सत्र I: विकास के माध्यम से सुरक्षा को बढ़ावा देना:
एशियाई सुरक्षा शासन के लिए नए दृष्टिकोणों की खोज
सीआईसीए महासचिव कैरत सारीबे
अध्यक्ष, एआईआर सेंटर फ़रीद शफ़ियेव
अध्यक्ष, एसआईआईएस चेन डोंगशियाओ और सीआईसीए टीटीएफ के अध्यक्ष
सीआईसीए टीटीएफ की 13वीं बैठक के इस सत्र में भारत की ओर से सीआईसीए टीटीएफ के सदस्य थिंक टैंक, भारतीय वैश्विक परिषद का प्रतिनिधित्व करना मेरे लिए प्रसन्नता की बात है।
2. यह सर्वविदित है कि अन्य क्षेत्रों के विपरीत, एशिया में एक व्यापक सुरक्षा सहयोग ढाँचा नहीं है जो पूरे महाद्वीप में फैला हो। इस बीच, हमारे महाद्वीप की सुरक्षा, विकास और समग्र कल्याण अभी भी चल रहे संघर्षों और तनावों से उत्पन्न चुनौतियों का सामना कर रहा है। हिंद-प्रशांत, दक्षिण पूर्व एशिया, अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया की स्थिति सभी के सामने स्पष्ट है, जहां मानव असुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभर रही है। वैश्विक स्तर पर वर्तमान भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण देशों के व्यवहार और उनकी सुरक्षा स्थिति में अभूतपूर्व परिवर्तन हो रहे हैं। इस विश्वास के साथ कि संकट की स्थितियां, भू-राजनीतिक अस्थिरता और अशांति भी नई ऊर्जा और नवीकृत उत्साह से प्रेरित रचनात्मक समाधानों के अवसर प्रस्तुत करती हैं, शायद अब समय आ गया है कि सीआईसीए पर ध्यान केंद्रित किया जाए और यह देखा जाए कि विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के देशों से सुधारित बहुपक्षवाद और संवर्धित क्षेत्रवाद के आह्वान के साथ तालमेल बिठाकर यह क्या हासिल कर सकता है।
3. मैं आज यहाँ नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक, भारतीय वैश्विक परिषद का प्रतिनिधित्व कर रही हूँ। यह भारत का अग्रणी और सबसे पुराना विदेश नीति थिंक टैंक है। 1947 में, औपनिवेशिक शासन से भारत की स्वतंत्रता के साथ ही तथा 1943 में परिषद की स्थापना के तुरंत बाद, आईसीडब्ल्यूए ने नई दिल्ली में प्रथम एशियाई संबंध सम्मेलन की मेजबानी की। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा संबोधित इस सम्मेलन ने ‘एशियाई एकता’ के विचार के साथ-साथ ‘अफ्रो-एशियाई एकजुटता’ और ‘वैश्विक दक्षिण’ के विचारों की नींव रखी। यह सम्मेलन, वास्तव में, एशिया की चुनौतियों का सामूहिक विश्लेषण करने तथा सहयोगात्मक समाधान खोजने का पहला बड़ा प्रयास था। इस सीआईसीए थिंक-टैंक फोरम में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को यह जानकर प्रसन्नता होगी कि 1947 के एशियाई संबंध सम्मेलन में पूर्व सोवियत मध्य एशियाई गणराज्यों सहित वर्तमान सीआईसीए के कई सदस्यों ने भाग लिया था, साथ ही अजरबैजान ने भी भाग लिया था, जिसने एकेडमी ऑफ साइंसेज, बाकू से दो प्रतिनिधि भेजे थे। यही वह विरासत है जिसे आईसीडब्ल्यूए आज आगे बढ़ाना चाहता है। आप सभी सहमत होंगे कि 40 और 50 का दशक एशियाई एकजुटता का स्वर्णिम युग था। सोवियत संघ के पतन के बाद एक प्रमुख मध्य एशियाई देश कजाकिस्तान की पहल से यह भावना कुछ हद तक पुनर्जीवित हुई, जिसने सीआईसीए के सर्वसम्मति-आधारित और समावेशी मंच के माध्यम से ‘एशियाई संबंध भावना’ को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। जैसा कि सभी जानते हैं, भारत सीआईसीए का संस्थापक सदस्य है और इसकी स्थापना के समय से ही इस संगठन का समर्थक रहा है।
4. भारत एशियाई सुरक्षा संरचना को अन्य वैश्विक संरचनाओं या सुरक्षा समझौतों के प्रतिद्वन्द्वी के रूप में नहीं देखता है, जो विशेष रूप से पिछली शताब्दी में स्थापित किए गए हैं, और जो वर्तमान में विकसित हो रहे हैं या चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हम एशियाई सुरक्षा ढांचे को भविष्य के वैश्विक सुरक्षा समझौते के "आधारभूत ढाँचे" के रूप में देखते हैं। भारत सीआईसीए के विश्वास बहाली उपायों (सीबीएम) के दृष्टिकोण को महत्व देता है, जिनकी अनिवार्य रूप से स्वीकृत विशेषताएँ 'वृद्धिशील', 'क्रमिक', 'स्वैच्छिक', 'सर्वसम्मति-आधारित' और 'अनुशंसित' हैं। भारत का यह भी मानना है कि बहुपक्षीय सीबीएम का उद्देश्य पारस्परिक रूप से सहमत द्विपक्षीय सीबीएम को ‘पूरित’ करना है, न कि उनका ‘प्रतिस्थापन’ करना। भारत वर्तमान में आतंकवाद-निरोध, कनेक्टिविटी, ऊर्जा सुरक्षा और मानवीय आयाम के क्षेत्रों में सीआईसीए में सीबीएम में सक्रिय रूप से भाग ले रहा है। हमने हाल ही में सीआईसीए सदस्य देशों के लिए कट्टरपंथ से मुक्ति और इंटरनेट के दुरुपयोग पर कार्यशालाओं का आयोजन किया है। सीआईसीए पहलों के साथ भारत की सहभागिता सुसंगत और ठोस रही है तथा इसमें सीआईसीए के सदस्य देशों के समक्ष वर्तमान में उत्पन्न पारंपरिक और गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों की बढ़ती श्रृंखला को ध्यान में रखा गया है। सीआईसीए को हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी, आतंकवाद, धन शोधन, मानव तस्करी और यौन तस्करी जैसे अपराधों से उत्पन्न मानव असुरक्षा चिंताओं को दूर करने को प्राथमिकता देनी चाहिए।
5. आईसीडब्ल्यूए में, हमारा मानना है कि दुनिया एक बहुध्रुवीय विश्व में परिवर्तित हो चुकी है, और इस नई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए मज़बूत वैश्विक और क्षेत्रीय संस्थाओं की आवश्यकता है। इन संस्थाओं के पास बहुध्रुवीयता को प्रभावी ढंग से समर्थन देने और एक नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपने स्वयं के मानदंड-निर्धारण और संचालनात्मक अधिदेश होने चाहिए। प्रभावी बहुपक्षवाद बहुध्रुवीयता को मजबूत करता है और भारत सीआईसीए को विविधतापूर्ण और बहुध्रुवीय एशिया में प्रभावी बहुपक्षवाद को आगे बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखता है।
6. हाल के वर्षों में भारत की विदेश नीति और कूटनीतिक पहुंच में दो प्रवृत्तियों का समेकन देखा गया है: पहला, हिंद महासागर से लेकर हिंद-प्रशांत तक सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत की उभरती भूमिका। सागर (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) और महासागर (क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक और समग्र उन्नति) के अपने दृष्टिकोण के अनुसार, भारत अपने निकटवर्ती और विस्तारित पड़ोस के साथ-साथ आसपास के समुद्री क्षेत्रों में विकास, सुरक्षा और रक्षा सहयोग को बढ़ावा देने में लगातार प्रगति कर रहा है। उदाहरण के लिए, ये साझेदारियां सुरक्षा के लिए गैर-परंपरागत खतरों जैसे आतंकवाद-निरोध, समुद्री डकैती-निरोध, जलवायु और प्राकृतिक आपदा आपातस्थितियों आदि से निपटने में उपयोगी साबित हो रही हैं। दूसरा, भारत वैश्विक दक्षिण में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका की पुष्टि कर रहा है, जैसा कि हाल ही में भारत द्वारा आयोजित "वॉइस ऑफ़ द ग्लोबल साउथ" शिखर सम्मेलनों से स्पष्ट है। इसके अतिरिक्त, भारत अपनी विकास साझेदारी पहलों का विस्तार कर रहा है, जो मुख्य रूप से अपने पड़ोसी देशों और अफ्रीका को लक्षित करती हैं, साथ ही दक्षिण-पूर्व एशिया, प्रशांत द्वीपीय देशों, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका तक भी विस्तारित हो रही हैं।
7. जैसे-जैसे विश्व विभिन्न व्यवस्थाओं के बीच बदलता जा रहा है, सीआईसीए के सदस्य देश भी एक ही समय में कई स्तरों पर परिवर्तन से गुजर रहे हैं: व्यापक अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय परिवर्तन, उनके समाजों के भीतर राष्ट्रीय कायाकल्प की प्रक्रिया, तथा स्वयं सीआईसीए का संस्थागत विकास। इस पृष्ठभूमि में, परस्पर निर्भरता को प्रोत्साहित करके और साझा मूल्यों को विकसित करके, संवर्धित क्षेत्रीय सहयोग एक लाभकारी चक्र का निर्माण कर सकता है, जहां विकास सुरक्षा को मजबूत करता है और सुरक्षा, बदले में, विकास का समर्थन करती है। सीआईसीए के पास राजनीतिक स्थिरता, पारस्परिक सुरक्षा, आर्थिक अंतर्निर्भरता और सांस्कृतिक अंतर्संबंधों की विशेषता वाले एशिया को प्रभावित करने और संरक्षित करने की क्षमता है, जो सभी संवाद, कूटनीति और विश्वास के सिद्धांतों पर आधारित हैं।
धन्यवाद!
*****