चीन की आर्थिक मदद ने नेपाल के बुनियादी ढांचे की कमी को बहुत हद तक पूरा करने में मदद की है। हालाँकि, अस्पष्ट ऋण शर्तों, गुप्त संपार्श्विक राशि और चीन द्वारा सुदूर पश्चिम में क्षेत्रीय अतिक्रमण पर चुप्पी की खबरें, ऋण निर्भरता एवं उसकी संस्थागत स्वायत्तता के कम होने पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। इसके अलावा, चीन ने पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे को ऋण दिया था, जिसमें गड़बड़ी की रिपोर्टें अप्रैल 2025 में आईं जो रणनीतिक अवसंरचना में देश की बढ़ती पकड़ और इसकी लोकतांत्रिक स्वायत्तता के लिए बढ़ते खतरों को दर्शाती है।
परिचय
बीते एक दशक में नेपाल को चीन की मदद का दायरा और महत्व तेज़ी से बढ़ा है जिससे नेपाल के बुनियादी ढांचे के विकास में चीन केंद्रीय भूमिका में आ गया है। यह मदद ऋण, अनुदान और बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग परियोजनाओं के एक जटिल ढांचे में विकसित हो गया है। हाल ही में, मैत्री और साझा विकास का संदेश देते चीन और नेपाल के झंडों से सजे होर्डिंग्स की तस्वीरें सुर्खियां बनीं। बाहर से देखें तो यह प्रदर्शन फलते– फूलते द्विपक्षीय संबंधों का एक सौम्य प्रदर्शन भर नज़र आता है। चीन 2015 से ही नेपाल को 12.4 अरब रुपये का अनुदान देने का वादा करता आया है।[i] एक ऐसे देश के लिए जहाँ विकल्पों की कमी है और पश्चिमी देशों से मिली वाली मदद की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी, वहाँ लोकतांत्रिक सुधारों की शर्तों के साथ चीन की मदद और बुनियादी ढांचा एक तात्कालिक एवं लचीला विकल्प नज़र आता है। हालाँकि, इसके पीछे एक और जटिल कहानी सामने आती है जहाँ साझेदारी के आवरण में विदेशी मदद एक चमकदार रिबन बन जाती है जो आखिरकार आपको सशक्त बनाने की बजाए उलझा देती है।
भूकंप और बीआरआई (BRI): महत्वपूर्ण घटना
नेपाल के साथ चीन का सहयोगात्मक संबंध प्रतीकात्मक रूप से 1960 के दशक में आरंभ हुआ था जिसमें अप्रैल 1960 में हस्ताक्षरित चीन– नेपाल शांति एवं मैत्री संधि के माध्यम से सद्भावना और कूटनीति को दर्शाया गया, जिसके बाद मार्च 1961 में चीन– नेपाल सीमा समझौता हुआ था।[ii] यह संबंध नेपाल की "एक चीन" नीती के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता से और मजबूत हुआ, जो इस बात पर ज़ोर देता है कि वह अपने क्षेत्र का प्रयोग चीन के खिलाफ किसी भी शत्रुतापूर्ण गतिविधियों के लिए नहीं करने देगा।"[iii] इसके बाद 1970 के दशक तक चीन ने ल्हासा– काठमांडू राजमार्ग, काठमांडू रिंग रोड और दूसरी विकास परियोजनाओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई।[iv] 1980 के दशक में औपचारिक सैन्य सहयोग की शुरुआत हुई जिसमें चीन ने 1988 में सैन्य उपकरण की आपूर्ति की और फिर 2005 में माओवादी विद्रोह के दौरान चीन ने नेपाल को लगभग 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के हथियार और गोला– बारूद देकर मदद की थी।[v]
2000 के दशक की शुरुआत में, चीन की अधिकांश सहायता अनुदान और ऋण के रूप में थी जो शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और सैन्य मदद में विविधता लाने का एक हिस्सा था।[vi] निवेश और वित्तपोषण विनिर्माण, सेवा और पर्यटन क्षेत्रों में नज़र आने वाले बुनियादी ढांचे की ओर निर्देशित किया गया जिससे नेपाल के अविकसित बुनियादी ढांचे को देखते हुए ऐसी मदद विशेष रूप से मूल्यवान बन गई।
वो साल 2015 था जब नेपाल में विनाशकारी भूकंप आया, नेपाल के नए संविधान की घोषणा हुई थी। इन सब के साथ और भी कई घटनाएं घटीं जिसके कारण भारत के साथ नेपाल का व्यापार प्रभावित हुआ।[vii] इस वज़ह से नेपाल और चीन के संबंध तेजी से विकसित हुए और 2016 में नेपाल के लिए चीन के साथ पारगमन और परिवहन समझौता (TTA) करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।[viii] मार्च 2016 में हुए समझौते से चीन ने नेपाल को तीसरे देश से व्यापार करने के लिए चीन के बंदरगाहों तक पहुँच प्रदान की जो नेपाल की स्थलरुद्ध (लैंडलॉक) स्थिति को देखते हुए एक महत्वपूर्ण कदम था। इसने चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई/BRI), के लिए रास्ता बनाया जिस पर 14 महीने के बाद 2017 में हस्ताक्षर किए गए।
इसके साथ ही, सिंघुपालचोक[ix] में जिला अस्पताल और नेपाल सशस्त्र पुलिस बल अकादमी के पुनर्निर्माण हेतु नेपाल सरकार को अनुदान देने के लिए,[x] चीन की सरकार द्वारा की गई मदद ने चीन की भागीदारी को, विशेष रूप से बीआरआई के तहत कनेक्टिविटी एवं बुनियादी ढांचे के लिए नौ परियोजनाओं पर हस्ताक्षर के साथ, बाहरी समर्थन से सक्रिए भागीदारी में बदल दिया ।
उधार देने के पीछे की मंशा
परंपरागत पश्चिमी मदद, विशेष रूप से आर्थिक सहयोग एवं विकास सहायता समिति (डीएसी) के जरिए पारदर्शी मानदंडों एवं सार्वजनिक रिपोर्टिंग के अधीन आर्थिक सहयोग संगठन (ओईसीडी/OECD) देशों से प्राप्त सहायता के उलट चीन से मिलने वाली मदद अपेक्षाकृत अपारदर्शी है। इसे आधिकारिक विकास मदद (ओडीए/ODA)[xi] के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है, जिससे चीन चुपचाप अंतरराष्ट्रीय जांच से बच सकता है।[xii] नेपाल के लिए इसे अनुदान, मदद और रियायती ऋण[xiii] का एक अत्यधिक लचीला मॉडल बताया गया है जिसमें ऐसी शर्तें हैं जो काठमांडू को सशक्त बनाने की अपेक्षा बीजिंग को कहीं अधिक लाभ पहुंचाती हैं।
इसके लिए चीन द्वारा किए जा रहे वित्तपोषण की अंतर्निहित शर्तों और इस प्रकार की भागीदारी के होने वाले परिणामओँ की जांच कर तथाकथित “बिना किसी शर्त के” कथन की बारीकी से जांच करना आवश्यक है।
चीन द्वारा वित्त पोषित परियोजनाओँ की आवर्ती विशेषता यह है कि उन्हें चीन के इंजीनियरिंग, खरीद, निर्माण और वित्तपोषण (ईपीसीएफ/EPCF) मॉडल का प्रयोग कर कार्यान्वित किया जाना आवश्यक है,[xv] काठमांडू– तराई फास्ट ट्रैक परियोजना में भी ऐसा ही देखा गया, जहाँ नेपाल सेना द्वारा परियोजना पर काम किए जाने के बावजूद पूरी प्रक्रिया में चीन की दो कंपनियां भी शामिल रहीं।[xvi] मई 2018 में, चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने अपनी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग एजेंसी (एआईईसीओ/AIECO) के माध्यम से सिंधुपालचोक जिला अस्पताल के पुनर्निर्माण हेतु चाइना कियुआन इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन को पुरस्कृत किया था।[xvii] वास्तव में, मई 2017 में एक बड़े विवाद में पूर्व पीएम पी.के. दहल के नेतृत्व में कैबिनेट ने 1200 मेगावाट की बूढ़ी गंडकी जलविद्युत परियोजना के निर्माण के लिए विश्व बैंक द्वारा काली सूची में डाली गई कंपनी चाइना गेझोउबा ग्रुप कॉर्पोरेशन (सीजीजीसी) को अनुबंधित करने का फैसला किया था। [xviii]
नेपाली ठेकेदारों और श्रमिकों को बड़े पैमाने पर बाहर रखा जाता है जिससे नेपाल की तनकीनीकी क्षमता[xix] निर्माण में बाधा आती है और इस प्रकार यह आउटसोर्सिंग विकास का मामला बन जाता है, जहाँ निर्भरता प्रभावी रूप से आयातित होती है। जैसा कि सीईएसआईएफ (CESIF) रिपोर्ट में कहा गया है, “चीन के ठेकेदार ज्यादातर ईपीसी (इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण) मॉडल में लगे हुए हैं और आमतौर पर अपना श्रम, कच्चा माल और तकनीक स्वयं लाते हैं, जिससे नेपाली कामगारों एवं उद्योगों के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं।” [xx]इस बहिष्कार को अक्सर नेपाल में कमज़ोर संस्थागत और तकनीकी क्षमता के आधार पर उचित ठहराया जाता है।
ज्यादातर शोधों से पता चला है कि विकास कार्यक्रमों के प्रशासन और प्रबंधन की नेपाल की क्षमता चिंता का एक और कारण रही है और यही वजह है कि चीन की कंपनियां ईपीसी (EPC ) मॉडल को प्राथमिकता देती हैं। इसके अलावा, शासन संबंधी कमियां जैसे कमज़ोर निगरानी व्यवस्था, नौकरीशाही, जवाबदेही का अभाव और अच्छी तकनीकी क्षमता की कमी नेपाल के बुनियादी ढांचे संस्थानों को प्रभावित करती है।[xxi]
यह गतिशीलता एक संरचनात्मक निर्भरता को और पुष्ट करती है क्योंकि चीन की कंपनियां नेपाल की मानव पूंजी को शामिल या मजबूत किए बिना परियोजना निष्पादन पर हावी हैं। तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण हेतु की गई अन्य पहलों के बावजूद, नेपाल न केवल रोज़गार सृजन से चूकने का जोखिम उठा रहा है बल्कि दीर्घकालिक क्षमता निर्माण से भी चूक रहा है। समय के साथ इससे नेपाल की बुनियादी ढांचे निर्माण के लिए भी बाहरी देशों पर निर्भरता बढञती जा रही है। इसके अलावा, ये परियोजनाएं चीन की भागीदारी को प्रमुखता से दर्शाती हैं– चाहे वे साइनबोर्ड और चीनी भाषा की पट्टिकाओं के माध्यम से हो या रिबन काटने के समारोहों के माध्यम से। परिणाम स्पष्ट है– चीनी मदद न केवल सड़कें और हवाई अड्डे खरीदती हैं बल्कि लक्ष्य और इतिहास पर नियंत्रण को भी खरीदती है।
एडडाटा (AidData)[xxii] द्वारा किए गए महत्वपूर्ण शोध अध्ययन से पता चला है कि चीन के ऋणदाता निजी कंपनियों में निवेश करते हुए भी, किसी– न– किसी तरह से पुनर्भुगतान सुनिश्चित कर लेते हैं। 89% मामलों में, ऐसा, ऋणदाता देशों को अपनी निर्यात आय या अन्य धनराशि चीनी बैंकों के विशेष खातों में जमा करने के लिए बाध्य कर किया जाता है।[xxiii]
हालाँकि नेपाल द्वारा चीन के साथ ऋण की सटीक शर्तें हमेशा सार्वजनिक नहीं की जातीं लेकिन यह ऋण मॉडल गंभीर सवाल खड़े करता है विशेष रूप से पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे जैसी परियोजनाओं में, जो अस्पष्ट परिस्थितियों में चीनी वाणिज्यिक ऋण से निर्मित की गई हैं। एडडाटा (AidData) की रिपोर्ट से पता चला है कि इसी तरह की संपार्श्विक व्यवस्थाएं मौजूद हैं, जो यह दर्शाती हैं कि पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा परियोजना को एस्क्रो खाता विवाद के कारण 2017 के आरंभ में महीनों तक विलंब का सामना करना पड़ा था। चीन के एग्जिम बैंक ने ज़ोर देकर कहा कि एक एस्क्रो खाता खोला जाए जिसमें नेपाल नागरिक उड्डयन प्राधिकरण (सीएएएन/CAAN) अपने सभी हवाईअड्डों से होने वाली आय जमा करे। हालांकि, सीएएएन के तत्कालीन महानिदेशक ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। गहन बातचीत के बाद, एग्जिम बैंक ने अप्रैल 2017 में एक पत्र जारी किया जिसमें कहा गया कि उसने अपनी पिछली शर्त में संशोधन किया है जिससे सीएएएन को केवल पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से मिलने वाले राज्सव को एस्क्रो खाते में जमा करने की अनुमति मिल गई है।[xxiv]
इससे पता चलता है कि कैसे चीनी ऋण प्रथाएं नेपाल की राजकोषीय स्वायत्तता को चुनौती दे सकती हैं क्योंकि राष्ट्रीय राजस्व के प्रमुख स्रोत अब अपारदर्शी पुनर्भुगतान व्यवस्था में बंधे हैं, जिन्हें मूल रूप से “विकास पहल” के रूप में तैयार किया गया था।
विकास का प्रदर्शन: चीन की मदद का राजनीतिक उपयोग
राजनीतिक दृष्टि से, बुनियादी ढांचे के विकास की दर चीनी मदद को राजनीतिक वैधता और पुनर्निर्वाचन के लिए मूल्यवान साधन बनाती है। ऐसे देश में जहाँ आर्थिक गतिरोध और राजनीतिक अस्थिरता जनता की कल्पना पर हावी है, केवल बड़े पैमाने के बुनियादी ढांचे को ही विकास की ट्रॉफी के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। नेपाल के राजनेता विशेष रूप से चुनावी दौर में, इन परियोजनाओं का इस्तेमाल प्रगति दिखाने और समृद्धि का वादा करने के लिए करते हैं।[xxv] साल 2023 में बनने वाला पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, चीन के एग्जिम बैंक से मिलने वाले 216 मिलियन डॉलर के चीनी ऋण से बनाया गया है और इसका निर्माण चाइना सीएएमसी इंजीनियरिंग द्वारा किया गया है। चुनावी रैलियों में इसे प्रगति के प्रतीक के रूप में खूब प्रचारित किया गया।
हाल ही में आई रिपोर्ट्स से पता चलता है कि चीन के वित्तपोषण पर बढ़ती निर्भरता नेपाल की विदेश नीति के व्यवहार को कैसे प्रभावित करने लगी है। नेपाल के सुदूर पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र हुमला में, हाल के वर्षों में चीनी बुनियादी ढांचे के नेपाली क्षेत्र में अतिक्रमण की खबरें सामने आई हैं।[xxvi] बीजिंग से भिड़ने या सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे को उठाने की बजाय काठमांडू ने इस घटना को ज्यादा महत्व नहीं दिया और कोई आधिकारिक मान्यता देने से भी परहेज किया। यह मौन प्रतिक्रिया आकस्मिक नहीं है बल्कि प्राथमिकताओं के एक शांत पुनर्निर्धारण को दर्शाती है।
यहाँ मूल प्रश्न यह है कि क्या नेपाल अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता से समझौता किए बिना चीन की मदद से लाभान्वित हो सकता है। अब तक, साक्ष्य इसके विपरीत संकेत देते हैं। उदाहरण के लिए, 2019 में, चीन के कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के लगभग 50 नेताओं ने नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के 200 से अधिक नेताओं को “शी जिनपिंग विचार-प्रक्रिया” पर प्रशिक्षित किया। [xxvii] इसके अलावा, पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, जिसे चीन एग्जिम बैंक से पैसा मिला था, को अब प्रगति के प्रतीक के रूप में राजनीतिक रूप से प्रचारित किया जा रहा है। हालांकि, इस परियोजना की सख्त ऋण शर्तें चिंता पैदा करती रहती हैं।
अप्रैल 2025 में, एक संसदीय उप– समिति ने पोखरा हवाईअड्डे के उद्घाटन के कुछ ही महीनों बाद इसके निर्माण में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार (लगभग 14 अरब नेपाली रुपये) और गड़बड़ की सूचना दी थी।[xxviii] इसी प्रकार, रिंग रोड के विस्तार और अपर त्रिशूली 3A पनबिजली चैजी चीन– वित्त पोषित परियोजनाओं में पारदर्शिता की कमी के कारण संसदीय निगरानी समिति रही है और ऋण समझौतों को अक्सर सार्वजनिक या विधायी जांच से दूर रखा जाता है।[xxix] इसके अलावा, वित्त मंत्रालय ने कहा कि मंत्रालय के पास स्वयं चीन की लघु– स्तरीय मदद एवं परियोजनाओं के बारे में सभी आंकड़े नहीं हैं क्योंकि मंत्रालय ऑफ– बजट और ऑफ– ट्रेजरी अनुदान के तहत मदद पर नज़र नहीं रखता है।[xxx] अज्ञानता का ये रुख इस बाद को लेकर चिंता पैदा करते हैं कि चीन द्वारा वित्तपोषित परियोजनाओं में पर्दे के पीछे क्या चल रहा है!
निष्कर्ष
नेपाल को चीनी मदद प्रभावशाली बुनियादी ढांचे के मिल रही है लेकिन सतह के नीचे इसकी कीमत छुपी हैं। प्रत्येक नई परियोजना चुपचाप नेपाल की निर्भरता को और बढ़ाती जाती है, बल प्रयोग से नहीं बल्कि अस्पष्ट ऋण शर्तों और अपारदर्शी संपार्श्विक व्यवस्थाओं जैसे सूक्ष्म तरीकों से। इससे नेपाल की वित्तीय और राजनीतिक स्वायत्ता के क्रमिक क्षरण और इस उलझन के आर्थिक परस्पर निर्भरता में बदलने की संभावना को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं। हालंकि चीन से मिलने वाली मदद स्पष्ट रूप से परिवर्तनकारी है लेकिन यह नेपाल को दीर्घकालिक वित्तीय दायित्वों में और अधिक जकड़ती जा रही है। जैसे– जैसे पुनर्भुगतान का बोझ बढ़ता जा रहा है और घरेलू क्षमता अविकसित बनी हुई है, नेपाल के सामने आर्थिक रूप से चीन पर निर्भर होने का खतरा है, तथा उसके पास अपने विकास पथ को स्वतंत्र रूप से आकार देने के लिए कम अवसर होंगे।
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*नयनतारा नंदिनी उप्पल, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण:
[i] MyRepublica. “China Provides Grants Exceeding Rs 12.4 Billion to Nepal over Nine Years.” MyRepublica, January 13, 2025. https://myrepublica.nagariknetwork.com/news/china-provides-grants-exceeding-rs-124-billion-to-nepal-over-nine-years-6784d842da787.html (Accessed July 16, 2025).
[ii] Ministry of Foreign Affairs of the People’s Republic of China. “Treaty Text.” Treaty Database of China, July 18, 2018. https://treaty.mfa.gov.cn/tykfiles/20180718/1531876402103.pdf (Accessed June 20, 2025).
[iii] Ministry of Foreign Affairs of the People’s Republic of China. “China Nepal Belt and Road Cooperation Key Projects.” MFA PRC, June 7, 2024. https://www.fmprc.gov.cn/mfa_eng/gjhdq_665435/2675_665437/2752_663508/2753_663510/202406/t20240607_11411413.html(Accessed June 20, 2025).
[iv] Shivam Shekhawat. “BRI in Nepal: An Appraisal.” ORF Online, n.d. https://www.orfonline.org/research/bri-in-nepal-an-appraisal (Accessed June 21st, 2025).
[v] Al Jazeera. “China Aiding Nepal’s Fight with Maoists,” November 25,
[vi] Abanti Bhattacharya. “China’s Inroads into Nepal: India’s Concerns,” IDSA Comments, Manohar Parrikar Institute for Defence Studies and Analyses, May 18, 2009 https://www.idsa.in/publisher/idsa-comments/chinas-inroads-into-nepal-indias-concerns?utm_source=chatgpt.com (Accessed July 15, 2025).
[vii] Shivam Shekhawat. “BRI in Nepal: An Appraisal.” ORF Online, n.d. https://www.orfonline.org/research/bri-in-nepal-an-appraisal (Accessed June 21st, 2025).
[viii] Government of Nepal. “Chinese Assistance in Nepal’s Infrastructure Development,” GIWMSCD, 2024, https://giwmscdnone.gov.np/media/app/public/6/posts/1717144719_11.pdf (Accessed July 16, 2025).
[ix] AidData. “Project 53717.” China–AidData Aid Projects. https://china.aiddata.org/projects/53717/ (Accessed June 30, 2025).
( AidData is an international development research lab, housed at William & Mary's Global Research Institute, Williamsburg Virginia)
[x] AidData. “Chinese Government provides RMB 200 million grant for Nepal Armed Police Force Academy Construction Project”, AidData Aid projects. n.d https://china.aiddata.org/projects/38543/ ( Accessed July 15, 2025).
[xi] Organisation for Economic Co‑operation and Development. China’s Development Co‑operation Review, December 2023. https://www.oecd.org/content/dam/oecd/en/publications/reports/2023/12/china-s-development-co-operation_ea34f6c2/2bbe45d2-en.pdf (Accessed June 30, 2025).
[xii] Overseas Development Institute. “Levelling the Playing Field? OECD Responses to China’s Overseas Finance.” ODI Insights. https://odi.org/en/insights/levelling-the-playing-field-oecd-responses-to-chinas-overseas-finance/ (Accessed June 30, 2025).
[xiii] Ministry of Foreign Affairs, Nepal. “Historical Overview: Nepal–China Relations.” MOFA Nepal (old). https://old.mofa.gov.np/nepal-china-relations/ (Accessed June 25, 2025).
[xiv] Centre for Social Inclusion and Federalism. Stalled Road to North: A Case of BRI in Nepal. CESIF, 2023. https://cesifnepal.org/uploads/attachment/bf09c40a15fe241dd783e0d110e8746f.pdf (Accessed July 11, 2025).
[xv] Centre for Social Inclusion and Federalism, Stalled Road to North: A Case of BRI in Nepal ,CESIF, 2023, https://cesifnepal.org/uploads/attachment/bf09c40a15fe241dd783e0d110e8746f.pdf (Accessed July 13, 2025).
[xvi] Belt and Road Portal. “Cooperation Projects: Nepal.” YiDaiYiLu. https://eng.yidaiyilu.gov.cn/p/173668.html (Accessed July 3, 2025).
[xvii] AidData. “Project 53717.” China–AidData Aid Projects. https://china.aiddata.org/projects/53717/ (Accessed July 13, 2025).
[xviii] Centre for Social Inclusion and Federalism. “Stalled Road to North: A Case of BRI in Nepal”. CESIF, 2023. https://cesifnepal.org/uploads/attachment/bf09c40a15fe241dd783e0d110e8746f.pdf (Accessed July 11, 2025).
[xix] Asian Development Bank. “Nepal: Other Technical Assistance.” ADB Document No. 38176‑015. https://www.adb.org/sites/default/files/linked-documents/38176-015-nep-oth-01.pdf (Accessed July 13, 2025).
[xx] Mulmi, et al. “Chinese Emergence in Nepal’s Infrastructure: Status, Issues and Challenges”. Centre for Social Inclusion and Federalism (CESIF), 2023, cesifnepal.org/uploads/attachment/4cc7c842a1f9a076c9092aa24cbbde18.pdf.
[xxi] Ibid.
[xxii] ( AidData is an international development research lab, housed at William & Mary's Global Research Institute, Williamsburg Virginia)
[xxiii] AidData. “Chinese Lenders Secure Repayment from Emerging Economies with Cash Collateral.” AidData Blog. https://www.aiddata.org/blog/chinese-lenders-secure-repayment-from-emerging-economies-with-cash-collateral(Accessed July 8, 2025).
[xxiv] AidData. “Project 38411.” China–AidData Aid Projects. https://china.aiddata.org/projects/38411/ (Accessed June 25, 2025).
[xxv] Mulmi, et al. “Chinese Emergence in Nepal’s Infrastructure: Status, Issues and Challenges”. Centre for Social Inclusion and Federalism (CESIF), 2023, cesifnepal.org/uploads/attachment/4cc7c842a1f9a076c9092aa24cbbde18.pdf.
[xxvi] Gautam, Rajendra. “Study Panel Says There Are Issues Along Nepal–China Border in Humla.” The Kathmandu Post, October 23, 2021. https://kathmandupost.com/national/2021/10/23/study-panel-says-there-are-issues-along-nepal-china-border-in-humla (Accessed July 9, 2025).
[xxvii] Anil Giri, “A Blueprint for Consolidating Power: China Exports Xi Jinping Thought to Nepal,” The Kathmandu Post, September 24, 2019, https://kathmandupost.com/national/2019/09/24/a-blueprint-for-consolidating-power-china-exports-xi-jinping-thought-to-nepal (Accessed July 12, 2025).
[xxviii] Shrestha, Ramesh. “Billions Embezzled in Pokhara Airport Works, Probe Finds.” The Kathmandu Post, April 18, 2025. https://kathmandupost.com/national/2025/04/18/billions-embezzled-in-pokhara-airport-works-probe-finds (Accessed July 9, 2025).
[xxix] Lekhanath Pandey. “Nepal Looks to Kick‑Start Stalled China‑Funded Projects.” DW News https://www.dw.com/en/nepal-looks-to-kick-start-stalled-china-funded-projects/a-70935412 (Accessed July 9, 2025).
[xxx] Centre for Social Inclusion and Federalism. “Dynamics of Small-Scale Foreign Aid in Nepal’s Borderlands”. CESIF, 2023. https://cesifnepal.org/1698922605_Dynamics%20of%20Small-Scale%20Foreign%20-%20Aid%20in%20Nepal's%20Borderlands.pdf (Accessed July 13, 2025)