक्षिणी सूडानी आबादी विशेष रूप से डिंका और नुएर जनजातीय समुदायों को दशकों से हाशिए पर रखने में है। इसके अलावा, बड़ी और क्षेत्रीय शक्तियां इस बिखराव का प्रयोग लाल सागर और सूडान की सोने की खदानों में अपने रणनीतिक और संसाधन हितों को पूरा करने के लिए कर रही हैं।

सैटेलाइट की तस्वीर जिसमें अक्टूबर 2025 में अल– फ़ाशिर पर आरएसएफ के हमले के बाद हुए खून– खराबा दिख रहा है।
स्रोत: इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल पॉलिटिकल स्टडीज़ (आईएसपीआई/ ISPI)
वर्ष 1956 में सूडान की आज़ादी के बाद से, उसे एक बहुत विभाजित समाज में स्थिरता बनाए रखने में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। सूडान की कमज़ोरी सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक बंटवारे की वजह से है, जो दशकों पुराना है, वर्तमान सूडानी आर्म्ड फोर्सेस (एसएएफ) और आरएसएफ के बीच जंग से भी पहले का। दारफुर, नीली नील (ब्लू नील) और दक्षिण कोर्डोफ़ान जैसे इलाकों को लंबे समय तक कमज़ोर रखे जाने की वजह से देश की संस्थाएं कमज़ोर और असमान रूप से विकसित रहीं।[2]
साल 2019 में राष्ट्रपति उमर अल– ब़शीर को हटाने से राजनीतिक सुधारों की उम्मीद जगी, लेकिन अनंतिम सरकार को एक बहुत ही मज़बूत और बिखरी हुई सुरक्षा व्यवस्था भी विरासत में मिली थी। आरएसएफ, जिसकी जड़ें जंजावीड मिलिशिया (सहायक सेना) में है, ने, एक समानांतर ढांचा और आर्थिक स्वतंत्रता बनाए रखी। साल 2023 में फोर्सेस ऑफ फ्रीडम एंड चेंज सेंट्रल काउंसिल (एफसीसी– सीसी) और एसएएफ जैसे घरेलू सुधार गठबंधनों के साथ– साथ अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों द्वारा आरएसएफ को राष्ट्रीय सेना में मिलाने की कोशिशों के बाद यह दुश्मनी एक बड़े युद्ध में बदल गई।[3] इस वजह से दोनों गुट बिना किसी नागरिक निगरानी के सैन्य शक्ति बनाए हुए हैं।
आज, सूडान कई प्रकार के संकटों का सामना कर रहा है. दो शक्ति केंद्रों के बीच सैन्य संघर्ष, एक गहरा कबायली गृह युद्ध, बड़ी और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच जबरदस्त भू–राजनीतिक मुकाबला और विश्व के सबसे विनाशकारी मानवीय संकटों में से एक। सूडान के अयन को समझने के लिए, कबीलेवाद के ऐतिहासिक विकास, राजनीतिक सत्ता के सैन्यीकरण और बाहरी दखलअंदाज़ी को बढ़ावा देने वाले पर्यावरण संबंधी रणनीतिक कारणों की जांच करना ज़रूरी है जो सूडान के भविष्य को आकार देने में मदद कर सकते हैं।
आंतरिक कमज़ोरियाँ: कबाइलीपन, सैन्यीकरण और देश का पतन
सूडान के अंदरूनी बंटवारे की जड़ें औपनिवेशिक काल में हैं, विशेषरूप से ब्रिटिश प्रशासनिक नीतियों में जिन्होंने आदिवासी पहचानों को संस्थागत बनाया और उन्हें बांट दिया।[4] जातीय भेदभाव के इर्द– गिर्द संरचित शासन ने सूडानी समाज में और भी विभाजन पैदा किया। औपनिवेशिक शक्तियों ने अरब, अफ्रीकी और आदिवासी पहचानों का राजनीतिकरण करके उत्तर– दक्षिण विभाजन और आदिवासी मतभेदों को बढ़ावा दिया।[5]
अंग्रेजों ने न्यूनतम प्रशासनिक खर्च पर अप्रत्यक्ष शासन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आदिवासी सरदारों को अधिकार सौंपने के लिए 'देशी प्रशासन' व्यवस्था पर विश्वास किया। जातीय मातृभूमि को औपचारिक रूप देना, कुछ विशेष समूह को आर्थिक लाभ देना और आने– जाने एवं राजनीतिक भागीदारों पर रोक लगाने से आदिवासी विभाजन और गहरा हो गया। औपनिवेशिक शासन ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ किसी भी एकजुटता आंदोलन को रोकने के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय चेतना को बढ़ावा देने की बजाय प्रतिस्पर्धी आदिवासी वफादारी को बढ़ावा दिया।[6]
आज़ादी के बदा, सूडानी नेता इस विभाजित व्यवस्था में सुधार करने में नाकाम रहे और इसे अपना लिया। लगातार आने वाली सरकारों ने सबको साथ लेकर चलने वाले संस्थान बनाने के बजाय, सत्ता में बने रहने के लिए कबायली पहचान का प्रयोग किया। गाफर निमेरी और उमर अल– ब़शीर जैसे नेताओं ने पश्चिमी संरक्षण नेटवर्क पर विश्वास किया, जिसने कुछ विशेष आदिवासी समूहों को शक्ति दी और बाकी को हाशिए पर धकेल दिया। 1980 और 1990 के दशक के दौरान, निमेरी और अल– ब़शीर के नेतृत्व में इस्लामीकरण की नीतियों से यह खाई और गहरी हो गई, खासकर दारफुर में।[7] उदाहरण के लिए, निमेरी के समय 1983 में लाए गए शरिया– आधारित ‘सितंबर कानून’ ने गैर– मुस्लिम आबादी को हाशिए पर धकेल दिया और दूसरी ईसाई एवं आदिवासी आबादी पर सख्त शरिया कानून लागू कर दिए।.[8] अल– ब़शीर ने चुनींदा ज़मीन आवंटन, प्रशासनिक पुनर्गठन और आदिवासी मिलिशा को हथियार देकर इन नीतियों को मज़बूत किया। इन नीतियों से अरब और गैर– अरब समुदायों, जिनमें फुर, मसालित और ज़घावा शामिल हैं, के बीच की खाई और गहरी हो गई। [9]
हालांकि, 2020 के सुधारों ने इन दौर को खत्म कर दिया लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता पर कानूनी और सामाजिक प्रभावों को लेकर बहस जारी है। बशीर के शासन में जातीय ध्रुवीकरण में तेज़ी आई, जिसने किसी भी तरह के गैर– अरब विद्रोह को दबाने के लिए अरब मिलिशिया (आगे चलकर यह जंजावीड के नाम से जाने गए) को हथियार दिए। इसने मिलिशिया हिंसा को एक राजनीतिक हथियार के तौर पर सामान्य बना दिया। बाद में, मुहम्मद हमदान डगालो मूसा, जिन्हें 'हेम्दती' के नाम से जाना जाता है, उनके नेतृत्व में जंजावीड मिलिशिया के आरएसएफ में बदलने से एक सत्तावादी अर्धसैनिक बल नियमित हो गया जो दारफुर से आगे बढ़कर राष्ट्रीय राजनीति तक पहँच गई।[10]
आरएसएफ के ज्यादातर कमांडर दारफुरी अरब कबीलों के हैं और भर्ती ज्यादातर पहचान के नेटवर्क के आधार पर होती है। हालांकि एसएएफ और आरएसएफ दोनों ही कबीलाई वफ़ादारी का फायदा उठाते हैं और युवाओं की भर्ती एवं असर के बदले में संरक्षण, हथियार और सुरक्षा देते हैं। जब युवा कबीलाई समूहों के प्रति अपनी वफ़ादारी साबित करने के जाल में फंस जाते हैं तो उनके नेता उनकी कीमत पर वित्तीय और राजनीतिक लाभ उठाते हैं।[11]
आरएसएफ संसाधनों का प्रयोग कर, विशेष रूप से सोने का, वित्तीय जरूरतें पूरी करता है और यह सूडान के बड़े आर्थिक विभाजन से और मज़बूत होता है जिसमें मुख्य संसाधन और व्यापार नेटवर्क देश के अधिकार से बाहर काम करते हैं और देश की बजाय मुकाबला करने वाली सेना और आदिवासी समूहों द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं। इससे आरएसएफ को सरकारी व्यवस्था को पूरी तरह से उपेक्षा करने में मदद मिलती है। यह समानांतर ‘युद्ध अर्थव्यवस्था’ मिलिशिया संगठनों को और मज़बूत करती है और राष्ट्रीय सुलह के किसी भी व्यवस्था को कमज़ोर करती है।[12]
सूडान में सैन्यीकरण और कबीलेवाद ने नागर अवसंरचना को खोखला कर दिया है। आरएसएफ केवल एक मिलिशिया तक सीमित नहीं है बल्कि यह क्षेत्रीय नियंत्रण और आर्थिक गतिविधियों के साथ एक वास्तविक अर्ध– राष्ट्रीय कारक के तौर पर भी काम कर रहा है। इसके अलावा, इसने विदेशी संबंधों के माध्यम से अपनी शक्ति को और बढ़ाया है, जिससे पहले से ही कमज़ोर नागर संस्थान और भी कमज़ोर हो गए। सूडान में जब सार्वजनिक सेवा ठप हो गईं, तो कई विस्थापित सूडानी लोगों को अपनी बुनियादी ज़रूरतों और सुरक्षा के लिए मिलिशिया पर निर्भर रहना पड़ा। [13
इससे सूडान की आबादी पर उनके सत्ता का आधार और पकड़ मजबूत होती है। लंबे समय से जारी संघर्ष ने लोगों का विश्वास तोड़ दिया है जिससे सूडान की सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था बुरी तरह से बिखर गई है। वर्ष 2019 के बाद संक्रमणकालीन समझौतों की नाकामी ने इन दरारों को और बड़ा कर दिया। सूडान के सुरक्षा ढांचे की कमज़ोरी और एक एकीकृत राष्ट्रीय सेना की गैर–मौजूदगी तब सामने आई जब आरएसएफ को एसएएफ में मिलाने की लगातार कोशिशों से तनाव कम होने की बजाय और बढ़ गया।
बाहरी दखल: सूडान में नया खेल
विदेशी ताकतों के लिए सूडान का रणनीतिक महत्व उसके भूगोल और भरपूर संसाधनों में है। लाल सागर में अपनी स्थिति के कारण, सूडान के पास समुद्री अवरोध बिन्दु तक पहुंच है जो व्यापार और ऊर्जा प्रवाह के लिए बहुत ज़रूरी है। [14] संसाधनों के भंडार, खासकर सोने के भंडार, देश को विदेशी निवेशकों और रणनीतिक खिलाड़ियों के लिए आकर्षक बनाते हैं। नतीजतन, अंदरूनी संघर्ष क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के बीच एक बड़े भू– राजनीतिक मुकाबले से गहराई से जुड़ गया है।
सूडान की रणनीतिक स्थिति
स्रोत: https://tinyurl.com/2t23hbtw
रूस एसएएफ और आरएसएफ के बीच की फूट का फायदा उठाकर सूडान की जंग में एक अहम खिलाड़ी बनकर उभरा है। अफ्रीका रूस के लिए रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। यह मुख्य रूप से अपने सुरक्षा नेटवर्क और माइनिंग गतिविधियों के ज़रिए प्रमुख खिलाड़ी बन कर उभरा है। रूसी कारक, विशेष रूप से वैगनर ग्रुप और उसके बाद बने संगठनों ने सूडान में आरएसएफ मिलिशिया को सोने की खदानों तक विशेष पहुँच और पोर्ट सूडान में संभावित नौसैनिक अड्डे के अधिकार हासिल करने के बदले में समर्थन दिया है ताकि वे लाल सागर के बड़े तट पर पहुँच सकें। [15] सूडान, मध्य पूर्व और अफ्रीका में रूस के प्रभाव को बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक द्वार है।
सूडान की जंग में एक और अहम खिलाड़ी संयुक्त अरब अमीरात है, जिस पर चाड, लीबिया, युगांडा, मध्य अफ्रीकी गणराज्य और केन्या के रास्ते आरएसएफ को हथियार आपूर्ति करने का लगातार आरोप लगता रहा है।[16] इस संकट में संयुक्त अरब अमीरात की भागीदारी सोने में आर्थिक हितों और लाल सागर गलियारे में भू– राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित है।[17] इसके उलट, मिस्र एसएएफ का समर्थन करता है और उसे एकमात्र ऐसी संस्था मानता है जो क्षेत्रीय एकता बनाए रखने एवं अपनी लंबी साझा सीमा पर अस्थिरता फैलाने से रोकने में सक्षम है। [18]
अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसी पश्चिमी शक्तियां मानवीय और कूटनीतिक मदद पर अधिक ध्यान दे रही हैं, जैसे कि संयुक्त राष्ट्र के राहत अभियानों को पैसे देना, दोनों तरफ के कमांडरों पर प्रतिबंध लगाना और लाल सागर क्षेत्र की स्थिरता बनाए रखने के लिए जेद्दा एवं एयू– आईजीएडी (AU-IGAD) मध्यस्थता ट्रैक का समर्थन करना।[19] हालांकि, उनका प्रभाव सीमित है।[20]
वे एक नागरिक– नीत बदलाव की वकालत करते हैं, लेकिन क्षेत्रीय शक्तियों के बीच लगातार मुकाबले से सार्थक दबाव नहीं बन पाता। पड़ोसी देश, जैसे कि चाड, इरिट्रिया, इथियोपिया और दक्षिण सूडान, साझा जातीय समूहों, आर्थिक निर्भरता एवं सुरक्षा समस्याओं के कारण इस संकट में बुरी तरह फंसे हुए हैं। इन बाहरी हितों ने विवाद को और बढ़ा दिया है क्योंकि विदेशी शक्तियां अपने पसंदीदा गुटों का समर्थन करती हैं, जिससे बदले में, शांति के लिए किए जा रहे मिले– जुले प्रयासों को नुकसान पहुंचता है।[21]
भविष्य की राह: सूडान को बचाया जा सकता है?
सूडान का भविष्य कई तरह से सामने आ सकता है जो बदले राजनीतिक, सैन्य और क्षेत्रीय हालातों से तय होगा। एक संभावना यह है कि एसएएफ और आरएसएफ के बीच सत्ता– साझेदारी का समझौता हो जाए। यह 2019 के संक्रमणकालीन युग जैसा होगा, जहाँ बाहरी मध्यस्थों ने मिलकर एक संयुक्त शासन रूपरेखा बनाने की कोशिश की थी।[22] हालांकि, पिछली व्यवस्थाओं का अनुभव, जिनमें बार– बार गड़बड़ियां हुईं, आपसी अविश्वास रहा और आर्थिक नियंत्रण को लेकर मुकाबला हुआ, यह वर्तमान में ऐसे मॉडल की सीमाएं बताता है।
एक संभावना यह भी है कि एक ही गुट की पूर्ण जीत हो जाए। इसके अपने परिणाम देखने को मिलेंगे। यदि एसएएफ जीतता है तो सूडान पिछले शासनों जैसे अल– ब़शीर और निमेरी के शासन की तरह, केंद्रीकृत सैन्य शासन में वापस जा सकता है। इससे लोकतांत्रिक शासन की किसी भी संभावना पर भी रोक लग जाएगी। इसी तरह, यदि आरएसएफ जीतता है, तो देश के मिलिशिया– प्रभुत्व वाले देश बनने का खतरा है जो रूस और संयुक्त अरब अमीरात जैसे विदेशी समर्थकों पर बहुत अधिक निर्भर होगा। इन दोनों में से कोई भी नतीजा लंबे समय तक अस्थिरता और दीर्घकालिक विवाद पैदा कर सकता है। इनमें से किसी भी गुट की जीत से भारी संख्या में आम नागरिकों की जान जाएगी और इलाका बंट जाएगा। दोनों ही मामलों में संसाधनों के शोषण का सिलसिला जारी रहेगा।
तीसरी संभावित स्थिति यह हो सकती है कि सूडान संयुक्त राज्य के स्थायीकरण और शांति बनाने वाले मिशन के तहत अंतरराष्ट्रीय सरपरस्ती में आ जाए। इसके लिए बाहरी दखल, वर्तमान मिलिशिया संरचना को खत्म करना और संस्थानों को फिर से शुरू कर देश को चुनावों की ओर ले जाना होगा। हालांकि ऐसा लगता है कि यह शांति और सुलह की दिशा में एक व्यवस्थित मार्ग दे सकता है लेकिन ऐसे समाधान को दोनों हथियारबंद गुटों से विरोध का सामना करना पड़ सकता है और संप्रभुता को लेकर चिंताएं पैदा हो सकती हैं।
इसके अलावा, इसमें शामिल अंतरराष्ट्रीय पक्षों से बहुत वित्तीय एवं रसद समर्थन की आवश्यकता होगी। शायद सबसे चिंताजनक स्थिति आखिरी वाली है, जो सूडान का असल में अलग– अलग नियंत्रण वाले हिस्सों में बंटवारा है। इस स्थिति में, आरएसएफ दारफुर और कोर्डोफ़ान क्षेत्र पर अपना शासन मजबूत कर सकता है, और एसएएफ देश के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों में, जिसकी राजधानी खार्तूम है, अपना दबदबा बनाए रख सकता है।
निष्कर्ष
सूडान एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। सूडान में मौजूदा संघर्ष दशकों से चली आ रही राजनीति और कबायलीवाद के सैन्यीकरण का नतीजा है जिसे ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्तियों और सूडान के आधुनिक नेतृत्व ने बढ़ावा दिया। निमेरी से लेकर अल– ब़शीर तक की सरकारों और आगे चल कर संक्रमणकालीन अधिकारियों ने बार– बार कबायली सहायक सेनाओं को मजबूत किया और टूटी– फूटी सुरक्षा व्यवस्था में सुधार करने में नाकाम रहीं। इन सबने सूडान के वर्तमान संकट में योगदान दिया। एसएएफ और आरएसएफ के बीच टकराव इन ढांचागत कमियों का जारी रहना और उनका बढ़ना दोनों दिखाता है।
विदेशी ताकतों द्वारा अपने संसाधनों और रणनीतिक आवश्यकताओं के लिए लगातार दखल एवं शोषण के कारण यह युद्ध और भी जटिल एवं मुश्किल हो गया है। एक स्थायी समाधान के लिए मिलिशिया समूहों को पूरी तरह से खत्म करना और उनका पुनर्वास करना, क्षेत्रीय दखलअंदाजी कम करना और सूडान में नागरिक समाज संगठनों को मज़बूत करना ज़रूरी होगा। यह सवाल अभी भी अनिश्चित है कि सूडान को बचाया जा सकता है या नहीं, लेकिन भविष्य की राह इस बात पर निर्भर करती है कि यह समझा जाए कि लगातार विभाजन की कीमत एक स्थिर, सबको साथ लेकर चलने वाले और एकजुट सूडान को फिर से बनाने के लिए ज़रूरी निवेश से कहीं अधिक है।
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*अज़रा शाहाब, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
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