माननीय मंत्री जयशंकर जी,
महामहिम,
विशिष्ट अतिथिगण, देवियो और सज्जनो,
नमस्ते,
आज आपको संबोधित करना मेरे लिए सचमुच बेहद सम्मान की बात है। भारतीय वैश्विक परिषद की प्रतिष्ठा काफी उत्कृष्ट है। इसकी पहुँच वैश्विक है। और मतदान पर इसका प्रभाव बेहद परिवर्तनकारी है।
इस संस्था का इतिहास काफी लंबा रहा है। मेरा परंपरा में विश्वास बेहद गहरा है, जो दिशा तय करने और उसे समायोजित करने में एक दिशासूचक की तरह है।
विगत दशकों में आपने जिन वक्ताओं की मेज़बानी की है, उनकी सूची ऐसे व्यक्तियों से भरी है जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मामलों को नई दिशा दी है। इसमें विचारक, निर्माता, दूरदर्शी, कर्ता शामिल हैं। ये ऐसे गुण हैं जो किसी एक व्यक्ति में शायद ही कभी मिलते हों।
मेरे समकक्ष, विदेश मंत्री जयशंकर (तत्कालीन विदेश मंत्री) इसका एक दुर्लभ उदाहरण हैं। और आज यहाँ उनकी उपस्थिति ने दबाव और बढ़ा दिया है!
मेरे समकक्ष, विदेश मंत्री जयशंकर एक ऐसे उदाहरण की तरह हैं, जो बेहद कम देखने को मिलता है। और आज यहाँ उनकी उपस्थिति ने दबाव और बढ़ा दिया है!
और मैं एक बात स्वीकार करता हूँ: जब मुझे बताया गया कि वह यहाँ होंगे, तो मैंने अपना भाषण दोबारा लिखा!
इस तरह से, मैं इस अवसर का उपयोग हमारी बातचीत को बढ़ाने के लिए कर रहा हूँ। एक ऐसे श्रोता और देश के साथ तालमेल बिठाते हुए जो बहुत अलग और अनोखा है, साइप्रस के सोच विचार की प्रक्रिया को सामने रखने का यह अच्छा अवसर है।
भारत एक वैश्विक महाशक्ति है। यह एक वास्तविकता है। भारत एक मेगाट्रेंड है। सबसे समृद्ध इतिहास और संस्कृति के साथ, और बेजोड़ क्षमता के साथ। यह एक वास्तविकता है।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, मैं "दुनिया में साइप्रस" की भूमिका को लेकर कुछ जानकारी देना चाहूँगा। इसके दो संरचनात्मक मानदंड हैं:
पहला: यह आकलन कि दुनिया अभी कैसी दिखती है। जैसी है, वैसी नहीं जैसी हम चाहते हैं।
दूसरा: साइप्रस का नज़रिए और दृष्टिकोण एक अपरिहार्य तुलना का कारक है। यह आज के उद्देश्यों के लिए, भारत के संदर्भ में तैयार किया गया है।
एक अंतर्निहित दोहरा सवाल है, और यह सही भी है: साइप्रस ही क्यों? और विस्तार से, साइप्रस और भारत कैसे साझेदार हो सकते हैं?
इसके लिए मैं विश्व दृष्टिकोण का एक सारांश पेश करके अपनी बात शुरु करना चाहूँगा।
आज हम यहाँ एक ऐसी स्थिति, कई संकटों के बीच मिल रहे हैं, जिसके प्रभाव लगभग हर जगह दिखाई दे रहे हैं।
कोई अलगाव नहीं है। कोई प्रतिरक्षा नहीं है। और मूलतः, कोई एकसमान प्रभाव भी नहीं है।
हम वैश्विक वित्तीय मंदी, कोविड, ऊर्जा संकट एवं मुद्रास्फीति में उछाल से गुज़रे हैं।
रूस के अवैध आक्रमण और निरंतर आक्रामकता के बाद यूक्रेन में युद्ध। अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था और व्यवस्था के मूल सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न।
गाज़ा में चल रही स्थिति एक अन्य चुनौती है। सीरिया में जोखिम।
लाल सागर में ख़तरा।
ईरान की परमाणु आकांक्षाएँ। सूडान, लीबिया, अफ्रीकी महाद्वीप।
कट्टरवाद, उग्रवाद एवं आतंकवाद एक वास्तविकता हैं।
और प्रवासन का औज़ारीकरण भी।
लोकलुभावनवाद बढ़ रहा है।
सबसे बढ़कर, वैश्विक व्यवस्था की दिशा को लेकर अनिश्चितता है।
संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा नई नहीं है।
प्रभाव की लड़ाई भी नई नहीं है।
लेकिन ऐसे मुद्दों के प्रति मौजूदा नज़रिए कोई क्षणिक घटना नहीं है। यह स्थायी है।
और जब तक विश्व व्यवस्था समायोजित नहीं हो जाती, हम परिवर्तन के दौर से गुज़र रहे हैं।
हमें यह मानकर खुद को भटकाना नहीं चाहिए यह दौर अस्थायी है।
राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है।
और जैसे-जैसे हम बात कर रहे हैं, नई व्यवस्था बन रही है।
कोई भी व्यवस्था की सुरक्षा हेतु बीमा पॉलिसी बनने को तैयार नहीं है।
हम सभी को यह करना होगा। अकेले और साथ मिलकर।
और इसमें अवसर छिपा है।
आपूर्ति श्रृंखलाएँ, अभियोज्यता, कनेक्टिविटी, संकट प्रबंधन, ये सभी नई वास्तविकताएँ हैं। हम इतिहास को दोहराते हुए देख रहे हैं। और इसका भविष्य की ओर वापस जाने का भूगोल से बहुत कुछ लेना-देना है।
विखंडन, अस्थिरता और अनिश्चितता से भरे इस दौर में, साइप्रस विभाजन की दीवारों के बजाय सहयोग के नेटवर्क बनाने में विश्वास करता है।
आधी सदी से भी ज़्यादा समय से हम जिस विभाजन का सामना कर रहे हैं, उसके बावजूद। अपने मूल्य को उजागर करने का।
क्योंकि कोई भी सहयोग को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकता है।
साइप्रस की पहचान भूगोल से होती है।
इस कारण, यह हमेशा उन ऐतिहासिक परिवर्तनकारी शक्तियों का अभिन्न अंग रहा है जिन्होंने पूर्वी भूमध्य सागर के राजनीतिक परिदृश्य को आकार दिया।
लेकिन हमने इसकी भी कीमत चुकाई है और चुकाते रहेंगे। एक ऐसा पड़ोसी, जो सर्वशक्तिमान एवं महत्वाकांक्षी है, जो बल प्रयोग करने से प्रेरित है और उसे अपनाने में संकोच नहीं करता, हमेशा मौजूद है। फिर भी, हम अभी तक जीवित हैं। अपने तुलनात्मक लाभों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
यूरोपीय संघ, संयुक्त राष्ट्र, राष्ट्रमंडल के सदस्य तथा पूर्वी भूमध्य सागर के साथ गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों वाले देश के रूप में, साइप्रस संवाद और साझेदारी के एक खास मंच का कार्य करता है।
तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ, जिसके आँकड़े इस प्रकार हैं:
- आर्थिक विकास: 3.4% (2024);
- सार्वजनिक ऋण: घटकर सकल घरेलू उत्पाद का 65% (2024)
- बेरोज़गारी: 4.9% (2024)
विविध अर्थव्यवस्था के साथ:
- कमर्शियल बेड़ा / शिपिंग: सीवाई का शिपिंग उद्योग मज़बूत और गतिशील है, दुनिया के सबसे बड़े बेड़ों में से एक, जिसमें सैकड़ों शिपिंग कंपनियाँ हैं। यह सीवाई के सकल घरेलू उत्पाद में 7% से अधिक का योगदान देता है।
- फिनटेक - 19%
- पर्यटन
- रक्षा उद्योग
- सेवाओं का वैश्विक केंद्र
- क्षेत्र के साथ उत्कृष्ट राजनयिक संबंध।
व्यवहारवाद (यथार्थवाद) नया शब्द है।
संव्यवहारवाद एक प्रचलित मुहावरा है।
व्यापार विरोध; टैरिफ, ये सभी नई वास्तविकता के घटक हैं।
लेकिन साथ ही, नए व्यापार मार्ग और गठबंधन खोलने की एक प्रेरणा भी हैं।
यह महत्वाकांक्षा, दूरदर्शिता, रणनीति और कार्रवाई से जुड़ी है।
भारत के पास कार्रवाई का एक स्पष्ट रास्ता है।
और, मैं कह सकता हूँ, साइप्रस के पास भी है।
मैं इसे एक छोटे देश के नज़रिए से देख रहा हूँ।
साइप्रस भारत में शीर्ष 10 विदेशी निवेशकों में से एक है, जिसने 2000 और 2024 के बीच लगभग 14 बिलियन अमेरिकी डॉलर का संचयी निवेश किया है। ये निवेश सूचना तकनीकी, फार्मास्यूटिकल्स एवं रियल एस्टेट जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित रहे हैं।
तो इस संदर्भ में, एक छोटे देश के रूप में साइप्रस कैसे काम कर सकता है? इसका उत्तर सीधा नहीं है। फिर भी, कई आधार एवं अनुभूतियाँ हैं जिनसे उत्तर तलाशने में मदद मिल सकती है।
सबसे पहला, देशों की भौतिक असमानता के व्यावहारिक राजनीतिक परिणाम हैं। हाँ, सार्वजनिक अंतर्राष्ट्रीय कानून की नज़र में हम सभी औपचारिक रूप से समान हैं।
लेकिन व्यावहारिकता, यह परिभाषित करने वाला बहुरूपदर्शक एक अलग ही तस्वीर की ओर इशारा करता है। एक ऐसी तस्वीर जहाँ शक्ति, आकार, जनसंख्या, संसाधन, अर्थव्यवस्थाएँ, ये निर्णायक घटक हैं। ये वे कारक हैं जो अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं एवं विकास को प्रभावित करते हैं। और इनके सत्यापन हेतु हम फिर से साइप्रस के उदाहरण का उपयोग कर सकते हैं।
हमारे बीच आक्रामक, आक्रमणकारी, एक कब्ज़ाकारी हैं, जो साथ ही एक सच्चा सहयोगी और मित्र भी है। इसलिए सार्वजनिक अंतर्राष्ट्रीय कानून एवं कूटनीतिक गतिविधियों की संशयात्मकता की दृष्टि में एक विसंगति है।
दूसरा, हमें यह अंतर करना होगा कि छोटे देश दुनिया को कैसे देखते हैं और दुनिया छोटे देशों को कैसे देखती है। ये दोनों ज़रूरी नहीं कि एक ही हों।
शोध में पहले वाले पर जितना ध्यान दिया गया है, उतना ही छोटे देशों की धारणा के आंतरिक दृष्टिकोण पर भी। शोध इससे प्रभावित हुआ है। शीत युद्ध के दौरान, इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि एक छोटा देश क्या है। आकार या संसाधन, या अन्य मानदंड विदेश नीति के फैसलों को कैसे प्रभावित करते हैं और शीत युद्ध के दौरान कोई देश खुद को कैसे स्थापित करता है।
इसके अलावा, हमने इस बारे में भी चर्चा की कि कैसे छोटे देश उपनिवेशवाद का निशाना बन सकते हैं, या कैसे निशाना बनने से बच सकते हैं क्योंकि वे प्रासंगिक हैं।
फिर इस बात पर बहस भी होती है कि कैसे छोटे देशों को महाशक्तियों के बीच मौजूदा विरोध में घसीटा जा सकता है।
फिर, साम्यवादी शासन के पतन के बाद, ये देश कैसे उभरेंगे, अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में पूरी तरह स्वतंत्र होकर फिर से उभरेंगे, फिर वैश्वीकरण की घटना और उसका छोटे देशों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, और अंत में, एकीकरण के ज़रिए यूरोपीय संघ इन देशों को पश्चिमी राजनीतिक मूल्यों के करीब कैसे लाने की कोशिश कर रहा है, और यूरोपीय एकीकरण जातीय-राजनीतिक संघर्षों का समाधान कैसे हो सकता है।
छोटे देशों के दृष्टिकोण से एक आंतरिक दृष्टिकोण, मुश्किल हालात से निपटने हेतु एक उपयोगी मार्गदर्शक है। बेशक, दुनिया को उस तरह देखने का जोखिम हमेशा बना रहता है जैसा हम चाहते हैं। छोटे देशों के लिए, यह खतरनाक है। विश्व का इतिहास, जैसा कि मेरे सिंगापुर के समकक्ष ने स्पष्ट रूप से कहा है, छोटे देशों के शेष बचे निशानों से भरा पड़ा है।
तीसरा: छोटे देशों की कार्यप्रणाली दूसरों से अलग होती है। आइए यूरोपीय संघ के भीतर अपने अनुभव का ही उदाहरण लें।
जिस तरह से हम बातचीत करते हैं, जिस तरह से हम आयोग के साथ संबंधों को देखते हैं, जिस तरह से हम परिषद के अन्य सदस्य देशों के साथ बातचीत करते हैं, ये बड़े देशों द्वारा अपनाए जा रहे तरीकों से अलग हैं।
छोटे देशों के लिए, बातचीत एक बहुत ही अलग खेल है क्योंकि एक बहुत ही सामान्य वजह से, हमारा प्रभाव नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण कारक है। इसका मतलब यह नहीं है कि उनके पास बातचीत करने का कौशल नहीं है।
इसके विपरीत, मेरा मानना है कि हमने बातचीत में ऐसे कौशल विकसित किए हैं जो बेहद मूल्यवान और उपयोगी हैं, और संभवतः उनमें दूसरों के लिए भी सीखने योग्य बातें मौजूद हैं। प्रभाव के बिना बातचीत करना एक कला है, और मेरा मानना है कि हम सभी ने उस कौशल में महारत हासिल कर ली है।
हम अभी भी इन सभी संकटों के बीच हैं जिनको अभी मैं बता रहा हूँ।
तो महत्वपूर्ण सवाल यह है: आप उद्यमशीलता के माध्यम से, गठबंधन बनाकर, विश्वसनीय और उपयोगी बनकर, अपनी पहल से दूसरों को आश्चर्यचकित करके, राजनीतिक, आर्थिक, कूटनीतिक, कैसे जगह बनाते हैं? नॉर्डिक देशों का उदाहरण। उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में मानदंड स्थापित करने में अग्रणी बताया गया है।
सतत विकास मानक और पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक स्थिति, लैंगिक समानता, इस मार्ग को प्रशस्त करने के एक स्पष्ट उदाहरण हैं।
माल्टा ने यूएनसीएलओएस को महासागरों की व्यवस्था बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई है। यह शब्द नवंबर 1967 में संयुक्त राष्ट्र में माल्टा के तत्कालीन प्रतिनिधि अरविद पार्टो द्वारा बहुत ही प्रभावशाली ढंग से गढ़ा गया था, एक ऐसा नाम जिसे हम सभी को जानना चाहिए।
इसलिए, छोटे देशों को अक्सर कम आंका जाता है। ऐसा होना निश्चित रूप से हमें हैरान करता है जब आप दिलचस्प पहलों का प्रदर्शन कर सकते हैं, और जब हम बड़े देशों की ज़रूरतों को ज़मीनी राजनीतिक स्थिति के साथ तालमेल बिठा सकते हैं।
मैं यहाँ साइप्रस के एक उदाहरण का संदर्भ देना चाहूँगा।
7 अक्टूबर के हमलों और गाजा में जो कुछ हो रहा है, उसके बाद के हाल के महीनों में, यूरोपीय संघ में हम सभी ने गाजा में बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता पहुँचाने की तत्काल आवश्यकता को समझा। कठिनाइयाँ हैं। समस्याएँ रही हैं। हमने अपनी पहल तैयार की, प्रस्तावित की और उसे पेश किया।
समुद्री गलियारा, अमलथिया योजना, एक ऐसी चीज़ जिसके लिए मैंने सभी कारण साझा किए हैं कि यह क्यों नहीं हो सकता, क्यों नहीं होना चाहिए, और क्यों यह होना असंभव है। फिर भी यह हुआ। और यह साबित करने, यह साबित करने में कामयाब होने के बारे में है कि यह विचार भौगोलिक और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के कारण साकार हो सकता है।
यह ऐसी पहल है जिसका यूरोपीय संघ और अधिक समर्थन कर सकता है। लेकिन हम इसे कर रहे हैं और कई अन्य देशों के साथ साझेदारी में इसे जारी रख रहे हैं। माल्टा हाल की यात्रा में इसका एक उदाहरण है। संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका और अन्य भी हैं। इसलिए जैसे-जैसे अधिक देशों ने एक ऐसे संघर्ष हेतु पहल की, जो हमारे राष्ट्रीय जनमत में राजनीतिक रूप से इतना गंभीर रूप से प्रभावित है कि हम देखने के बजाय कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं।
हमें आवश्यक अवसंरचना प्रदान करने और खतरे वाले क्षेत्रों से तीसरे देश के नागरिकों को निकालने के लिए अपनी राष्ट्रीय योजना को लागू करने का भी अवसर मिला।
हमने सूडान, लेबनान, इज़राइल और ईरान से भी लोगों को निकाला है, हम इस मोर्चे पर सक्रिय रहे हैं और हमने सुरक्षित आश्रय देने में अपनी भूमिका निभाई है।
एक बार फिर संकट के बीच, हमने दूसरों को अपनी स्थिति एवं अपने संबंधों का उपयोग करने का अवसर प्रदान किया है।
इसलिए, छोटे देश लोगों को समझाने का काम कर सकते हैं। संस्थागत सहभागिता ऐसा ही एक अवसर है।
यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को देखा जा सकता है, हाँ, सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य हैं, जिनमें बदलाव हो सकता है, लेकिन अधिकांश अन्य देशों को उस संस्था में भाग लेने और सार्वजनिक अंतर्राष्ट्रीय कानून तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मानदंडों को निर्धारित करने, परिभाषित करने और लागू करने का अवसर मिला।
एक अन्य उदाहरण स्विट्जरलैंड द्वारा लोकतंत्र में योगदान है। अब, कोई सोच सकता है कि क्या यह एक छोटा देश है? जैसा कि मैंने समझाने की कोशिश की, यह एक सापेक्ष शब्द है।
सिंगापुर। ऐसे देश का एक और अच्छा उदाहरण जिसने अपनी भौगोलिक स्थिति और अपनी अद्भुत आंतरिक राजनीतिक स्थिरता और संरचना का उपयोग करके भेद्यता को लाभ में बदल दिया है।
जैसा कि लिखा गया है, छोटे और महान के बीच का अंतर, ज़रूरी नहीं कि मजबूत और कमजोर के बीच के अंतर से मेल खाता हो। आंतरिक संगठन। राष्ट्रीय नवाचार। बहुमुखी प्रतिभा एवं उपयोगिता। ये सभी दूसरों के लिए उपयोगिता पैदा करने के कारण हो सकते हैं। और यह भी एक ऐसी बात है जो बातचीत में अहम भूमिका निभाती है।
संसाधन निश्चित रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं, और भूगोल भी। खाड़ी के छोटे देशों को देखा जा सकता है। उनका लाभ, उनका प्रभाव दूसरों से तुलनीय नहीं है क्योंकि उनके पास विशिष्ट लाभ हैं। फिर भी, हम सभी को इस बात का एहसास होना चाहिए कि हमारे अपने प्रतिस्पर्धी लाभ भी हैं।
हमने यह भी देखा है कि छोटे देशों द्वारा किया गया राजनीतिक विश्लेषण कितना व्यावहारिक होता है। फिर से सिंगापुर का उदाहरण लिया जा सकता है। मेरे सहयोगी ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा है कि हम अमेरिका में क्या हो रहा है, इसकी व्याख्या कर सकते हैं।
अगर हम आँकड़ों पर गौर करें, तो ये आँकड़े बता रहे थे कि संयुक्त राज्य अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की सुरक्षा का दायित्व संभाल रहा था, जबकि उसी समय, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में उनकी हिस्सेदारी 40% थी। इसलिए हम सभी एक ही समय में वित्तपोषण और सुरक्षा का दायित्व संभाल रहे हैं। अब सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिशत घटकर 26% रह गया है।
तो कोई भी इस निष्कर्ष पर पहुँच सकता है कि वे यह सवाल पूछ रहे होंगे कि हम दूसरों के लिए अपना नुकसान क्यों करें? यह एक गहन विश्लेषण है, और यह गहन विश्लेषण ज़रूरी नहीं कि सिर्फ़ बड़े देशों से ही आए।
इसलिए सीखने हेतु कुछ सबक हैं, और हम सभी को अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। हमें सतर्क रहना होगा, लेकिन हमें साहसी भी होना होगा। हमें सीखे गए सबक पर ध्यान केंद्रित करके अपने समन्वय को बढ़ाना होगा।
प्रिय मित्रों,
शीत युद्ध के दौरान, यह कहा जाता था कि साइप्रस में 'कभी न डूबने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर' बनने की क्षमता है।
हमारी नीति इस भौगोलिक क्षमता का अधिक रचनात्मक एवं सकारात्मक तरीकों से उपयोग करने की है। युद्ध क्षेत्रों से लोगों को निकालने के लिए एक सुरक्षित आश्रय, स्थिरता का एक द्वीप और एक अग्रिम आधार के रूप में कार्य करना।
हजारों यूरोपीय संघ और तीसरे देश के नागरिकों को साइप्रस के रास्ते उन विस्फोटक क्षेत्रों से सुरक्षित और शीघ्रता से उनके देशों में पहुँचाया गया।
हमारी प्रमुख आकांक्षाओं में से एक क्षेत्रों के बीच एक सेतु, एक "क्षेत्रीय संयोजक" के रूप में कार्य करना है। और ब्रुसेल्स में मित्र देशों के लिए व्हिसपिरेर के रुप में।
ऐसे युग में जहाँ कनेक्टिविटी शक्ति को तय करती है, साइप्रस रणनीतिक लाभ प्रदान करता है:
इस गतिशील व्यवस्था में, हम भारत को एक स्वाभाविक मध्यस्थ के रूप में देखते हैं।
आज, जब भारत तेजी से बहुध्रुवीय विश्व में एक अग्रणी आवाज़ के रूप में उभर रहा है - साइप्रस भारत को न केवल एक पुराना मित्र, बल्कि भविष्य के सहयोग हेतु एक भागीदार भी मानता है।
औपनिवेशिक शासन की विरासत से आकार लेते हुए, दोनों राष्ट्र आधुनिक लोकतंत्र बनकर उभरे हैं जो स्वतंत्रता, संप्रभुता, अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्रति सम्मान और विधि-शासन को महत्व देते हैं।
रणनीतिक रुप से अच्छी भौगोलिक स्थिति वाले राष्ट्रों के रूप में, हम वैश्विक मामलों में संतुलन, कूटनीति और नियम-आधारित व्यवस्था के महत्व को समझते हैं।
दशकों से, साइप्रस और भारत ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे का लगातार समर्थन किया है, जो उनके संबंधों के मूल में विश्वास और मित्रता को दर्शाता है।
भारत दशकों से साइप्रस की स्वतंत्रता और संप्रभुता का समर्थक रहा है, जबकि साइप्रस विश्व व्यवस्था में भारत की उचित भूमिका का दृढ़ समर्थक रहा है। इन सभी पहलुओं ने साइप्रस और भारत के बीच संबंधों को एक रणनीतिक संबंध बना दिया है।
जून 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस यात्रा हमारी साझेदारी में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुई।
इसने राजनीतिक संवाद, व्यापार व निवेश, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में भविष्य के सहयोग का आधार प्रदान किया।
इस क्षमता को साकार करने की दिशा में व्यावहारिक कदम पहले ही उठाए जा चुके हैं, जो इस बात को दर्शाता है कि दोनों सरकारें इस संबंध को कितनी गंभीरता से लेती हैं।
साइप्रस और भारत के बीच सहमत पंचवर्षीय संयुक्त कार्य योजना (2025-2029), जून 2025 में प्रधानमंत्री मोदी की साइप्रस यात्रा के दौरान अपनाए गए संयुक्त घोषणापत्र के कार्यान्वयन का एक रोडमैप तैयार करती है। इसमें सहयोग के मुख्य क्षेत्रों, जिनमें रक्षा, व्यापार और व्यवसाय, नवाचार और प्रौद्योगिकी क्षेत्र शामिल हैं, में अल्पकालिक, मध्यम और दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी) सहयोग हेतु एक महत्वपूर्ण मंच है। यह एक दूरदर्शी प्रस्ताव है जो हमारे क्षेत्रों के बीच संपर्क को बदल सकता है, एक भू-राजनीतिक पहल है जिसमें व्यापार मार्गों और महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधियों को नया रूप देने और परिवर्तनकारी सहयोग को बढ़ावा देने की क्षमता है।
भूमध्यसागरीय क्षेत्र आईएमईसी का एक प्रमुख घटक है, और साइप्रस इस उभरती हुई संरचना में भूमिका निभाने के लिए अच्छी स्थिति में है।
यूरोप में प्रवेश एवं निकास के गेटवे के रूप में, साइप्रस यूरोपीय संघ में एक सुरक्षित, सीधे प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करने हेतु खास स्थान पर स्थित है।
क्षेत्रीय संपर्क का एक महत्वपूर्ण आधार, जो हमें आईएमईसी की दीर्घकालिक सफलता हेतु रणनीतिक रुप से अधिक शक्ति प्रदान करता है।
इस महत्वाकांक्षी संपर्क दृष्टिकोण में, साइप्रस अपनी क्षमता को न केवल आर्थिक नज़रिए से, बल्कि विखंडन के एक रणनीतिक काउंटर-नैरेटिव के रूप में भी देखता है।
यूरोपीय संघ का सदस्य होने के नाते, साइप्रस यूरोपीय संघ-भारत साझेदारी को मजबूत करने को लेकर प्रतिबद्ध है, और यूरोपीय संघ परिषद की हमारी आगामी अध्यक्षता (2026 की पहली छमाही में), इस संबंध में नई गतिशीलता लाने का अवसर प्रदान करती है।
इस संबंध का आर्थिक स्तंभ भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
साइप्रस यूरोपीय संघ और भारत के बीच लंबे समय से चल रहे मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के होने का पुरजोर समर्थन करता है।
इस समझौते के सफल समापन से न केवल यूरोपीय संघ-भारत संबंध मजबूत होंगे, बल्कि साइप्रस, भारत और व्यापक यूरोपीय परिवार के लिए अपार आर्थिक अवसर भी खुलेंगे। यह समृद्धि, नवाचार और सतत विकास के प्रति साझा प्रतिबद्धता का एक स्पष्ट संदेश होगा।
देवियो और सज्जनो,
आज हमारी दुनिया निर्विवाद रूप से परिवर्तनशील स्थिति में है।
जैसे-जैसे हम बढ़ती ध्रुवीयता एवं जटिलता से भरी दुनिया में आगे बढ़ रहे हैं, साइप्रस एक ज़िम्मेदार, सक्रिय और दूरदर्शी देश बनने हेतु प्रतिबद्ध है।
हम भविष्य की ओर इस ज्ञान के साथ देखते हैं कि हमारी वैश्विक साझेदारियाँ महत्वपूर्ण हैं - और भारत के साथ हमारी साझेदारी से ज़्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है।
ऐतिहासिक एकजुटता से लेकर समकालीन सहयोग तक, साझा मूल्यों से लेकर साझा आकांक्षाओं तक, साइप्रस और भारत मिलकर एक ऐसा रास्ता बना रहे हैं जो रणनीतिक और दूरदर्शी दोनों है।
इस सहज साझेदारी में उन गहरे और ऐतिहासिक आधारों के अनुरूप परिणाम देने की क्षमता है जिन पर यह टिकी है।
और मैं दो छोटे उद्धरणों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ।
पहला उद्धरण संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान का 1998 में दिया गया था, जब उन्होंने कहा था कि छोटे देशों का वैश्विक शक्तियों के सामने भयभीत होना सामान्य है।
संयुक्त राष्ट्र में मेरे लंबे अनुभव ने मुझे दिखाया है कि दुनिया के छोटे देश अपनी स्थिति बनाए रखने में सक्षम हैं।
दूसरा उद्धरण 1969 में एक लेखक का है, जब उन्होंने लिखा था, "अगर लिलिपुटवासी गुलिवर को बाँध सकते हैं या उसको अपनी लड़ाई में इस्तेमाल कर सकते हैं, तो उनपर किसी दैत्य की तरह ही ध्यानपूर्वक ध्यान दिया जाना चाहिए।"
धन्यवाद।
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