2000 के शुरुआती वर्षों से, तेज़ी से पिघलती बर्फ की वजह से दुनिया का ध्यान आर्कटिक की ओर गया है, क्योंकि इससे इसके संभावित संसाधनों तक पहुँच आसान हुई है और नए समुद्री मार्गों की संभावनाएँ बढ़ी हैं। आज, जब भू-राजनीति तीव्र हो रही है और आर्कटिक का अपवाद बने रहना कमजोर पड़ रहा है, भारत के पास वैज्ञानिक सहभागिता को भू-राजनीतिक प्रभाव में बदलने का एक सीमित अवसर है, साथ ही रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की ज़रुरत भी है। यह शोधपत्र तर्क देता है कि वैज्ञानिक कूटनीति और रणनीतिक स्वायत्तता के मार्गदर्शन में भारत ग्लोबल साउथ की आवाज़ के रूप में और प्रतिस्पर्धी आर्कटिक गुटों के बीच एक रचनात्मक सेतु के रूप में कार्य कर सकता है। यह शोधपत्र आर्कटिक में भू-राजनीतिक बदलावों, भारत की विकसित होती सहभागिता, और एक विश्वसनीय ‘इंडो-आर्कटिक’ भूमिका को आकार देने में आवश्यक बाहरी और आंतरिक रणनीति पर चर्चा करता है।
आर्कटिक भू-राजनीति
आर्कटिक गहरे पर्यावरणीय और रणनीतिक परिवर्तनों से गुजर रहा है, जो इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ा रहे हैं। तीन प्रवृत्तियाँ विशेष रूप से सामने आती हैं। पहली है ‘आर्कटिक अपवादवाद’ का अंत।[i] शीत युद्ध के बाद के अधिकांश काल में, आर्कटिक को सहयोग का ऐसा क्षेत्र माना जाता था जो व्यापक भू-राजनीतिक विवादों से अलग था।[ii] 2022 के रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद इसमें महत्वपूर्ण बदलाव आया है। अब आठ में से सात आर्कटिक देश नाटो के सदस्य हैं, जिससे रूस के सामने एक संगठित गुट बन गया है। अधिकांश परियोजनाओं पर रूस के साथ आर्कटिक परिषद के सहयोग के निलंबन ने परामर्श की स्थापित व्यवस्थाओं को और बाधित कर दिया है।[iii]
दूसरा, यह क्षेत्र नए संरेखणों के साथ बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का साक्षी बन रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी 2024 की आर्कटिक रणनीति के माध्यम से इस क्षेत्र को रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र तय किया है।[iv] रूस ने उच्च उत्तर में सैन्य और ऊर्जा से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ाया है, साथ ही ध्रुवीय रेशम मार्ग ढाँचे (पोलर सिल्क रोड फ्रेमवर्क) के तहत चीन के साथ साझेदारियों को गहरा किया है।[v] अब उभर रहे संरेखण पैटर्न क्षेत्रीय स्थिरता, संकट प्रबंधन और शासन की निरंतरता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करते हैं। साथ ही, नॉर्डिक देशों, विशेष रूप से नॉर्वे, ने एक अधिक सूक्ष्म रुख व्यक्त किया है। नॉर्वे की 2025 की अद्यतन उच्च उत्तर रणनीति जलवायु अनुसंधान, स्वदेशी साझेदारियों और कम-तनाव सहयोग को नॉर्वे के उच्च उत्तर दृष्टिकोण के घटकों के रूप में प्राथमिकता देती है।[vi] रणनीति की एक पंक्ति को उद्धृत करें तो, “रूस के प्रति नॉर्वे की नीति व्यवहारिकता, हितों और सहयोग पर आधारित है।” इसलिए नॉर्डिक दृष्टिकोण रणनीतिक गहराई जोड़ता है, यह याद दिलाते हुए कि आर्कटिक निरंतर विज्ञान कूटनीति, सतत संसाधन शासन और कम-उत्कर्ष सहभागिता का भी एक क्षेत्र है। यह नॉर्डिक रुख भारत के ‘साइंस-फर्स्ट’ दृष्टिकोण के साथ स्वाभाविक रूप से मेल खाता है, यह संकेत देता है कि नई दिल्ली संवाद के मार्गों और सहयोगी अनुसंधान को बनाए रखने में मदद कर सकती है, भले ही महाशक्ति संबंध तनावग्रस्त बने रहें।
अंतिम, हाल के वर्षों में गैर-आर्कटिक देशों की ओर से आर्कटिक में बढ़ती रुचि देखी गई है। कम से कम 15 गैर-आर्कटिक सरकारों ने, फ़ैरो द्वीपों और यूरोपीय संघ के साथ मिलकर, औपचारिक रूप से आर्कटिक या ध्रुवीय नीति/रणनीति दस्तावेज़ अपनाए हैं।[vii] कई एशियाई पर्यवेक्षक देशों ने आर्कटिक के साथ अपनी सहभागिता को वैज्ञानिक अनुसंधान से आगे बढ़ाकर आर्कटिक शासन तंत्रों में सक्रिय भागीदारी तक विस्तारित किया है, विशेष रूप से पर्यवेक्षक भूमिकाओं और कार्य समूहों के माध्यम से।[viii] संलग्न हितधारकों की यह बढ़ती सूची एक मूलभूत सत्य को रेखांकित करती है, उच्च उत्तर अब वैज्ञानिक, पर्यावरणीय, वाणिज्यिक और रणनीतिक रूप से एक वैश्विक चिंता बन चुका है। ये प्रवृत्तियाँ सामूहिक रूप से उच्च उत्तर के सहयोगी परिधि से एक रणनीतिक सीमांत में रूपांतरण को चिह्नित करती हैं।[ix]
आर्कटिक भू-राजनीति पर एशियाई गैर-आर्कटिक देशों (बाहरी देशों) का दृष्टिकोण[x]
गैर-आर्कटिक देशों (बाहरी देशों) के आर्कटिक में अलग-अलग हित और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ हैं, जिससे उनके व्यापक रणनीतिक उद्देश्य तय होते हैं।[xi] अधिकांश गैर-आर्कटिक देशों के लिए, विज्ञान आर्कटिक सहयोग का प्रमुख आधार है। राष्ट्रों के इस समूह में, एशियाई देश आर्कटिक क्षेत्र के साथ सबसे अधिक जुड़े हुए के रूप में उभरे हैं।[xii] यह क्षेत्र के साथ उनकी सहभागिता और वहाँ उनकी वैधता का मुख्य आधार बना हुआ है। चीन की आर्कटिक में बढ़ती रुचि, हालांकि इसे वैज्ञानिक और सतत के रूप में पेश किया जाता है, क्षेत्रीय सुरक्षा और शासन का स्पष्ट निहितार्थ रखती है।[xiii] जापान और दक्षिण कोरिया के लिए, यूरोप तक नए नौवहन मार्गों का खुलना और जलवायु संबंधी चिंताएँ आर्कटिक के साथ जुड़ने के प्रमुख कारक हैं।[xiv] भारत के लिए, ध्यान इस पर रहा है कि आर्कटिक में होने वाले परिवर्तन भारतीय मानसून, जलवायु परिवर्तनशीलता और इसके परिणामस्वरूप कृषि व मत्स्य पालन को कैसे प्रभावित करते हैं। चीन के विपरीत, जिसकी आर्कटिक क्षेत्र में व्यापार और रणनीति का संयोजन लगातार बढ़ रहा है, भारत की सहभागिता मुख्यतः विज्ञान-आधारित और जलवायु-केंद्रित बनी हुई है, जो जापान व दक्षिण कोरिया के अधिक तुलनीय है, लेकिन इसकी अपनी ग्लोबल साउथ पहचान से आकार लेती है। व्यापक वैश्विक देशों के लिए, आर्कटिक का महत्व इस बात में निहित है कि यह जलवायु और भू-राजनीतिक क्षेत्र में क्या संकेत देता है। इस व्यापक एशियाई बाहरी स्पेक्ट्रम के भीतर, भारत अपने जलवायु-प्रेरित, ग्लोबल साउथ से प्रभावित, तटस्थ दृष्टिकोण के कारण विशिष्ट रूप से सामने आता है।
भारत और आर्कटिक
आर्कटिक क्षेत्र भारत के लिए नया नहीं है। हालांकि, 1920 में स्वालबार्ड संधि पर हस्ताक्षर के साथ भारत का आर्कटिक से संबंध स्थापित हुआ था, लेकिन आर्कटिक के साथ औपचारिक सहभागिता 2007 में स्वालबार्ड हेतु पहले अभियान के साथ शुरू हुई।[xv] भू-राजनीतिक रूप से, आर्कटिक में भारत की रुचि बढ़ी है, और 2013 में औपचारिक सहभागिता तब और तेज़ हुई जब भारत को आर्कटिक परिषद में पर्यवेक्षक का दर्जा मिला।[xvi] 2022 में जारी भारत की आर्कटिक नीति इस क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान, जलवायु संरक्षण और सतत विकास के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।[xvii] भारत की उपस्थिति न्य-ऑलेसुंड[xviii] में हिमाद्री अनुसंधान स्टेशन (2008 से कार्यरत) और 2014 में कोंग्सफियोर्डन में स्थापित अंडरवाटर इंडआर्क[xix] ऑब्जर्वेटरी के माध्यम से सुदृढ़ हुई है, जिसमें दोनों से ही आर्कटिक से जुड़े दीर्घकालिक आँकड़े उत्पन्न कर रहे हैं। भारत के लिए, आर्कटिक की शुरुआत एक दूरस्थ भूगोल के रूप में हुई थी, लेकिन जलवायु परस्पर-निर्भरता इसे निकट ला रही है, जिससे एक बाहरी देश की जिज्ञासा पड़ोसी की ज़िम्मेदारी में बदल रही है। जैसे-जैसे भारत की आर्कटिक सहभागिता में वैज्ञानिक जिज्ञासा से आगे बढ़कर क्षेत्र के विकसित होते परिदृश्य शामिल होने लगा है, उसे इस क्षेत्र के प्रति अपने रणनीतिक दृष्टिकोण को सावधानीपूर्वक संचालित करना होगा।
भारत को आर्कटिक में कैसे नेविगेट करना चाहिए?
आर्कटिक भू-राजनीति में भारत की सहभागिता उसकी विकसित होती वैश्विक भूमिका और सभ्यतागत लोकाचार का एक स्वाभाविक विस्तार है, जिसकी जड़ें वसुधैव कुटुम्बकम् के दर्शन अर्थात् ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य। में निहित हैं।[xx] भारत के लिए, आर्कटिक प्रतिस्पर्धी महत्वाकांक्षाओं का युद्धक्षेत्र नहीं, बल्कि एक साझा जलवायु सीमांत है, जहाँ टकराव से अधिक सहयोग को प्रमुखता मिलनी चाहिए। हालांकि, वर्तमान आर्कटिक भू-राजनीति वैज्ञानिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं को अक्सर पीछे छोड़ देती है, फिर भी भारत का दृष्टिकोण विज्ञान, रणनीतिक संतुलन, अंतरराष्ट्रीय क़ानून और समावेशी बहुपक्षवाद में दृढ़ता से निहित रहना चाहिए। उसे सहभागिता का एक सिद्धांत-आधारित मॉडल प्रस्तुत करना चाहिए, जो सहयोग, सतत विकास व वैश्विक समानता को प्राथमिकता देता हो। नीति को उपस्थिति में बदलने के लिए, भारत को दो-आयामी रणनीति - एक बाहरी और एक आंतरिक रुख अपनानी होगी।
बाहरी रुख के अंतर्गत भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह आर्कटिक मामलों में अधिक बड़ी भूमिका निभाए, ताकि एक जिम्मेदार आर्कटिक हितधारक के रूप में उसकी छवि सुदृढ़ हो। वह यह काम चार संभावित माध्यमों से कर सकता है। पहला, वैश्विक हितों वाली एक जिम्मेदार उभरती शक्ति के रूप में, भारत आर्कटिक-7 (ए7) और रूस दोनों के साथ जुड़कर वार्ता और संवाद हेतु एक सेतु की भूमिका निभा सकता है। भारत का आर्कटिक दृष्टिकोण रणनीतिक स्वायत्तता में निहित है, जिससे उसे किसी भी गुट के साथ संरेखित हुए बिना सभी आठ आर्कटिक देशों के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ने की सुविधा मिलती है। अधिकांश पर्यवेक्षकों के विपरीत, भारत ए7 और रूस दोनों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखता है, जिससे उसे एक ध्रुवीकृत क्षेत्र में एक तटस्थ सेतु के रूप में विश्वसनीय भूमिका मिलती है। यह संतुलित कूटनीति भारत को वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देने, संवाद को सुगम बनाने तथा उस सहयोगात्मक भावना को फिर से शुरु करने में सहायता करने की स्थिति में रखती है, जिसने कभी आर्कटिक शासन को परिभाषित किया था। एक नाज़ुक और गर्म होते आर्कटिक में, भारत का सबसे बड़ा योगदान प्रतिस्पर्धा करने के बजाय जोड़ने की उसकी क्षमता हो सकती है। उदाहरण के लिए, भारत एनसीपीओआर के तत्वावधान में गोवा में एक वार्षिक ‘इंडो-आर्कटिक विज्ञान संवाद’ की मेज़बानी कर सकता है, जिसमें ए7 और रूसी शोधकर्ताओं को एक तटस्थ, जलवायु-केंद्रित एजेंडा के अंतर्गत एक साथ लाया जाए।
दूसरा, भारत ग्लोबल साउथ की एक अग्रणी आवाज़ है, जिसने तीन वर्चुअल ग्लोबल साउथ की आवाज़ शिखर सम्मेलनों (जनवरी 2023, नवंबर 2023 और अगस्त 2024)[xxi] की मेज़बानी की है, जिससे उसने स्वयं को विकासशील देशों के दृष्टिकोणों के लिए एक मंच के रूप में स्थापित किया है।[xxii] भारत उच्च उत्तर तक ग्लोबल साउथ की चिंताओं को उजागर कर सकता है। इसलिए भारत की आर्कटिक सहभागिता में ग्लोबल साउथ का दृष्टिकोण भी परिलक्षित होना चाहिए। आर्कटिक के गर्म होने से समुद्र स्तर में वृद्धि, मानसून की अस्थिरता और अत्यधिक मौसम के जोखिम बढ़ रहे हैं, ऐसे में भारत संवेदनशील देशों की जलवायु समानता से जुड़ी चिंताओं को स्पष्ट रूप से पेश कर सकता है। चीन की तरह एक प्रतिद्वंद्वी शक्ति के रूप में आर्कटिक में प्रवेश करने के बजाय, भारत रचनात्मक सहभागिता का मॉडल पेश कर सकता है, यह दिखाते हुए कि कोई विकासशील देश विज्ञान, सहयोग और जलवायु-प्रथम कूटनीति के माध्यम से कैसे योगदान देता है। ऐसा करते हुए, भारत की आवाज़ केवल राष्ट्रीय नहीं रहती, बल्कि विकासशील विश्व के बड़े हिस्से की प्रतिनिधि बन जाती है। इस दिशा में, नई दिल्ली अफ्रीका, एशिया और छोटे द्वीपीय देशों में तटीय और कृषि संबंधी संवेदनशीलताओं के साथ आर्कटिक जलवायु विज्ञान को जोड़ने हेतु एक ‘ग्लोबल साउथ आर्कटिक मंच’ का आयोजन कर सकती है।
तीसरा, आर्कटिक में रूस के साथ चीन की सहभागिता को लेकर बढ़ती चिंता है।[xxiii] जैसे-जैसे रूस अपनी आर्कटिक योजनाओं को आगे बढ़ा रहा है और पश्चिम से और अधिक दूर होता जा रहा है, वह बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा परियोजनाओं को बनाए रखने हेतु बाहरी साझेदारों पर लगातार अधिक निर्भर होता जा रहा है।[xxiv] चीन प्रमुख सहयोगी के रूप में उभरा है, जो विशेष रूप से यामल एलएनजी और आर्कटिक एलएनजी-2 जैसी परियोजनाओं के ज़रिए पूँजी, लॉजिस्टिक्स और पोत निर्माण क्षमता प्रदान कर रहा है।[xxv] फिर भी, यह बढ़ती निर्भरता मास्को में रणनीतिक असहजता भी उत्पन्न करती है, क्योंकि क्षेत्र में चीन की दीर्घकालिक महत्वाकांक्षाएँ स्पष्ट हैं। भारत एक विश्वसनीय विविधीकरण विकल्प पेश करता है, चीन के प्रतिस्पर्धी के रूप में नहीं, बल्कि एक तटस्थ, विज्ञान-केंद्रित साझेदार के रूप में, जिसकी ऊर्जा ज़रुरतें बढ़ रही हैं लेकिन उच्च उत्तर में कोई वर्चस्ववादी रुख नहीं है। तकनीकी सहयोग, पर्यावरणीय निगरानी और संयुक्त अनुसंधान को बढ़ाकर, भारत रूस को किसी एक साझेदार पर अत्यधिक निर्भरता से हटने का एक विविधीकृत विकल्प प्रदान कर सकता है, साथ ही व्यावहारिक, जलवायु-केंद्रित सहयोग के ज़रिए अपनी स्वयं की आर्कटिक सहभागिता को भी आगे बढ़ा सकता है।
अंत में, भारत को ‘इंडो-आर्कटिक’ को वास्तविकता बनाना होगा। इंडो-आर्कटिक शब्द इंडो-पैसिफिक के समानांतर एक समयोचित अवधारणा पेश करता है, लेकिन एक भिन्न उद्देश्य के साथ। यदि इंडो-पैसिफिक समुद्री संपर्क और सुरक्षा से जुड़ा है, तो इंडो-आर्कटिक जलवायु परस्पर-निर्भरता, वैज्ञानिक अनुसंधान और अध्ययन में साझेदारी तथा भारत और आर्कटिक क्षेत्र के बीच साझा संरक्षकता से संबंधित है। यह एक नई वास्तविकता को दर्शाता है, जहाँ आर्कटिक अब भारत के हितों हेतु कम महत्वूर्ण नहीं रह गया है। इंडो-आर्कटिक का आधार भूगोल में नहीं, बल्कि सिद्धांत-आधारित सहभागिता, सहयोग व वैश्विक ज़िम्मेदारी में निहित है। यदि इंडो-पैसिफिक ने 20वीं सदी की रणनीतिक सोच को आकार दिया, तो इंडो-आर्कटिक 21वीं सदी की जलवायु कल्पना को परिभाषित कर सकता है। इंडो-आर्कटिक को व्यवहार में लाने हेतु भारत को नॉर्डिक और आर्कटिक प्रशांत तटीय देशों के साथ संरचित अनुसंधान साझेदारियाँ विकसित करनी होंगी और वैज्ञानिक तथा कूटनीतिक मंचों पर ‘इंडो-आर्कटिक’ ढाँचे को निरंतर आगे बढ़ाना होगा। इसलिए इंडो-आर्कटिक दृष्टिकोण भारत के आर्कटिक को दूर से देखने से लेकर उसे जलवायु नियति में एक जुड़े हुए पड़ोसी के रूप में अपनाने की ओर संक्रमण को चिह्नित करता है। फिर भी, ये बाहरी भूमिकाएँ तब तक काफी हद तक आकांक्षात्मक ही रहेंगी, जब तक भारत उन्हें बनाए रखने के लिए संस्थागत और परिचालन आधार का निर्माण नहीं करता।
बाहरी रुख के अलावा, भारत की आर्कटिक रणनीति आंतरिक तैयारी पर भी केंद्रित है। भारत की आर्कटिक नीति छह स्तंभों पर आधारित है, अर्थात्: विज्ञान एवं अनुसंधान; जलवायु एवं पर्यावरण संरक्षण; आर्थिक व मानव विकास; परिवहन व संपर्क; शासन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग; तथा राष्ट्रीय क्षमता सृजन।[xxvi] इन सभी को पूरी तरह से साकार करने के लिए, भारत को मुख्यतः विज्ञान को अहम मानते हुए एक व्यापक बहु-आयामी ढाँचे की ओर आगे बढ़ना होगा। नीति से कार्यान्वयन की यह प्रक्रिया ऐसे प्रमुख सक्षमकर्ताओं के विकास की मांग करती है, जो ‘इंडो-आर्कटिक विज़न’ का समर्थन कर सकें।
यह बदलाव चार चीजों के ज़रिए समझा जा सकता है, जो बाहरी के दृष्टिकोण को दूरस्थ पड़ोसी की प्रतिबद्धता में परिवर्तित करते हैं: -
a. देश के भीतर और बाहर सुदृढ़ प्रशासन।
सबसे महत्वपूर्ण सक्षमकर्ता सुदृढ़ प्रशासन है, क्योंकि यह एक प्रभावी आर्कटिक रुख हेतु अनिवार्य शर्त है और इसमें आंतरिक तथा बाहरी दोनों प्रकार का समन्वय शामिल है। आंतरिक समन्वय की दिशा में, भारत की 2022 की आर्कटिक नीति ने अपनी कार्य योजना हेतु शासन और समीक्षा तंत्र के रूप में एक अंतर-मंत्रालयी “सशक्त आर्कटिक नीति समूह (ईएपीजी)” की स्थापना की, जिसमें कम से कम 18 मंत्रालयों और एजेंसियों के अधिकारियों को एक साथ लाया गया और उन्हें आर्कटिक नीति के प्रत्येक स्तंभ हेतु समय-सीमा, बजट और उपलब्धियों को निर्धारित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। अतः देश के भीतर, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अंतर्गत राष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा परिषद के तत्वावधान में, सशक्त आर्कटिक नीति समूह विभिन्न एजेंसियों के बीच सहयोग, समन्वय व साझेदारी सुनिश्चित करता है। सशक्त आर्कटिक नीति समूह भारत की आर्कटिक नीति और विकसित होती इंडो-आर्कटिक दृष्टि के संबंध में इसमें भाग लेने वाले मंत्रालयों द्वारा किए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय संपर्क का पर्यवेक्षण भी कर सकता है।
b. क्षमता विकास - एसएमईज़ का एक समूह प्रशिक्षित करना
दूसरा, क्षमता विकास भारत की आर्कटिक सहभागिता के लिए अनिवार्य है, यदि इसे अपनी आकांक्षात्मक रणनीति से आगे बढ़कर टिकाऊ परिचालन क्षमताओं में विकसित होना है। एक सशक्त अंतर-मंत्रालयी ढाँचा, जो घरेलू स्तर पर सुदृढ़ हो और बाहरी कूटनीतिक तंत्रों के ज़रिए समन्वित हो, नीति की निरंतरता, संसाधन आवंटन में दक्षता व बहुपक्षीय ध्रुवीय मंचों पर एक सुव्यवस्थित स्वर सुनिश्चित करेगा। इस दिशा में, गोवा इन प्रयासों के राष्ट्रीय समेकन बिंदु का कार्य करने के लिए एक विशिष्ट रूप से अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इस राज्य में पहले से ही राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र (एनसीपीओआर) है, जो अंटार्कटिक और आर्कटिक अभियानों के लिए भारत की आधिकारिक नोडल एजेंसी और प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है। इसे एक सुदृढ़ वैज्ञानिक एवं समुद्री आधार का समर्थन प्राप्त है, जिसमें सीएसआईआर-राष्ट्रीय महासागर विज्ञान संस्थान (एनआईओ), राष्ट्रीय जलमापन संस्थान (एनआईएच), और नौसेना युद्ध महाविद्यालय (एनडब्ल्यूसी) शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक वैज्ञानिक-रणनीतिक स्पेक्ट्रम में पूरक विशेषज्ञता का योगदान देता है। गोवा को भारत की “ध्रुवीय राजधानी” के रूप में ब्रांड करना इस समन्वय को संस्थागत रूप देगा। एक दृश्यमान, सघन “ध्रुवीय राजधानी” वैश्विक ध्रुवीय मामलों में भारत की गंभीरता को प्रदर्शित करेगी, उसके इंडो-पैसिफिक प्रोफ़ाइल को एक विश्वसनीय इंडो-आर्कटिक के साथ-साथ इंडो-अंटार्कटिक आयाम से संतुलित करते हुए।
भारत को एक विश्वसनीय आर्कटिक हितधारक के रूप में मान्यता दिलाने हेतु उसे वैज्ञानिकों, रणनीतिकारों, राजनयिकों, नौसैनिक व कानूनी विशेषज्ञों सहित आर्कटिक-साक्षर पेशेवरों का एक मजबूत समूह तैयार करना होगा, जो बहुपक्षीय मंचों पर राष्ट्रीय हितों को स्पष्ट रूप से पेश करने और उन्हें क्रियान्वयन योग्य परिणामों में बदलने में सक्षम हों। वर्तमान में, हालांकि, भारत का संस्थागत आधार सीमित बना हुआ है। मध्य-2025 तक, भारत के केवल पाँच विश्वविद्यालय आर्कटिक विश्वविद्यालय के सदस्य हैं, जो भारत के एक हज़ार से अधिक उच्च शिक्षा संस्थानों वाले परिदृश्य को देखते हुए एक चौंकाने वाला आँकड़ा है।[xxvii] यह एक सीमित शैक्षणिक और प्रशिक्षण पाइपलाइन को दर्शाता है, जिसे यदि भारत को आर्कटिक मामलों में पर्यवेक्षक से प्रभावशाली भूमिका की ओर बढ़ना है, तो तेज़ी से विस्तारित करना होगा। मानव पूंजी, अर्थात् क्षमता सृजन के ज़रिए, भविष्य की किसी भी आर्कटिक सहभागिता का रणनीतिक आधार है। इसलिए प्रशिक्षण को केवल अनुपालन की आवश्यकता के रूप में नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संपत्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। जैसे-जैसे तेज़ी से पीछे हटती समुद्री बर्फ उत्तरी समुद्री मार्ग और अन्य ट्रांस-आर्कटिक गलियारों के साथ नौवहन योग्य अवधि को बढ़ा रही है, जलवायु मॉडल संकेत देते हैं कि इस सदी के मध्य तक मानक पोत इन जलक्षेत्रों में लगभग दोगुने समय तक संचालित हो सकेंगे।[xxviii] इसलिए भारत को अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन के ध्रुवीय संहिता के अंतर्गत प्रमाणित अधिकारियों का एक दल तैयार करना होगा, जिसे ध्रुवीय न्यायक्षेत्रों में पारंगत पर्यावरणीय और समुद्री क़ानून विशेषज्ञों का समर्थन प्राप्त हो, तथा ऐसे वार्ताकार भी हों जो स्वदेशी अधिकारों, मत्स्य प्रबंधन व आर्कटिक शासन तंत्रों में दक्ष हों।
c. क्षमता सृजन - अवसंरचना का विकास
तीसरा, पूरे वर्ष आर्कटिक में उपस्थिति बनाये रखने हेतु क्षमता सृजन आवश्यक है। इसलिए भारत को आइस-क्लास अनुसंधान पोत और एक समर्पित ध्रुवीय-श्रेणी का आइसब्रेकर चाहिए होगा। वर्तमान में भारत के पास कोई भी आइस-क्लास पोत या आइसब्रेकर नहीं है; हर आर्कटिक अभियान हेतु विदेशी टनभार को चार्टर करना पड़ता है, जिससे नौवहन की समय-सीमा सीमित होती है और लागत बढ़ जाती है। हालांकि, राष्ट्रीय ध्रुवीय और महासागर अनुसंधान केंद्र को 2023 में डीपी-2 डायनामिक पोज़िशनिंग वाले एक ध्रुवीय अनुसंधान पोत के लिए मंत्रिमंडल की स्वीकृति मिल गई थी, लेकिन यह परियोजना अभी भी अनुबंध-पूर्व वार्ताओं के चरण में है, और इसकी सबसे प्रारंभिक डिलीवरी तिथि 2028-29 बताई जा रही है।[xxix] हालांकि, चूँकि अभी तक इसकी शुरुआत नहीं हो सकी है, इसलिए डिलीवरी में और विलंब हो सकता है। समय-सीमा को कम करने के लिए, भारत को आइस नेविगेशन में विशेषज्ञता प्राप्त करने हेतु किसी पोत को पट्टे पर लेना होगा।
d. ध्रुवीय सहभागिता के लिए परिचालन तत्परता
अंततः, उपर्युक्त सभी प्रयासों का मुख्य लक्ष्य ध्रुवीय अभियानों के लिए तत्परता है। भारत अपनी आर्कटिक नीति को वास्तविक ध्रुवीय अभियानों में तभी रूपांतरित कर सकता है, जब वह आर्कटिक के उत्तर में अपने स्वयं के जहाज़ों का संचालन, नौवहन और अनुरक्षण करने में सक्षम हो। इसके लिए आवश्यक मूलभूत घटक अभी भी अनुपस्थित हैं। भारत के पास विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा समुद्री कार्यबल है, वर्ष 2023 में लगभग 2,85,000 सक्रिय नाविक, फिर भी इनमें से 600 से भी कम के पास बुनियादी या उन्नत आइस-नेविगेशन में ध्रुवीय संहिता प्रमाणपत्र हैं, जो कुल का 0.25 प्रतिशत से भी कम है।[xxx] इसलिए डीजी शिपिंग ने प्रशिक्षण संस्थानों से अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन द्वारा अनुमोदित ध्रुवीय संहिता पाठ्यक्रमों का विस्तार करने का आग्रह किया है, और 2023 में नई दिल्ली ने रूस के एडमिरल नेवेल्स्कॉय समुद्री विश्वविद्यालय के साथ भारतीय डेक अधिकारियों के लिए सिम्युलेटर-आधारित आर्कटिक मॉड्यूल चलाने हेतु एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।[xxxi] जब तक यह अंतर खत्म नहीं होता, भारत को प्रत्येक ध्रुवीय यात्रा के लिए विदेशी क्रू या तदर्थ चार्टर पर निर्भर रहना होगा। नौसेना इस संक्रमण को पाटने में सहायता कर सकती है। वह पहले से ही ओएनजीसी, एनपीओएल, डीआरडीओ और एनटीआरओ के लिए जहाज़ों का संचालन और समर्थन करती है। जब भू विज्ञान मंत्रालय अपने नियोजित ध्रुवीय अनुसंधान पोत की डिलीवरी प्राप्त कर लेगा या उसे पट्टे पर लेगा, तब नौसेना उद्घाटन दल प्रदान कर सकती है। यह व्यवस्था नौसैनिक कर्मियों को बर्फिली जगहों पर प्रत्यक्ष अनुभव देगी, साथ ही वैज्ञानिकों को एक विश्वसनीय, भारतीय ध्वज वाले मंच की उपलब्धता सुनिश्चित करेगी। आर्कटिक क्षेत्रों में नॉर्डिक देशों और ट्रोम्सो तथा रेक्याविक जैसे बंदरगाहों पर भारतीय नौसैनिक जहाज़ों की यात्राएँ और पोर्ट कॉल मज़बूत कूटनीतिक संबंधों को प्रोत्साहित करेंगी, और आर्कटिक तटीय क्षेत्रों में भारत की समुद्री उपस्थिति को शांतिपूर्वक सुदृढ़ करेंगी।
सिफ़ारिशें
विज्ञान, रणनीतिक स्वायत्तता और जलवायु संरक्षकता पर आधारित भारत का आर्कटिक दृष्टिकोण दिशात्मक रूप से सुदृढ़ है। किंतु उपस्थिति को प्रभाव में बदलने की उसकी क्षमता तीन नीतिगत प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगी:
a. क्षमता विकास में तेज़ी लाएँ
भारत को विदेशी चार्टर पर निर्भरता कम करनी चाहिए और ध्रुवीय अनुसंधान पोत को शीघ्रता से आगे बढ़ाना चाहिए, साथ ही क्रू, वैज्ञानिकों और अभियानों के नेतृत्वकर्ताओं के स्तर पर स्वदेशी ध्रुवीय-परिचालन विशेषज्ञता विकसित करनी चाहिए। स्थायी क्षमता, न कि छिटपुट उपस्थिति, ही विश्वसनीयता को परिभाषित करेगी।
b. संतुलित भू-राजनीतिक रुख बनाए रखना
आर्कटिक-7 और रूस के बीच एक रचनात्मक सेतु के रूप में भारत की भूमिका को यथार्थवाद के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए। रूस–पश्चिम के बीच बढ़ते तनाव के माहौल में, भारत की तटस्थता कुछ सीमाएँ लेकर आती है, जिन्हें स्पष्ट पक्षधरता के बजाय संतुलित कूटनीति के माध्यम से साधना होगा।
c. दूरदर्शिता के साथ रणनीतिक जोखिमों का प्रबंधन करना
जैसे-जैसे चीन रूस के साथ ध्रुवीय सहयोग को गहरा कर रहा है, भारत को बदलते आर्कटिक शक्ति समीकरण में हाशिए पर जाने से बचने के लिए रूस और पश्चिम दोनों के साथ द्विपक्षीय सहयोग को सक्रिय रूप से आकार देना चाहिए। सहभागिता विज्ञान-नेतृत्वित, ग्लोबल साउथ के प्रति सजग, पारदर्शी और स्वायत्तता-संरक्षणकारी बनी रहनी चाहिए, ताकि भविष्य के ध्रुवीय ढाँचों में भारत को अलग-थलग न किया जा सके।
निष्कर्ष - पूर्वविचार के लिए आह्वान
आर्कटिक पहले से ही एक गहरे परिवर्तन से जूझ रहा है, एक जलवायु परिवर्तन से, जिसके अपने आप में तात्कालिक अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ज़रुरत है। आर्कटिक की सहनशीलता की दो बार परीक्षा नहीं ली जानी चाहिए। ये बदलती प्रवृत्तियाँ स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि गैर-आर्कटिक देशों को पहले की तुलना में आर्कटिक के साथ अधिक जुड़ाव की आवश्यकता है। आर्कटिक भू-राजनीति के प्रति भारत का दृष्टिकोण संतुलित और भविष्य के विज़न वाला बना रहना चाहिए, जो विज्ञान में निहित हो, कूटनीति द्वारा निर्देशित हो और स्थिरता पर केंद्रित हो। आर्कटिक में भारत भूगोल की दृष्टि से भले ही एक बाहरी हो, लेकिन साझा ज़िम्मेदारी में वह एक दूरस्थ पड़ोसी है और एक साझा दृष्टि के कारण एक महत्वपूर्ण पड़ोसी भी है।
*****
(लेखक भारतीय नौसेना में सेवारत एक कमोडोर हैं और वर्तमान में नेवल वॉर कॉलेज में पदस्थ हैं। वह आर्कटिक भू-राजनीति और भारत की आर्कटिक रणनीति पर केंद्रित एक शोधार्थी हैं।)
[i] Pavel Devyatkin, "Arctic Exceptionalism: A Narrative of Cooperation and Conflict from Gorbachev to Medvedev and Putin," Polar Journal 13, no. 2 (October 2023): 336–57
[ii] Roza Laptander, "From Gorbachev's Murmansk Speech to the Present: 37 Years of International Collaboration in Northern Russia," in A Fractured North: Journeys on Hold (Fürstenberg: Kulturstiftung Sibirien, 2024), 15–18.
[iii] U.S. Department of State, "Joint Statement on Arctic Council Cooperation Following Russia's Invasion of Ukraine," March 3, 2022.
[iv] 2024 Department of Defense Arctic Strategy, 2024.
[v] Elizabeth Buchanan, Red Arctic: Russian Strategy Under Putin (Brookings Institution Press, 2023),
[vi] Ministry of Foreign Affairs, The Norwegian government’s High North Strategy. Aug 2025.
[vii] Lassi Heininen, An Arctic Boom of Policies & Strategies: 32 and Counting, 2020.
[viii] Andrew E. D'Ami and Michael E. Jones, "Outsiders Wanting In: Asian States and Arctic Governance," Belfer Center, July 7, 2023.
[ix] Elizabeth Buchanan, "China's Arctic Strategy: Military and Security Implications," Asia Policy 15, no. 2 (2020): 65–70.
[x] The term ‘Outsiders’ is taken from the title of one of the panel discussions of the Arctic Security Conference 25 (ASC25) organized by FNI and held at Oslo, Norway in Sep 2025 where in all non- arctic states were called ‘outsiders’.
[xi] Evan T. Bloom, “The Rising Importance of Non-Arctic States in the Arctic,” The Wilson Quarterly 46, no. 1 (Winter 2022)
[xii] Lassi Heininen and James Kraska, "The Arctic Council and Asian Observers: A Call for Enhanced Cooperation," The Arctic Institute, June 6, 2023.
[xiii] “Geopolitical Competition in The Arctic Circle,” Harvard International Review, December 2, 2020, https://hir.harvard.edu/the-arctic-circle/.
[xiv] Nong Hong, “Non-Arctic States’ Role in the High North: Participating in Arctic Governance through Cooperation,” in Marine Biodiversity of Areas beyond National Jurisdiction, ed. Myron H. Nordquist and Ronán Long (Brill | Nijhoff, 2021), https://doi.org/10.1163/9789004422438_017.
[xv]“Spitsbergen Treaty 1920, Archived,” accessed March 25, 2024, https://web.archive.org/web/20170702183404/http://emeritus.lovdata.no/traktater/texte/tre-19200209-001.html and Press Information Bureau, Government of India, Ministry of Earth Sciences, “Research Stations in the Arctic and Antarctica,” August 12, 2013, https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID
[xvi] U. Sinha, “India in the Arctic: A Multidimensional Approach,” Vestnik of Saint Petersburg University: International Relations 12, no. 1 (2019): 113–26, https://doi.org/10.21638/11701/spbu06.2019.107.
[xvii] Northern (Arctic) Federal University named after M. V. Lomonosov et al., “India’s Arctic Policy: The Historical Context,” Arctic and North, no. 48 (September 2022): 48, https://doi.org/10.37482/issn2221-2698.2022.48.261. and India’s Arctic Policy: Building a Partnership for Sustainable Development, directed by IIC Programmes, 2022, 1:10:20, https://www.youtube.com/watch?v=mWw3RvAj8bk.
[xviii] Ministry of Earth Sciences (MoES). Himadri Arctic Research Station – Establishment Report, New Delhi, 2022.
[xix] T. Nandakumar, “India’s Arctic Observatory to Aid Climate Change Studies: Will Help Understand Influences on Monsoon System,” The Hindu (Thiruvananthapuram), September 13, 2014, 4:16 p.m. IST.
[xx] India in the New World Order: The Changing Contours of Her Foreign Policy Under Narendra Modi, Raj Kumar Kothari, Indian Journal of Asian Affairs, Vol. 33, No. 1/2 (JUNE-DECEMBER 2020) , pp. 134-136 (3 pages)
[xxi] Ministry of External Affairs, Government of India, "The 3rd Voice of Global South Summit 2024," press release, August 14, 2024, https://www.mea.gov.in/press- releases.htm?dtl/38161/The_3rd_Voice_of_Global_South_Summit_2024.
[xxii] “Voice of Global South Summit 2023 | Ministry of External Affair,” accessed July 3, 2025, https://www.mea.gov.in/voice-of-global-summit.htm.
[xxiii] Nima Khorrami, "China's Arctic Strategy and Hybrid Warfare: Targeting Governance and Strategic Responses," The Arctic Institute, December 9, 2025; and Elena V. Gladun and Evgeny V. Zabusov, "The Polar Silk Road and the future governance of the Northern Sea Route," Leiden Journal of International Law 36, no. 1 (2023): 23-45.
[xxiv] Papageorgiou, M., & Vysotskaya Guedes Vieira, A. (2024). Assessing the Changing Sino–Russian Relationship: A Longitudinal Analysis of Bilateral Cooperation in the Post-Cold War Period. Europe-Asia Studies, 76(4), 632–658. https://doi.org/10.1080/09668136.2023.2276677
[xxv] ONGC Videsh Limited, "Annual Report 2023-24," (New Delhi: ONGC, 2024), 88; and Nidhi Verma, "India's ONGC Retains 20% stake in Russia's Sakhalin-1 Project," Reuters, December 5, 2025.
[xxvi] Ministry of Earth Sciences (India), India's Arctic Policy: Building a Partnership for Sustainable Development (New Delhi: Government of India, 2022), https://www.mospi.gov.in.
[xxvii] “Members,” UArctic – University of the Arctic, accessed June 21, 2025, https://www.uarctic.org/members/.
[xxviii] Mohamed Rami Mahmoud, Mahmoud Roushdi, and Mostafa Aboelkhear, “Potential Benefits of Climate Change on Navigation in the Northern Sea Route by 2050,” Scientific Reports 14, no. 1 (February 2, 2024): 2771, https://doi.org/10.1038/s41598-024-53308-5.
[xxix] “NCPOR Is Acquiring a New Ocean Research Vessel for Deep Ocean Exploration,” Press Information Bureau, accessed June 21, 2025, https://www.pib.gov.in/www.pib.gov.in/Pressreleaseshare.aspx?PRID=2033981.
[xxx] Dr Deepak Shetty Former Director General, Shipping in his interview with the author at Naval War College on 12 Aug 2024.
[xxxi] "Indian Seafarers to Receive Training in Russia for Arctic Navigation," Arctic Russia, September 13, 2023, https://arctic-russia.ru/en/news/indian-seafarers-to-receive-training-in-russia-for-arctic-navigation/.