सारांश: चीन जहाँ खुद की पुनर्ब्रांडिंग कर रहा है वहीं प्रशांत क्षेत्र में पश्चिमी समर्थन असंगत बना हुआ है, वहीं द्वीप– समूह देश जलवायु परिवर्तन जैसे अस्तित्वगत संकट से निपटते हुए अनिश्चितता के दौर से गुज़र रहे हैं।
परिचय
मई 2025 के आखिरी दिनों में, चीन ने जब शियामेन में प्रशांत के द्वीप– समूह राष्ट्रों के ग्यारह विदेश मंत्रियों की मेज़बानी की तो पश्चिम रणनीतिक समुदाय ने इस पर चिंता जताई। यह इस बैठक का तीसरा संस्करण था। दक्षिण प्रशांत के द्वीपों में चीन की धीरे– धीरे बढ़ती उपस्थिति और साथ ही पश्चिम में उसके द्वारा पैदा की गई व्यवस्थागत चिंताएं, कोई नई घटना नहीं है। इस क्षेत्र के बारे में लोकप्रिय टिप्पणियों में ‘चीनी खतरा’ ही प्रमुखता से छाया हुआ है, एक ऐसा क्षेत्र जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से कम– से– कम प्रत्यक्ष रूप से, महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से वंचित रहा है। बेशक, हाल के दिनों तक।
प्रशांत क्षेत्र में जलवायु संकट को देखते हुए अमेरिका का पीछे हटना और मदद में कटौती
बैठक के अंत में जारी संयुक्त वक्तव्य में चीनी पक्ष की ओर से ‘कोई खोखला वादा नहीं’ करने का उल्लेख था।[i] इस बयान के आने का समय उल्लेखनीय है। अमेरिका में अंतर्मुखी बदलाव ने उसके प्रशांत क्षेत्र के सहयोगियों के बीच अविश्वसनीयता की आशंकाओं को जन्म दिया है। हालांकि अमेरिका, न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया की इस क्षेत्र में व्यापक उपस्थिति है फिर भी अमेरिका की विदेश नीति के नवीनतम रुझानों के कारण चिंताएं स्पष्ट रूप से पैदा हुई हैं। अमेरिका द्वारा अप्रैल 2025 में शुरू किए गए पारस्परिक टैरिफ के कारण फिज़ी वाटर और कावा जैसी वस्तुओं पर रातोंरात दबाव बढ़ गया।
विश्व के सबसे ज्यादा सहायता पर निर्भर क्षेत्रों में से एक टोंगा से आने वाली वस्तुओं पर शुल्क लगाने से द्वीपों में निराशा और चिंता पैदा हो गई है। प्रशांत द्वीप मंच के वर्तमान अध्यक्ष, टोंगा ने, अध्यक्ष का समर्थन करने वाले वर्तमान त्रिमूर्ति के साथ राष्ट्रपति ट्रम्प को एक पत्र लिखा जिसमें टैरिफ और मदद में कटौती से पैदा हुई चिंताओं के बारे में बताया गया है।[ii] श्री ट्रम्प ने यूएसएड (USAID– United States Agency for International Development), के लिए सरकारी धनराशि में कटौती की है, जो प्रशांत क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवा, आर्थिक विकास और जलवायु परिवर्तन से निपटने के कार्यक्रमों का समर्थन कर रहा था।
प्रशांत क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी चिंता जलवायु परिवर्तन है। इससे पूरे विश्व का अस्तित्व खतरे में है लेकिन द्वीपीय समुदाय इस मानव– निर्मित आपदा के पहले शिकार बनने की राह पर हैं जिसके निर्माण में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। साल 2021 में COP26 के दौरान तुवालु के विदेश मंत्री के भाषण के प्रभावशाली अंश– जो उन्होंने पानी के भीतर से दिया था– आज भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के जेह़न में ताज़ा हैं। हालाँकि प्रशांत क्षेत्र के द्वीप– समूह देशों द्वारा अपने– अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विभिन्न मुद्दों पर अलग– अलग कूटनीतिक रुख अपनाया जाता है लेकिन जब जलवायु परिवर्तन की बात आती है तो कई भी इससे अलग नहीं होता।
इसे ध्यान में रखते हुए, पेरिस समझौते से अमेरिका का हटना बेहद चिंताजनक है। जलवायु परिवर्तन एवं स्वास्थ्य, विशेष रूप से टीकों पर श्री ट्रम्प की अवैज्ञानिक सार्वजनिक बयानबाज़ी उन्हें कोई मदद नहीं करती। यह वर्षों की अनदेखी को दूर करने में बाइडेन प्रशासन द्वारा की गई प्रगति को भी बहुत हद तक पलट देती है। वे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वाशिंगटन में प्रशांत क्षेत्र के द्वीप– समूह देशों के नेताओं की मेज़बानी करने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने।[iii]
लंबे समय से बंद अमेरिकी दूतावासों को फिर से खोला गया और द्वीप– समूह देशों द्वारा स्वयं राष्ट्रीय प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के लिए बजट को बढ़ाया गया। अमेरिका ने एक ‘प्रशांत साझेदारी रणनीति’ भी बनाई थी।[iv] हालाँकि राष्ट्रपति बाइडेन के कार्यकाल की नीतियों को प्रशांत क्षेत्र में हमेशा सहजता से स्वीकार नहीं किया गया लेकिन वाशिंगटन के नए सिरे से ध्यान को कुल मिलाकर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। नए अमेरिकी प्रशासन ने इस क्षेत्र के लिए समर्पित योजना नहीं तैयार की है या पिछली सरकार की प्रशांत रणनीति के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई है और ऐसा हो पाना लगभग असंभव लगता है। जलवायु परिवर्तन पर बात करते समय ऑस्ट्रेलिया भी खुद को प्रशांत द्वीप– समूह की कल्पना के दायरे में नहीं रखता। ऑस्ट्रेलिया के बारे में प्रशांत क्षेत्र के देशों को जो बात खटकती है वह यह है कि उसके पास जीवाश्म ईंधन को खत्म करने की कोई ठोस योजना नहीं है और ऐतिहासिक उत्सर्जन की भूमिका को स्वीकार करने में भी कमी है।
पुनर्ब्रांडिंग: ‘बेहतर प्रभुत्व’
संयुक्त वक्तव्य में जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करते हुए, देशों के बीच दक्षिण– दक्षिण सहयोग का आह्वान किया गया और यूएनएफसीसीसी (UNFCCC) और उसके पेरिस समझौते के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई गई। शिखर सम्मेलन के दौरान प्रतिभागियों ने ‘जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्रशांत द्वीप– समूह देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की चीन की पहल’ को अपनाया।[v] चीन हमेशा खुद को अमेरिका के मुकाबले एक 'बेहतर प्रभुत्व' वाले देश के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। विश्व राजनीति के ऐसे मोड पर, जहाँ अमेरिकी सहयोगियों एवं उसकी मदद पर निर्भर देशों के बीच अनिश्चितता का माहौल है, इस बयान में विकसित देशों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन पर नेतृव प्रदान करने का भी आह्वान किया गया है।
हाल ही में चीन की गतिविधियों में जो बात अलग दिख रही है, वह है इसका सूक्ष्म रूप से बदलता स्वरूप। ये बदलाव अलग– अलग कारकों से प्रेरित हैं। प्रशांत क्षेत्र और विश्व के दूसरे हिस्सों में, चीन के विकास प्रयासों पर भ्रष्ट आचरण में संलिप्तता, अभिजात वर्ग पर कब्जा करने, घरेलू हस्तक्षेप और जानबूझकर अस्थाई परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के आरोप लगे हैं– जिनका गुप्त उद्देश्य दोहरे लाभ हेतु उन्हें हड़पना है। इससे निर्भरताएं पैदा होती हैं जिनसे बाहर निकलना मुश्किल हो सकता है। चीन के घरेलू बाज़ारों में उच्च जोखिम के कारण ऋण देने एवं सहायता प्रदान करने की क्षमता भी कम हो गई है।
इस प्रकार, बदलते वैश्विक रुझानों और चीनी मदद के बारे में अस्थिर धारणाओं को सुधारने के प्रयासों से प्रभावित होकर, एक पुनर्संतुलन बना है। स्टेडियमों और राष्ट्रपति भवन जैसी बड़ी एवं भव्य परियोजनाओं से हटकर, ‘छोटी और सुंदर’ परियोजनाओं पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। यह शी जिनपिंग की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) के अगले चरण का हिस्सा है। प्रशांत क्षेत्र में परियोजनाओं का औसत आकार 40 मिलियन डॉलर से घटकर 5 मिलियन डॉलर रह गया है।[vi] ऋणों की तुलना में अनुदानों का हिस्सा ज्यादा रहा है।[vii] दूतावासों की गतिविधियों में तेज़ी से वृद्धि ने अनुदान आधारित परियोजनाओ को आगे बढ़ाने में मदद की है।[viii]
प्रशांत क्षेत्र के दूसरे देशों– जैसे किरिबाती और सोलोमन द्वीप– की तुलना में जिन देशों में चीन की उपस्थिति व्यापक है, उन पर ध्यान दिया जा रहा है। इन देशों ने ताइवान से चीन के साथ अपने राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं और जोखिम– लाभ के अपने आकलन के आधार पर विकास और सुरक्षा सहयोग को बढ़ाया है। ये बदलाव वैश्विक रुझानों से भी प्रेरित हैं, न कि केवल चीन की अविश्वसनीय धारणा को सुधारने की रणनीतियों से। हालाँकि, ये बदलाव चीन को विकास और सुरक्षा के एक नए ब्रांड वाले गारंटर के रूप में स्थापित करते हैं। यह देखना बाकी है कि यह नया ब्रांड स्थानीय चिंताओं को किस सीमा तक दूर करता है।
“वैश्विक शक्ति– प्रदर्शन के शिकार”: विदेश नीति संबंधी चिंताएं
ऐतिहासिक रूप से हमेशा से ही विदेशी शक्तियां रही हैं, चाहे वे साम्राज्य हों या राष्ट्र, जिन्होंने द्वीपों को अपने संप्रभुता का हिस्सा बनाने का प्रयास किया या द्वीपों को सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से अपनी ओर और केवल अपनी ओर उन्मुख करने की कोशिश की है। इस रणनीति का उद्देश्य निर्भरताएं पैदा करना, राष्ट्रों के विकल्पों को सीमित करना औऱ बदले में नीति निर्धारित करना है।
वर्तमान समय में, अमेरिका और चीन, दोनों ने (कार्रवाई और लिखित रणनीति के जरिए) पूर्वी एशिया में एक संभावित युद्धक्षेत्र के रूप में पहली द्वीप श्रृंखला बनाई है। उस संभावित युद्ध में, प्रशांत क्षेत्र के द्वीपों की भावी कल्पना रणनीतिक बढ़त प्रदान करने वाले ‘नोड्स' और 'लिंक्स' की है। यह संप्रभु राष्ट्रों का एक उपयोगितावादी नज़रिया है जिन्होंने बार– बार उन प्रतियोगिताओं में भाग लेने से अपनी अनिच्छा दोहराई है जिनमें उन्होंने भाग नहीं लिया है। प्रशांत द्वीप– समूह राष्ट्र चीन की आधिपत्य की महत्वाकांक्षाओं के प्रति सचेत और चिंतित हैं, साथ ही वे पश्चिम की मौजूदा (लेकिन विवादित) उपस्थिति के प्रति भी सचेत और चिंतित हैं।
किरिबाती को चीन की ओर 'झुकाव' रखने वाला देश माना जाता है। सहायता की मात्रा बढ़ी है और हाल के दिनों में सुरक्षा सहयोग भी धीरे– धीरे गहरा होता जा रहा है। हालाँकि अक्टूबर 2024 में जब चीन ने एक अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) दागी, जो किरिबाती के विशेष आर्थिक क्षेत्र में गिरा, तो इसकी कड़ी निंदा हुई थी। यहाँ उल्लेखनीय बात यह है कि चीन ने प्रक्षेपण के बारे में अमेरिका और फ्रांस को इसकी सूचना दी थी लेकिन उनमें से किसी ने भी किरिबाती या क्षेत्र के किसी भी प्रशांत द्वीप देश को सूचित करना जरूरी नहीं समझा।
इस प्रकार की कार्रवाईयां इस आशंका को और पुख्ता करती हैं कि दक्षिण प्रशांत द्विआधारी प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में बदल जाएगा जहाँ द्वीप– समूह देशों की बात शोरगुल में गुम हो कर रह जाएगी। चूँकि सहायता के कई स्रोत हैं और उनके पास सुरक्षा संबंधी अपने– अपने एजेंडे हैं इसलिए द्वीप– समूह देश अपनी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दीर्घकालिक और अल्पकालिक लक्ष्यों के आकलन के आधार पर विदेश नीति बनाते हैं। हालाँकि द्वीप– समूह राष्ट्र आंतरिक रूप से किसी एक देश से बंधे नहीं हैं।[ix] ये महानगरीय क्षेत्र हैं जिनके घरेलू और क्षेत्रीय संबंध जटिल हैं। स्थानीय समुदाय उन समाजों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जहाँ राज्य की पहुँच सर्वव्यापी नहीं है और दोनों ही विदेशी मदद से पैदा होने वाली रणनीतिक स्थितियों से सतर्क रहते हैं जो उनके अस्तित्व के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
मोटे तौर पर, द्वीप– समूह देशों और विदेशी देशों के बीच पूंजी का प्रवाह एकतरफा होता है। यह एक कूटनीतिक वास्तविकता है। वे विदेशी मदद पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं। इस प्रकार, विकसित देश और द्वीप– समूह देशों के बीच किसी भी घटनाक्रम को शून्य– योग (जीरो– सम गेम) खेल के रूप में देखा जाता है। चूँकि इन देशों पर अक्सर विकल्प थोपे जाते हैं, और उनकी कल्पनाएँ संयुक्त राष्ट्र महासभा में मतदान तक ही सीमित रह जाती हैं, इसलिए प्रशांत द्वीप समूह मंच ने फिजी के प्रधानमंत्री सिटिवेनी राबुका द्वारा प्रस्तावित 'शांति के महासागर' के विचार का समर्थन किया है।[x] 'शांति महासागर' पर एक मसौदा घोषणापत्र सितंबर 2025 में सोलोमन द्वीप के होनियारा में 54वें प्रशांत द्वीप समूह फोरम शिखर सम्मेलन में विचार के लिए रखा जाएगा।
निकट भविष्य में, प्रशांत क्षेत्र में विदेश नीति की एक प्रमुख चिंता यह होगी कि अमेरिका की वापसी और रणनीतिक चुप्पी और चीन के बढ़ते प्रभाव के मद्देनज़र, बिना किसी शर्त के, महत्वपूर्ण जरूरतों के लिए सर्वोत्तम समर्थन कैसे जुटाया जाए।
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*आकाश त्रिपाठी, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण:
[i] Ministry of Foreign Affairs of the People’s Republic of China. (2025, May 28). Joint Statement of the Third China-Pacific Island Countries Foreign Ministers’ Meeting. https://www.mfa.gov.cn/eng/wjbzhd/202505/t20250528_11635595.html
[ii] Island Times. (2025, April 22). Troika leaders write to President Trump.https://islandtimes.org/troika-leaders-write-to-president-trump/
[iii] U.S. Department of State. (2022). U.S.–Pacific Islands Country Summit. https://2021-2025.state.gov/u-s-pacific-islands-country-summit/
[iv] The White House. (2022, September). Pacific Partnership Strategy of the United States [PDF]. https://www.politico.com/f/?id=00000183-86ba-d824-a1d7-a7bac17e0000
[v] Ministry of Foreign Affairs of the People’s Republic of China. (2025, May 28). China’s initiative on deepening cooperation with Pacific Island countries on combating climate change. https://www.fmprc.gov.cn/eng/wjbzhd/202505/t20250528_11635735.html
[vi] Dayant, A., & Duke, R. (2023, November 28). China’s shifting Pacific engagement – loud and brash to “small but beautiful”. Devpolicy Blog.https://devpolicy.org/chinas-shifting-pacific-engagement-loud-and-brash-to-small-but-beautiful-20231128/
[vii] Dayant, A., Duke, R., Ahsan, N., Rajah, R., & Lemahieu, H. (2024). Pacific Aid Map: 2024 key findings report. Lowy Institute. https://pacificaidmap.lowyinstitute.org
[viii] Ibid.
[ix] Davis, S., Munger, L. A., & Legacy, H. J. (2020). Someone else’s chain, someone else’s road: U.S. military strategy, China’s Belt and Road Initiative, and island agency in the Pacific. Island Studies Journal, 15(2), 13–36. https://doi.org/10.24043/isj.104
[x] Office of the Prime Minister of Fiji. (2024, September 5). 53rd Pacific Islands Forum Leaders Meeting, Nuku'alofa & Vava'u, Tonga, 25–30 August 2024. https://www.pmoffice.gov.fj/53rd-pacific-islands-forum-leaders-meeting-nukualofa-vavau-tonga-25-30-august-2024/